चीनी आज बढ़ती कीमतों को लेकर चर्चा में है. आज घर-घर की जरूरत बन चुकी चीनी कभी अमीरों के कब्जे में थी. चीनी के कारोबार, गन्ने के बागानों पर कब्जे को लेकर दुनिया में कई बड़े युद्ध लड़े गए. करीब 200 सालों तक चीनी दुनिया भर में व्यापार की धुरी रही. इसे सफेद सोना कहा जाता था. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों ने जब गन्ना उत्पादक इलाकों पर कब्जों के लिए कई जंग लड़ीं. बड़े पैमाने पर गन्ना उत्पादन वाले देशों पर कब्जा कर वहां मजदूरों को लेकर काम कराया गया. भारत से भी गिरमिटिया मजदूरों को ऐसे देश लाया गया. त्रिनिदाद एंड टोबैगो, सेंट किट्स, जमैका, बारबाडोस, हैती से लेकर क्यूबा तक चीनी को लेकर युद्ध लड़े गए.
कैरिबियन द्वीप समूह पर कब्जे के लिए युद्ध
कैरेबियन द्वीप समूह में भारी मात्रा में गन्ना उत्पादन होता था. 17वीं और 18वीं सदी में यूरोपीय देशों ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और डच देशों के बीच कैरिबियन द्वीपों के लिए कई युद्ध लड़े गए.वो चीनी पर कब्जे के लिए कैरेबियाई द्वीपों के बागानों पर कब्जा करना चाहते थे. ब्रिटेन और फ्रांस के बीच यह युद्ध 7 साल तक लड़ा गया. युद्ध खत्म होने पर पेरिस संधि 1763 में हुई.ब्रिटेन ने फ्रांस को प्रस्ताव दिया कि या तो वो कनाडा (न्यू फ्रांस) अपने पास रखे या कैरिबियन का छोटा सा चीनी पैदा करने वाला द्वीप. फ्रांस ने कनाडा को छोड़ दिया, मगर छोटे से द्वीप पर कब्जा नहीं छोड़ा, जो उस वक्त पूरे कनाडा के चमड़ा व्यापार से कहीं ज्यादा मुनाफा दे रहा था. चीनी पर नियंत्रण के लिए ब्रिटेन ने 1655 में स्पेन से जमैका छीन लिया. वहां प्रवासी मजदूरों को लाकर जमैका को दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक केंद्र बनाया. फ्रांस ने सैन डोमिंगो पर कब्जा जमाया, जो 18वीं सदी तक विश्व की आधी चीनी आपूर्ति करता रहा.
हैती क्रांति और फ्रांसीसी साम्राज्य से युद्ध
चीनी के इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध हैती में चीनी बागान मालिकों के खिलाफ शुरू हुआ था. सैन डोमिंगो (हैती) में लाखों अफ्रीकी गुलामों से चीनी और कॉफी के बागानों में गुलामों जैसा काम किया जाता था.1791 में गुलामों ने विद्रोह कर दिया.नेपोलियन बोनापार्ट ने चीनी व्यापार की कमाई पर कब्जा बनाए रखने के लिए विशाल फ्रांसीसी सेना भेजी. हैती के मजदूरों ने फ्रांसीसी सेना को हरा दिया. 1804 में हैती दुनिया का पहला स्वतंत्र अश्वेत गणराज्य बना. इस युद्ध से नेपोलियन का अमेरिकी महाद्वीप में साम्राज्य का सपना टूट गया. उसने लुइसियाना अमेरिका को बेच दिया.
अमेरिकी क्रांति और चीनी ऐक्ट
चीनी की कीमतों ने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में भी अहम भूमिका निभाई. शुगर एक्ट 1764 के तहत ब्रिटिश संसद ने अमेरिकी कॉलोनी पर विदेशी चीनी और गुड़ के आयात पर टैक्स लगा दिया. इसका उद्देश्य कैरिबियन के ब्रिटिश चीनी बागानों के कब्जे को बचाना था.लेकिन बिना प्रतिनिधित्व के कोई टैक्स नहीं का नारा गूंजा और आखिरकार 1775 में ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा.
अमेरिका का क्यूबा में दखल
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चीनी की मांग आसमान छू रही थी और क्यूबा दुनिया का मुख्य चीनी सप्लायर था. 1917 में क्यूबा में अस्थिरता और विद्रोह हुआ तो चीनी के खेतों और मिलों को नुकसान पहुंचने की आशंका थी. अमेरिका ने अपने मित्र देशों को चीनी आपूर्ति बनाए रखने के लिए क्यूबा में धावा बोल दिया. अमेरिकी सेना 1917 से 1922 तक क्यूबा के चीनी उत्पादन वाले इलाकों में तैनात रही, जिसे इतिहास में शुगर इंटरवेंशन कहा जाता है.
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चीनी और क्यूबा क्रांति
शीत युद्ध के दौरान चीनी फिर जंग की वजह बनी. 1959 में फिदेल कास्त्रो की अगुवाई में साम्यवादी क्रांति के बाद क्यूबा ने अमेरिका के मालिकाना हक वाले चीनी बागानों और मिलों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. अमेरिका ने जवाब में क्यूबा की चीनी आयात पर प्रतिबंध लगा दिया. सोवियत संघ ने क्यूबा का समर्थन कर उसकी पूरी चीनी खरीदने का सौदा किया. इसने क्यूबा को शीत युद्ध के दौरान सोवियत गुट में धकेल दिया.
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