करीब दो दशक पहले पाकिस्तान के सबसे मशहूर (कुख्यात) परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कादिर खान को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ था. पता चला था कि उन्होंने दुनिया के कई देशों तक गुप्त तरीके से परमाणु तकनीक पहुंचाने वाला एक इंटरनेशनल नेटवर्क चलाया था. इस नेटवर्क ने ईरान, लीबिया और नॉर्थ कोरिया जैसे देशों को परमाणु तकनीक और उससे जुड़ी जरूरी जानकारी दी थी. इस खुलासे से पाकिस्तान की दुनिया भर में काफी बदनामी हुई थी. लेकिन अब दुनिया की परमाणु गतिविधियों पर नजर रखने वाली सबसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्था ने पाकिस्तान की नागरिक परमाणु सुरक्षा व्यवस्था की तारीफ की है.
ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में स्थित अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की अंतरराष्ट्रीय भौतिक सुरक्षा सलाहकार सेवा (आईपीपीएएस) ने पहली बार पाकिस्तान में परमाणु सुरक्षा की जांच की. इस जांच के बाद संस्था ने कहा कि पाकिस्तान ने परमाणु सामग्री और परमाणु केंद्रों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनाई है. IAEA ने यह भी कहा कि जिस परमाणु केंद्र की जांच की गई, वहां इस व्यवस्था को सही तरीके से लागू किया जा रहा था. इसके अलावा, समय-समय पर समीक्षा करने और लोगों को जरूरी ट्रेनिंग देने जैसे प्रयासों से सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जा रहा है.
डॉ. अब्दुल कादिर खान से जुड़ा विवाद क्या था?
कई सालों तक पाकिस्तान में डॉ. अब्दुल कादिर खान को देश के परमाणु बम कार्यक्रम का जनक माना जाता रहा. उन्हें पाकिस्तान का परमाणु बम बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला वैज्ञानिक बताया जाता था. व्यापक रूप से 'इस्लामी बम का जनक' कहा जाता है. दरअसल उस समय पाकिस्तान के पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था कि अगर एक ईसाई बम था, एक यहूदी बम था और अब एक हिंदू बम है. तो फिर एक इस्लामी बम क्यों नहीं. पाकिस्तान को डॉ. अब्दुल कादिर खान ने वही बम बनाकर दे दिया, वो भी चोरी की तकनीक से. अब्दुल कादिर खान इससे पहले नीदरलैंड में यूरोपीय कंपनी यूरेंको के लिए काम करते थे. उन्होंने वहां से यूरेनियम संवर्धन तकनीक चुराई और 1976 में पाकिस्तान लौट आए. खान ने चीन से परमाणु हथियार के डिजाइन भी लिए.
बाद में हुई जांच में पता चला कि अब अब्दुल कादिर खान ने खुद नेटवर्क ने गुप्त तरीके से दूसरे देशों को यूरेनियम को परमाणु हथियार बनाने लायक बनाने की तकनीक, सेंट्रीफ्यूज के डिजाइन और परमाणु तकनीक से जुड़ी दूसरी संवेदनशील जानकारियां दी थीं. सेंट्रीफ्यूज एक ऐसी मशीन होती है, जिसका इस्तेमाल यूरेनियम में एक खास तरह के परमाणु पदार्थ की मात्रा बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह प्रक्रिया परमाणु हथियार बनाने में काम आ सकती है.
यह नेटवर्क कई महाद्वीपों तक फैला हुआ था. इसे चलाने के लिए कई फर्जी कंपनियों, बिचौलियों और सामान की गुप्त सप्लाई करने वाले रास्तों का इस्तेमाल किया जाता था. साल 2003 में लीबिया ने अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ने का फैसला किया. इसके बाद इस गुप्त नेटवर्क के कई अहम हिस्सों का खुलासा हुआ. बाद में हुई अंतरराष्ट्रीय जांच में इस नेटवर्क के तार ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया को दी गई परमाणु सहायता से जुड़े पाए गए.
दुनिया भर से दबाव बढ़ने के बाद पाकिस्तान ने डॉ. खान के खिलाफ जांच शुरू की. फरवरी 2004 में डॉ. खान ने देशभर में टेलीविजन पर प्रसारित एक बयान दिया. इसमें उन्होंने बिना अनुमति के परमाणु तकनीक दूसरे देशों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी स्वीकार की. इसके कुछ समय बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन्हें माफी दे दी. हालांकि, उन्हें घर में ही नजरबंद रखा गया.
पाकिस्तान के बढ़ते परमाणु हथियारों के कारण भी चिंता
ये सवाल आज के समय में और भी अहम हो गए हैं, क्योंकि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की संख्या दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले परमाणु हथियारों के भंडारों में शामिल मानी जाती है. वैज्ञानिकों के बुलेटिन नाम की संस्था के चर्चित प्रकाशन 'न्यूक्लियर नोटबुक' में दिए गए अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार हैं. स्वतंत्र विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सही संख्या सार्वजनिक नहीं है और इसे गोपनीय रखा जाता है. हालांकि, वैज्ञानिकों के बुलेटिन का आकलन पाकिस्तान को दुनिया के प्रमुख परमाणु हथियार रखने वाले देशों में शामिल करता है.
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