शुक्रवार को रियाद में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के मिलिट्री प्रमुखों की आनन-फानन में बैठक हुई. इसके बाद पाकिस्तानी फील्ड मार्शल असीम मुनीर और सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान के बीच हुई अलग बैठक हुई. इन दोनों बैठकों के बाद जारी बयानों में ऐसी कोई बात नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि यमन के अंसार अल्लाह (हूतियों) के खिलाफ तीनों सेनाएं मिलकर कोई कार्रवाई करने वाली हैं. हालांकि, दोनों बयानों से यह जरूर पता चलता है कि 7 अगस्त को मक्का में हुए समझौते में अब राजनीतिक आश्वासनों से आगे बढ़कर सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धता को व्यावहारिक रूप देने के लिए जरूरी सैन्य इंतजाम करने की दिशा में काम हो रहा है.
समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से यह एक अहम बदलाव इस्लामाबाद के रुख में आया है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने सिर्फ दो हफ्ते पहले ही साफ किया था कि मक्का समझौते को अभी संस्थागत रूप दिया जा रहा था और यमन में हूती ठिकानों पर हमले में पाकिस्तान की भागीदारी पर कोई चर्चा नहीं हुई है. विदेश मंत्रालय ने इस समझौते को एक रक्षात्मक गठबंधन भी बताया था, जिसका मकसद डिटरेंस के जरिए क्षेत्रीय सुरक्षा की रक्षा करना था.
शनिवार तड़के रियाद से जारी बयानों की भाषा कहीं ज्यादा आगे की बात करती है. तीनों सेना प्रमुखों की बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया है कि उन्होंने "खुफिया सहयोग, सैन्य तालमेल और क्षमताओं को एक साथ लाने" को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की. साथ ही, उन्होंने संयुक्त रक्षा के लिए मक्का समझौते में किए गए वादों को तुरंत असरदार सैन्य सहयोग में बदलने के अपने साझा संकल्प को भी दोहराया. समझौतों को तेजी से लागू करने की यह प्रक्रिया यमन से सऊदी अरब पर बार-बार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच हो रही है. ऐसे में समझा जा सकता है कि इसकी गंभीरता कितनी है?
मगर कुछ तो करेंगे ही
इस घोषणा का एक मतलब ये भी हो सकता है इंटेलिजेंस की बेहतर शेयरिंग और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था तीनों देश करें. साथ ही, इसमें तकनीकी कर्मचारी, एयर डिफेंस स्पेशलिस्ट, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताएं और अन्य संसाधन शामिल होंगे जिन्हें सऊदी अरब के मौजूदा डिफेंस सिस्टम में जोड़ा जा सकेगा. इस चक्कर में पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब से भारी-भरकम रकम हासिल कर लेंगे. मगर सोचने वाली बात ये है कि सऊदी अरब को इसकी जरूरत क्या है? उसके पास तो पहले से ही अमेरिका से मिले हथियार हैं. अब एफ 35 की डील भी हो रही है तो वो पाकिस्तान के चीनी माल और तुर्की के हथियार क्यों खरीदेगा? दूसरी बड़ी बात ये है कि क्या अमेरिका अपने हथियारों तक पाकिस्तान की पहुंच स्वीकार करेगा? क्योंकि पाकिस्तान की पहुंच का सीधा मतलब है चीन के पास सूचना का पहुंचना.
तो फिर भविष्य क्या
हां, ये जरूर है कि सऊदी भी ईरान को एक तरह से चेतावनी देने के लिए अभी इस गठबंधन का इस्तेमाल कर रहा है. सऊदी दिखाना चाहता है कि उसके साथ अमेरिका के साथ-साथ पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश भी लड़ाई में साथ हैं. वहीं तुर्की और पाकिस्तान भी ऐसा ही संदेश साइप्रस और भारत को देना चाहते हैं. हालांकि, दुनिया भर के एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान ने हूतियों के जरिए मक्का समझौते के तुरंत बाद बार-बार सऊदी पर हमला करवा कर ये टेस्ट किया कि क्या मक्का समझौते के तहत तीनों देश एक साथ लड़ने के लिए आएंगे या नहीं. जवाब मिल चुका है. तीनों देश खूब बयान जारी करेंगे. कभी-कभी मीटिंग कर भी अपने गठबंधन को प्रभावी दिखाने की कोशिश करेंगे, मगर कोई भी देश किसी दूसरे देश के युद्ध में शामिल नहीं होने चाहेगा. ऐसा भी माना जा रहा है कि एक बार ईरान युद्ध समाप्त हो गया और इन दोनों देशों ने सऊदी का साथ नहीं दिया तो फिर सऊदी भी इनको कोई बड़ी फंडिंग नहीं देगा. जाहिर है इस गठबंधन का अब बहुत ज्यादा असर नहीं रह गया है, लेकिन फिर भी भारत जैसे देशों को इस पर सतर्क नजर तो रखनी ही होगी.
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