- पाकिस्तान और सऊदी ने रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें NATO जैसे प्रावधान थे
- तुर्की भी सऊदी और पाकिस्तान के सुरक्षा गठबंधन में शामिल होने के लिए बातचीत कर रहा है
- तुर्की अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो का भी सदस्य है, वह 'मुस्लिम नाटो' में अपनी सैन्य ताकत से योगदान दे सकता है
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बना ‘मुस्लिम NATO' नए मेंबर का स्वागत करने को तैयार है. दरअसल पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक ‘रणनीतिक पारस्परिक रक्षा' समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके अनुसार उनमें से किसी भी देश पर किसी भी हमले को ‘दोनों के विरुद्ध आक्रमण' माना जायेगा. अब ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की भी सऊदी और पाकिस्तान की इस सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए बातचीत कर रहा है जो नाटो के सामूहिक रक्षा ढांचे से मिलता जुलता है.
नाटो सैन्य संगठन का अनुच्छेद 5 कहता है कि एक सदस्य के खिलाफ किसी भी तरह की आक्रामकता को सभी पर हमला माना जाएगा. सऊदी और पाकिस्तान के बीच बीते साल सितंबर में हुए समझौते की मूल बात भी यही थी. रिपोर्ट के अनुसार यह समझौता अब तुर्की के साथ काफी आगे बढ़ चुका है. अंकारा (तुर्की की राजधानी) स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहत अली ओजकैन ने बताया कि इस 'मुस्लिम नाटो' में किसकी क्या भूमिका होगी. उनके अनुसार सऊदी अरब वित्तीय सहायता प्रदान करेगा यानी फंडिंग देगा. पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों के साथ न्यूक्लियर डेटरेंस देगा. वह अपनी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और सैनिकों के साथ भी योगदान देगा. जबकि इसमें तुर्की सैन्य विशेषज्ञता और घरेलू रक्षा उद्योग को जोड़ेगा.
अली ओजकैन ने कहा, "जब अमेरिका क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलती गतिशीलता और क्षेत्रीय संघर्षों के नतीजे देशों को दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने के लिए नए तंत्र विकसित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं."
मामले से परिचित लोगों ने कहा कि गठबंधन का विस्तार करना एक तार्किक कदम है क्योंकि तुर्की के रणनीतिक हित दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ तेजी से जुड़ रहे हैं. तीनों देशों ने पहले से ही घनिष्ठ रूप कॉर्डिनेशन शुरू कर दिया है. तुर्की के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में अंकारा में अपनी पहली नौसैनिक बैठक आयोजित की.
मुस्लिम नाटो के संभावित विस्तार का महत्व बढ़ गया है क्योंकि तुर्की की सैन्य ताकत बहुत है. यह अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन का लंबे समय से सदस्य है और अमेरिका के बाद नाटो के भीतर दूसरी सबसे बड़ी सेना रखता है.
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