साउथ चाइना सी पर चीन जो बड़े-बड़े दावे करता है, उसे 2016 में ही इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल ने 'गैर-कानूनी' घोषित कर दिया था. लेकिन रविवार को इस फैसले के 10 साल पूरे होने पर 14 देशों ने एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया है और कहा है कि 2016 का वह फैसला 'अंतिम' है और चीन उस फैसले को मानने के लिए 'बाध्य' है. 27 देशों वाले यूरोपियन यूनियन (EU) ने भी अलग से बयान जारी कर चीन के दावों को खारिज किया है.
वहीं, चीन का कहना है कि वह 2016 के उस फैसले को नहीं मानता. चीन ने कहा, 'चीन की साउथ चाइना सी में गतिविधियां पूरी तरह से जायज और कानूनी हैं. साउथ चाइना सी में चीन के अधिकारों को किसी भी तरह से उस 'आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल' के फैसले से नकारा नहीं जा सकता, जिसे आनन-फानन में दिया गया था.'
12 जुलाई 2016 को हेग स्थित आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने साउथ चाइना सी में चीन के सभी दावों को खारिज कर दिया था. चीन के खिलाफ आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल में फिलीपींस ने केस दायर किया था. हालांकि, चीन कभी इस मामले में ट्रिब्यूनल के सामने नहीं गया. इसी आधार पर वह ट्रिब्यूनल के फैसले को नहीं मानता है.
क्या है ये पूरा मामला?
साउथ चाइना सी को चीन अपना बताता है. 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला यह समंदरी इलाका इंडोनेशिया और वियतनाम के बीच पड़ता है.
कुछ साल पहले तक साउथ चाइना सी में शांति थी लेकिन फिर धीरे-धीरे कर चीन ने यहां अपनी गतिविधियां शुरू कर दीं. उसने यहां न सिर्फ बंदरगाह और हवाई पट्टी बनाई, बल्कि एक पूरा सैन्य अड्डा भी बना दिया.
इस इलाके में चीन का सिर्फ फिलीपींस से ही विवाद नहीं है, बल्कि वियतनाम, मलेशिया, ब्रूनेई और ताइवान के साथ भी तनातनी है. चीन की गतिविधियों के कारण इलाके में अक्सर तनाव बना रहता है.
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2016 में क्या फैसला आया था?
चीन के साथ विवाद को फिलीपींस ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के जरिए सुलझाने की कोशिश की. जुलाई 2016 में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि चीन की कथित 'नाइन-डैश लाइन' अमान्य है और चीन के ऐतिहासिक दावों और टकराव वाले इलाकों में समुद्री कानून (UNCLOS) ही लागू होंगे.
कोर्ट ने यह भी कहा कि फिलीपींस के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) वाले इलाकों में चीन का द्वीप बनाना, मछली पकड़ना और फिलीपींस की गतिविधियों में दखल देना 'गैर-कानूनी' था.
चीन अपनी कथित 'नाइन-डैश लाइन' से साउथ चाइना सी के 90% इलाके पर अपना दावा करता है. वह दावा करता है कि साउथ चाइना सी के इलाकों पर उसका अधिकार सदियों पुराना है. चीन जो दावा करता है, ताइवान भी वही दावे करता है.
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अब 14 देशों ने क्या किया?
12 जुलाई को ट्रिब्यूनल के फैसले को 10 साल पूरे हो गए. इस मौके पर 14 देशों- फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, एस्टोनिया, जर्मनी, इटली, जापान, लातविया, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, रोमानिया, स्लोवेनिया, यूके और अमेरिका ने एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया.
इसमें कहा गया कि 'हम फिर से कहते हैं कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का 10 साल पहले दिया गया फैसला चीन और फिलीपींस के बीच अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी है.'
इस बयान में कहा, 'हम आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के उस फैसले को फिर से सही ठहराते हैं जिसके अनुसार साउथ चाइना सी में चीन के बड़े समुद्री दावों का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, जिसमें 'ऐतिहासिक अधिकारों' पर आधारित दावे भी शामिल हैं.'
14 देशों ने कहा, 'हम क्षेत्र में शांति और स्थिरता को खतरे में डालने वाली किसी भी अस्थिर करने वाली या एकतरफा कार्रवाई का कड़ा विरोध करते हैं.'
इन देशों ने कहा कि 'समंदर या हवा में दूसरे देशों की कानूनी गतिविधियों को परेशान करने, रोकने या डराने-धमकाने के लिए कोस्ट गार्ड, सेना या समुद्री लड़ाकों के इस्तेमाल का कड़ा विरोध करते हैं, क्योंकि ऐसा करने से सुरक्षा खतरे में पड़ती है और क्षेत्रीय शांति को गंभीर नुकसान पहुंचता है.'
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लेकिन चीन है कि अड़ा हुआ है!
14 देशों का जॉइंट स्टेटमेंट आने के बाद चीन भड़क गया और उसने आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के फैसले को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया.
चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि साउथ चाइना सी में चीन की गतिविधियां पूरी तरह से जायज और कानूनी हैं और उसके अधिकारों को किसी भी तरह से उस 'आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल' के फैसले से नकारा नहीं जा सकता.
चीन ने कहा, 'फैसला सुनाते समय ट्रिब्यूनल ने अपने अधिकारों का उल्लंघन किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया. यह फैसला स्वाभाविक रूप से गैर-कानूनी और अमान्य है और इसे मानने की कोई बाध्यता नहीं है.'
विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन न तो इस फैसले को स्वीकार करता है और न ही इसे मान्यता देता है.
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