- सुप्रीम कोर्ट ने कहा राज्यों को छात्रों के खिलाफ NEET प्रोटेस्ट की FIR रद्द करने या वापस लेने की छूट है.
- SC ने FIR को 2 हिस्सों में बांटने को कहा- एक छात्रों के खिलाफ, दूसरी हार्ड अपराधियों के खिलाफ.
- पटना FIR में 5000 अज्ञात और प्रोटेस्ट में फेशियल सर्विलांस से प्राइवेसी उल्लंघन का भी मुद्दा उठा.
NEET पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर और देशभर में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की. घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने भी हमलावरों पर कार्रवाई की मांग को लेकर अर्जी दी है. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने फौरी राहत देते हुए ऐसे छात्रों को छोड़ने का निर्देश दिया था, जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. ऐसे लोगों की गिरफ्तारी पर भी रोक लगा दी थी. कोर्ट इन सभी मामलों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के लिए हाई-पावर्ड कमेटी बनाने पर विचार करेगा. सरकार और याचिकाकर्ता दोनों इसके पक्ष में है.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवार भी सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर इस मामले में पक्षकार बनाने की मांग की है. उनकी मांग है कि कोर्ट उन लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई के निर्देश दे, जिन्होंने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारियों पर हमला किया और उन्हें गंभीर रूप से घायल किया.
एसजी ने कहा कि जो प्रदर्शनकारी छात्र हैं, सरकार उनके लिए देखेगी. CJI ने SG से कहा कि आप दिल्ली और दूसरे राज्यों में दर्ज FIR का ब्योरा दीजिए. तुषार मेहता ने कहा, "प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR के बारे में कुछ गलतफहमी या गलत जानकारी थी. सरकार अपने वादे को लेकर गंभीर है. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो मामले को गर्म रखना चाहते हैं."
जस्टिस बागची ने कहा कि क्रिमिनल लॉ का ढांचा केस वापस लेने की इजाज़त देता है. ऐसा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करके किया जाता है. जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है और जिनका नहीं है, उन्हें अलग-अलग करना चाहिए.
'छात्र और अपराधियों के मामले अलग करने होंगे'
CJI ने कहा कहा कि सबसे पहले FIR को अलग-अलग करना होगा. एक छात्रों के खिलाफ और दूसरा हार्ड अपराधियों के खिलाफ. फिर आप जांच कर सकते हैं. एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने कहा, "पटना से एक FIR है, जिसमें 152 लोगों के नाम हैं और 5,000 अज्ञात के नाम हैं. किसी को भी पकड़ा जा सकता है. हमें राज्य के साथ मिलकर एक मैकेनिज्म बनाना होगा. इसे रद्द भी किया जा सकता है."
तुषार मेहता ने कहा कि जिनका क्रिमिनल रिकॉर्ड रहा है, उन्हें छोड़कर बाकी सबका ध्यान रखा जा सकता है. जस्टिस बागची ने कहा कि सरकारी वकील केस वापस ले सकते हैं. क्लोजर रिपोर्ट फाइल की जा सकती है.
तुषार मेहता ने कहा कि कानूनी रूप से जिस भी तरीके से यह किया जा सकता है, सरकार अपने वादे पर कायम है. इस पर वृंदा ग्रोवर ने कहा कि कोर्ट आदेश में साफ होना चाहिए कि आपराधिक इतिहास वाले कौन लोग हैं. आदेश में ये साफ नहीं किया गया है कि किन मामलों में अपराधी हैं. इससे छोटे मोटे अपराध के आरोपी भी इसके दायरे में आ गए हैं.
सीजेआई ने कहा कि हम हत्या जैसे अपराधों के आरोपियों को नहीं छोडेंगे. एडवोकेट एएम सिंघवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले ऑर्डर के क्लैरिफिकेशन की जरूरत है. आपराधिक इतिहास शब्द लिखा गया है. इसमें ड्राइविंग ऑफेंस हो सकता है. कुछ छोटे-मोटे ऑफेंस हो सकते है. पुराने पॉलिटिकल प्रोटेस्ट भी हो सकते है. इस शब्द के क्लैरिफिकेशन की ज़रूरत है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "दिल्ली और दूसरे राज्यों को मामलों को बंद करने या वापस लेने की कानून के मुताबिक छूट है. आपराधिक इतिहास वाले लोगों का मतलब रेप और गंभीर अपराधों के आरोपी होना है.
याचिकार्ताओं के वकीलों ने मामले की जांच के लिए पूर्व CJI की कमेटी बनाने की मांग की. इस पर CJI ने कहा कि हमारे मन मे दो बातें हैं. एक तो पुलिस अधिकारियों की SIT जांच करे या फिर रिटायर्ड जज की अगुवाई में कमेटी बनाई जाए.
छात्रों के खिलाफ केस वापस या बंद हो सकेंगे
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि राज्य कानून के मुताबिक, छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों को लेकर उनके खिलाफ दर्ज FIR को बंद या वापस ले सकते हैं. अदालत ने यह भी कहा है कि पिछले आदेश में आपराधिक रिकॉर्ड का मतलब गंभीर और जघन्य अपराध है. तुषार मेहता ने कहा, "हम उन लोगों को नहीं छोड़ सकते जो 'मामले को गरमाए रखने' की कोशिश कर रहे हैं.
याचिकाकर्ता के वकील हरिहरन ने सवाल उठाया कि प्रोटेस्ट साइट पर बड़े पैमाने पर फेशियल सर्विलांस किया गया. किसी से कोई सहमति नहीं ली गई थी. इससे प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन हुआ. यह गैर-कानूनी है. वे यह डेटा कब तक रखेंगे?
सीजेआई ने कहा, "हम छात्रों की आड़ में घुसे हार्ड क्रिमिनल्स को संरक्षण देने को नहीं कह रहे हैं. यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि ज्यादती करने वाले पुलिस अधिकारी को बख्शा जाएगा या प्रदर्शनकारियों के बीच आने वाले किसी आपराधिक तत्व को छोड़ा जाएगा."
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