अमेरिका ने पहले से ही समुद्री परिवहन वाले रूसी तेल पर लगी पाबंदियों से दी गई छूट को एक महीने के लिए बढ़ा दिया है. इसका आदेश अमेरिकी वित्त मंत्रालय के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने सोमवार रात जारी किया. इसके मुताबिक 17 अप्रैल या उससे पहले समुद्र में फंसे रूसी तेल पर पाबंदियों से छूट को 17 जून तक के लिए बढ़ा दिया गया है. अमेरिका ने इससे पहले पांच मार्च से एक महीने के लिए रूसी तेल खरीदने की छूट भारत को दी थी. यह समय सीमा 11 अप्रैल को खत्म हो गई थी. इसके बाद आदेश को 17 अप्रैल से एक महीने के लिए बढ़ा दिया गया था. अमेरिका के इस फैसले का असली मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा तेल की पहुंच आसान बनाना और तेल की बढ़ती कीमतों को कम करना है. अमेरिका ने सोमवार को यह समय सीमा बढ़ाई और उसी दिन भारत ने कहा कि पाबंदियों से छूट मिले या नहीं, वह रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा.
अमेरिका ने क्या घोषणा की है
अमेरिका वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया साइट 'एक्स' पर लिखा कि इस फैसले से देशों को अतिरिक्त राहत मिलेगी. जरूरत पड़ने पर उन्हें अलग से विशेष लाइसेंस भी दिए जाएंगे. इससे वैश्विक कच्चे तेल का बाजार स्थिर रहेगा और तेल उन देशों तक पहुंच सकेगा जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा है कि इससे चीन की सस्ते रूसी तेल को बड़े पैमाने पर जमा करने की क्षमता कम होगी. मौजूदा तेल सप्लाई जरूरतमंद देशों की ओर मोड़ी जा सकेगी.
बेसेंट के इस बयान से पहले भारत ने कहा था कि अमेरिकी छूट हो या न हो, वह रूस से तेल खरीदता रहेगा. भारत के लिए सस्ती कीमत और ऊर्जा सुरक्षा सबसे अहम है. पेट्रोलियम मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा था,''रूस पर अमेरिकी छूट के संबंध में मैं यह स्पष्ट करना चाहती हूं कि हम पहले भी रूस से तेल खरीदते रहे हैं...छूट से पहले भी, छूट के दौरान भी और अब भी खरीदते रहेंगे.'' उन्होंने कहा था कि भारत के कच्चे तेल खरीदने के फैसले मुख्य रूप से व्यावसायिक दृष्टिकोण और पर्याप्त आपूर्ति उपलब्धता पर आधारित होते हैं. हमारे लिए खरीदारी का आधार मूल रूप से व्यावसायिक समझ है.

कब से मिल रही है रूस से तेल खरीदने पर छूट
अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने 17 अप्रैल को जारी लाइसेंस में कहा था कि 17 अप्रैल की सुबह तक टैंकरों में लदा रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, चाहे वे प्रतिबंधित जहाजों में ही क्यों न हों, ज्यादातर देश 16 मई तक खरीद और प्राप्त कर सकते हैं. अब इस छूट को बढ़ाकर 17 जून तक कर दिया गया है. अप्रैल में भी यही स्थिति बनी थी. उस समय भी छूट खत्म हो गई थी और अमेरिका ने पहले कहा था कि इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. लेकिन कुछ दिनों बाद उसने इसे फिर से लागू कर दिया. मार्च में मिली पहली छूट 11 अप्रैल को खत्म हुई थी. इसे बाद में बढ़ाकर 17 अप्रैल कर दिया गया था.
तेल की कीमतें इसलिए बढ़ी हैं, क्योंकि होर्मुज़ स्ट्रेट ईरान और अमेरिकी नाकाबंदी की वजह से लगभग बंद है. इस रास्ते से दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई होती थी. विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज बंद होने से खाड़ी देशों के तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इसकी भरपाई के लिए रूसी तेल खरीदने वाले देशों के दबाव में अमेरिका ने इस छूट की समय-सीमा बढ़ाई होगी.यह ट्रंप प्रशासन की उन कोशिशों का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लंबे समय तक तेज बढ़ोतरी को रोकना है. अगर तेल महंगा होता है, तो अमेरिका में पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी बढ़ेंगी, जिसका असर इस साल होने वाले मिडटर्म चुनावों पर पड़ सकता है.
अमेरिका के इस फैसले की क्यों रही है आलोचना
अमेरिका के इस फैसले से रूस को आर्थिक फायदा होगा. अब इस फैसले के आलोचकों का कहना है कि रूस इस फायदे का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ जारी लड़ाई में करेगा. कुछ ऐसी ही आलोचना उस समय भी हुई थी, जब अमेरिका ने ईरान से तेल खरीदने पर छूट दी थी.हालांकि अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर दी गई छूट दो बार बढ़ाई. लेकिन ईरान से तेल खरीदी को लेकर दी गई छूट एक बार भी नहीं बढाया. हालांकि बेसेंट ने पिछले महीने कांग्रेस की एक सुनवाई में अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि कम से कम 10 देशों ने उनसे संपर्क कर इस छूट को बढ़ाने की अपील की थी. उनका कहना था अगर हमने यह छूट नहीं बढ़ाया तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. हालांकि बाद में उन्होंने समाचार एजेंसी एपी से कहा था कि वो दुबारा इस छूट को नहीं बढाएंगे.लेकिन अमेरिका अपने रुख में बदलाव लाते हुए छूट को एक बार फिर बढ़ा दिया है.
अमेरिका के इस कदम से पहले सोमवार को पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि भारत पहले भी रूस से तेल खरीद रहा था, छूट के दौरान भी खरीद रहा था और अब भी खरीद रहा है. इसलिए मुख्य बात यह है कि तेल कंपनियों को फायदा हो रहा है या नहीं. भारत का हमेशा से यह रुख रहा है कि रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिकी छूट की जरूरत नहीं है.

तेल संकट को देखते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने लोगों से तेल बचाने की अपील की है. देश में कई जगह पेट्रोल पंपों पर तेल नहीं हैं और जहां पर है, वहां खरीदारों की भीड़ लग रही है.
भारत ने इस अमेरिकी छूट का फायदा दूसरे तरीके से उठाया. दरअसल भारत ने उन टैंकरों में भी रूसी तेल से सकीं, जिन पर अमेरिका में पाबंदी है.भारतीय रिफाइनरियों ने अमेरिकी पाबंदी से जूझ रहीं रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी कंपनियों से भी तेल खरीदी की.अगर अमेरिका यह छूट आगे नहीं बढ़ाता तो भारत के रूस से तेल आयात में कुछ कमी आ सकती थी, क्योंकि इसके बिना भारतीय रिफाइनरियां उन प्रतिबंधित टैंकरों और रूसी कंपनियों से तेल नहीं ले पातीं. अगर भारतीय कंपनियां अमेरिकी पाबंदियों की अनदेखी करतीं तो उन्हें अमेरिका की सेकेंडरी सैंक्शंस का सामना करना पड़ सकता था.
भारत ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध शुरू होने से पहले भी रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा था, लेकिन युद्ध से पहले के महीनों में इसमें कुछ कमी आई थी. इसकी वजह रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी पाबंदी और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताएं थीं. हाल के महीनों में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब आधा हिस्सा (25-27 लाख बैरल प्रतिदिन) होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता था. लेकिन युद्ध की वजह से इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही करीब-करीब ठप है. इससे भारत आने वाले तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है.ऐसे में रूस से तेल आयात भारत के लिए राहत बना है. भारत इस समय सबसे अधिक तेल रूस से खरीद रहा है. इसने इराक और कुवैत जैसे पश्चिम एशियाई देशों से कम हुई तेल की आपूर्ति की भरपाई की है.
भारत ने रूस से कितना तेल खरीदा
फरवरी में भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से औसतन 10 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया था. यह 2025 के सर्वोच्च स्तर 20 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक का लगभग आधा था. युद्ध तेज होने और अमेरिकी छूट लागू रहने के कारण मार्च में रूस से तेल आयात करीब-करीब दोगुना होकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन पर पहुंच गया.इस वजह से मार्च में भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी रही. हालांकि अप्रैल में इसमें गिरावट आई लेकिन उम्मीद की जा रही है कि मई में यह एक बार फिर बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो सकता है.
ये भी पढ़ें: समंदर में भी बढ़ेगी भारत की ताकत, होने वाली है 70 हजार करोड़ की पनडुब्बी डील, चीन-पाक की बढ़ेगी टेंशन!