- ट्रंप ने ईरान के साथ शांति समझौते की बातचीत को सकारात्मक बताया था लेकिन ईरान ने इसे खारिज किया
- ईरानी प्रवक्ता ने अमेरिका से कहा कि अपनी हार को समझौता न समझें और क्षेत्र में स्थिरता उनकी ताकत में है
- ईरान ने साफ किया कि पूर्व की स्थिति तब तक नहीं लौटेगी जब तक वे न चाहें और अमेरिका के साथ कोई समझौता नहीं होगा
मिडिल ईस्ट में जारी जंग थमने का नाम नहीं ले रही. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि ईरान के साथ शांति समझौते को लेकर बातचीत सही दिशा में जा रही है, लेकिन 24 घंटे के भीतर ही ईरान ने इस दावे की हवा निकाल दी है. ईरान ने सीधे शब्दों में अमेरिका से कहा है कि वह 'अपनी हार को समझौता न कहे'. इस बयान ने किसी भी संभावित सफलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं और मिडिल ईस्ट में युद्ध को लेकर वैश्विक अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है.
'अपनी हार को समझौता मत कहो'
ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने को लेकर दो दिनों तक बहुत अच्छी और प्रोडेक्टिव बातचीत हुई है. लेकिन ईरानी सैन्य कमान के प्रवक्ता ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया. अल जजीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार ईरानी सैन्य प्रवक्ता ने कहा, 'अपनी हार को समझौता मत कहिए. इस इलाके में तुम्हारे (अमेरिका) निवेश का कोई निशान नहीं बचेगा और न ही तुम्हें ऊर्जा और तेल की पुरानी कीमतें फिर कभी देखने को मिलेंगी, जब तक तुम यह नहीं समझ जाते कि इस क्षेत्र में स्थिरता की गारंटी हमारी सेनाओं के मजबूत हाथों में है. स्थिरता ताकत से आती है.'
'कभी पहले जैसी स्थिति नहीं होगी'
उन्होंने आगे कहा, 'हम साफ तौर पर ऐलान करते हैं कि कोई भी स्थिति तब तक वैसी नहीं होगी जैसी पहले थी, जब तक हम न चाहें. पहले दिन से ही हमारी पहली और आखिरी बात यही रही है कि हमारे जैसा कोई भी व्यक्ति तुम्हारे जैसे से कभी समझौता नहीं करेगा. न अभी और न ही भविष्य में.' उन्होंने कहा, 'क्या तुम्हारी अपनी ही उलझनें अब उस हद तक पहुंच गई हैं, जहां तुम खुद से ही बातचीत कर रहे हो.'
ईरानी अधिकारियों ने ट्रंप के दावों को फेक न्यूज करार दिया है. विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका को शायद अब यह एहसास हो गया है कि उसने ईरान की जवाबी कार्रवाई की ताकत को कम करके आंका था. दूसरी ओर, तेहरान शायद अमेरिका पर इतनी आसानी से भरोसा करने को तैयार न हो, खासकर तब जब अमेरिका ने 28 फरवरी को जब बातचीत चल रही थी, हवाई हमले कर दिए थे.

Iran War
ट्रंप का 'डबल गेम'
इस पूरे मामले में ट्रंप की रणनीति उलझी हुई नजर आ रही है. एक तरफ उन्होंने ईरानी ऊर्जा संयंत्रों पर सैन्य हमलों को 5 दिनों के लिए टालने का आदेश दिया है. वहीं दूसरी ओर, रिपोर्ट्स हैं कि ट्रंप प्रशासन अपनी एलीट '82nd एयरबोर्न डिवीजन' के करीब 3,000 सैनिकों को मिडिल ईस्ट भेज रहा है.सवाल यह है कि अगर अमेरिका सक्रिय रूप से कूटनीतिक समाधान की कोशिश कर रहा है, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में सेना क्यों भेजी जा रही है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि बातचीत की मेज पर ईरान को झुकाने के लिए ट्रंप सैन्य तैनाती का दबाव बना रहे हैं.
वहीं ट्रंप ने कहा कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और अन्य लोग ईरान के साथ बातचीत का नेतृत्व कर रहे हैं. ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'मैं आपको बता सकता हूं कि वे एक डील करना चाहते हैं. उनकी नेवी खत्म हो चुकी है, उनकी एयर फोर्स खत्म हो चुकी है, उनका कम्युनिकेशन सिस्टम ठप हो चुका है. यही सबसे बड़ी समस्या है.'
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ईरान के पलटवार से अमेरिका हैरान
अमेरिका को लगा था कि सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को खत्म करने के बाद ईरान का सिस्टम चरमरा जाएगा और वहां तख्तापलट हो जाएगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. इसके विपरीत, ईरान की एलीट IRGC ने पूरी ताकत से पलटवार किया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. खुद डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा, 'किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी। हम हैरान थे'.
समझौते पर क्यों नहीं मान रहा ईरान?
युद्ध को 4 हफ्ते बीत चुके हैं और ईरान अमेरिका व इजरायल की संयुक्त ताकत के सामने मजबूती से टिका हुआ है. अमेरिका ने ईरान को 15-सूत्रीय मांगों की एक लिस्ट भेजी है, जिसे ईरान पहले भी ठुकरा चुका है. अयातुल्ला के मारे जाने के बाद ईरानी नेतृत्व किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं दिखना चाहता. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक कर दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भारी संकट आ गया है. ईरान अब युद्ध को खींचकर एक ऐसी बेहतर डील चाहता है जो भविष्य में उसकी सुरक्षा की पक्की गारंटी दे सके.
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