- पाकिस्तान और सऊदी ने एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता किया हैं, जिसमें हमले को दोनों पर हमला माना जाएगा
- तुर्की भी ;मुस्लिम NATO' में शामिल होने के लिए तैयार है, और इसके लिए तीनों देशों के बीच अंतिम सहमति आवश्यक है
- चीन मुस्लिम NATO का समर्थन धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक लाभ के लिए कर सकता है
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बना तथाकथित ‘मुस्लिम NATO' पर पांव पसारता दिख रहा है. दरअसल पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक ‘रणनीतिक पारस्परिक रक्षा' समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके अनुसार उनमें से किसी भी देश पर किसी भी हमले को ‘दोनों के विरुद्ध आक्रमण' माना जायेगा. अब इसमें तुर्की भी शामिल होने के लिए पूरी तरह तैयार है और पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री रजा हयात हर्राज ने इसकी पुष्टि भी कर दी है. खास बात है कि उन्होंने इस बात पर मुहर लगाते समय चीन का भी जिक्र किया और कहा कि सामरिक दृष्टि से इन तमाम मुस्लिम देशों के साथ-साथ चीन भी पाकिस्तान का करीबी दोस्त है. सामरिक नीति की नजर से इनके साथ घनिष्ठ संबंध हैं. इससे सवाल उठ रहा है कि क्या चीन भी इस 'मुस्लिम NATO' में शामिल होने जा रहा है.
चलिए आपको पहले बताते हैं कि पाकिस्तान की तरफ से क्या कहा गया है और 'मुस्लिम NATO' को सपोर्ट करने से चीन को क्या हासिल हो सकता है.
Q- ये मुस्लिम नाटो क्या है?
नाटो (NATO) का पूरा नाम 'उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन' है. यह यूरोप और उत्तरी अमेरिका के 32 लोकतांत्रिक देशों का एक सैन्य और राजनीतिक गठबंधन है, जिसकी स्थापना 1949 में हुई थी. इसका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की सुरक्षा और स्वतंत्रता की रक्षा करना है. नाटो सैन्य संगठन का अनुच्छेद 5 कहता है कि एक सदस्य के खिलाफ किसी भी तरह की आक्रामकता को सभी पर हमला माना जाएगा. सऊदी और पाकिस्तान के बीच बीते साल सितंबर में हुए समझौते की मूल बात भी यही थी. इस गठबंधन के सामने आने के बाद से ही इसे 'मुस्लिम नाटो' का नाम दिया जाने लगा.
Q- क्या मुस्लिम नाटो में तुर्की भी शामिल हो रहा है?
डॉन की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री रजा हयात हर्राज ने बुधवार, 14 जनवरी को इसकी पुष्टि की पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने लगभग एक साल की बातचीत के बाद एक रक्षा समझौते का मसौदा तैयार किया है. रक्षा उत्पादन मंत्री ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि तीनों देशों के बीच संभावित समझौता पिछले साल घोषित द्विपक्षीय सऊदी-पाकिस्तानी समझौते से अलग है. उन्होंने कहा कि सौदे को पूरा करने के लिए तीनों देशों के बीच अंतिम सहमति की जरूरत है.
हर्राज ने इंटरव्यू में कहा, "पाकिस्तान-सऊदी अरब-तुर्की त्रिपक्षीय समझौता कुछ ऐसा है जो पहले से ही पाइपलाइन में है. समझौते का मसौदा हमारे पास पहले से ही उपलब्ध है. समझौते का मसौदा पहले से ही सऊदी अरब के पास है. समझौते का मसौदा तुर्की के पास भी पहले से ही उपलब्ध है. और तीनों देश इस पर विचार-विमर्श कर रहे हैं. और इस समझौते पर पिछले 10 महीनों से काम हो रहा है."
Q- चीन को लेकर पाकिस्तान ने क्या कहा है?
तुर्की द्वारा पाकिस्तान और सऊदी के बीच हुए समझौते में शामिल होने की चाहत की खबरों के बारे में पूछे जाने पर, पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री ने बीबीसी उर्दू से कहा: "रणनीतिक दृष्टिकोण से, तुर्की, चीन, सऊदी अरब और अजरबैजान पाकिस्तान के करीबी मित्र देश हैं, और रणनीतिक नीति के मामले में उनके साथ घनिष्ठ संबंध हैं." इसी से यह सवाल उठा कि कहीं चीन के लॉन्ग टर्म प्लान में यह तो नहीं कि वह मुस्लिम नाटो में शामिल हो जाए या पाकिस्तान के रास्ते इसे अपना समर्थन दे.
Q- चीन को मुस्लिम नाटो के समर्थन से क्या हासिल होगा?
चीन इस तथाकथित 'मुस्लिम नाटो' का समर्थन धार्मिक नहीं बल्कि रणनीतिक कारणों से कर सकता है. याद रहे कि चीन धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार देशों या गुटों का समर्थन करता है. बहुत हद तक माना जा रहा है कि जब यह मुस्लिम नाटो अपना पूरा आकार लेगा तो उसमें पाकिस्तान की केंद्रीय भूमिका हो सकती है. वर्तमान में, पाकिस्तान एकमात्र ऐसा मुस्लिम बहुल देश है जिसके पास आधिकारिक तौर पर परमाणु हथियार हैं. साथ ही पाकिस्तान चीन का सबसे करीबी मुस्लिम देश है. अगर कोई 'मुस्लिम नाटो' पाकिस्तान के नेतृत्व या प्रभाव में होता है, तो चीन को उसमें अप्रत्यक्ष असर मिलेगा.
सबसे खास बात है कि चीन को धार्मिक विरोधाभास की परवाह नहीं है. चीन घरेलू स्तर पर उइगर मुसलमानों पर सख्ती करता है, लेकिन विदेश नीति में वह शक्ति और स्थिरता को प्राथमिकता देता है. कुल मिलाकर चीन “मुस्लिम नाटो” का समर्थन इसलिए कर सकता है क्योंकि इससे उसके रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक हित पूरे होते हैं. उसके लिए धर्म कोई फैक्टर ही नहीं है.
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