अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही ईरान के खिलाफ हर मोर्चे पर जीत का दावा किया हो, लेकिन जंग शुरू होने के तीन महीने बाद अब वाशिंगटन के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या ट्रंप वाकई यह जंग हार रहे हैं? हालांकि अमेरिकी सेना को शुरुआती तकनीकी कामयाबी जरूर मिली, लेकिन जानकारों का मानना है कि ट्रंप इसे एक बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक जीत में बदलने में नाकाम साबित हो रहे हैं. अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान का 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज'पर शिकंजा बरकरार है, परमाणु समझौते को लेकर उसका रुख कायम है और वहां की हुकूमत को भी कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप के जीत के दावे अब खोखले नजर आने लगे हैं. हालात यह हैं कि दोनों देश इस वक्त बेहद नाजुक मोड़ पर खड़े हैं, जहां एक तरफ कड़वी कूटनीति है तो दूसरी तरफ ट्रंप की ओर से दोबारा हमले शुरू करने की धमकियां. अगर अमेरिका फिर से हमला करता है, तो पूरे खाड़ी क्षेत्र में ईरान के पलटवार का खतरा मंडराने लगेगा.
कागजी जीत बनाम जमीनी हकीकत

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रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों सरकारों में मध्य पूर्व के वार्ताकार रहे हारून डेविड मिलर का कहना है, "तीन महीने गुजर चुके हैं और जो जंग ट्रंप के लिए एक छोटी और आसान जीत मानी जा रही थी, वह अब एक बड़ी रणनीतिक नाकामी में बदलती दिख रही है."
ट्रंप के लिए यह स्थिति बेहद परेशान करने वाली है, क्योंकि वे अपनी हार बर्दाश्त नहीं कर पाते. दुनिया की सबसे ताकतवर फौज का कमांडर होने के बावजूद, वे एक ऐसी क्षेत्रीय ताकत के सामने फंसे हुए नजर आ रहे हैं जिसका हौसला पस्त नहीं हुआ है.
व्हाइट हाउस का दावा क्या है?
इस बीच व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ओलिविया वेल्स ने सरकार का बचाव करते हुए कहा है कि अमेरिका ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' में अपने सभी सैन्य लक्ष्यों को हासिल कर लिया है. उन्होंने दावा किया कि बाजी पूरी तरह राष्ट्रपति ट्रंप के हाथ में है और उन्होंने सारे रास्ते खुले रखे हैं. लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप ने चुनाव के वक्त वादा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं धकेलेंगे, पर अब वे एक ऐसे दलदल में फंस चुके हैं जिससे उनकी साख को गहरा धक्का लग सकता है.
अमेरिका के भीतर भी ट्रंप पर दबाव बढ़ता जा रहा है. देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं और नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ट्रंप की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरा है. ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी के लिए संसद पर अपना कब्जा बरकरार रखना मुश्किल हो रहा है. सीजफायर (युद्धविराम) लागू हुए छह हफ्ते से ज्यादा का वक्त हो चुका है और ट्रंप के पास अब दो ही रास्ते बचे हैं या तो वे किसी तरह का समझौता करके अपने साख बचाते हुए पीछे हट जाएं या फिर जंग को और भड़काएं.

नए मोर्चे की तलाश
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर ईरान के साथ बात नहीं बनी, तो ट्रंप ध्यान भटकाने के लिए क्यूबा की तरफ रुख कर सकते हैं ताकि वहां कोई आसान जीत हासिल कर सकें. लेकिन यह भी एक बड़ी भूल साबित हो सकती है, ठीक वैसे ही जैसे उनके सलाहकारों ने माना था कि ईरान की कार्रवाई वेनेजुएला के उस छापे जैसी आसान होगी जिसमें वहां के राष्ट्रपति को हटा दिया गया था. हालांकि, ट्रंप के समर्थकों का कहना है कि ईरान की सैन्य ताकत को तोड़ना और खाड़ी देशों को चीन से दूर लाकर अमेरिका के पाले में खड़ा करना अपने आप में एक बड़ी कामयाबी है.
लेकिन ट्रंप की झुंझलाहट साफ दिखने लगी है. वे मीडिया और अपने आलोचकों पर लगातार भड़ास निकाल रहे हैं. ट्रंप ने जब 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर यह जंग शुरू की थी, तब उन्होंने इसके छह हफ्ते में खत्म होने का दावा किया था. आज समय दोगुना हो चुका है और संसद में खुद उनकी अपनी पार्टी के सांसदों के भी सुर बदलने लगे हैं. शुरुआती हमलों में ईरान की मिसाइलों और नौसेना को भारी नुकसान पहुंचाने के बाद भी, अमेरिका ईरान को घुटनों पर लाने में नाकाम रहा है.
अधूरे वादे
ट्रंप ने जंग की शुरुआत में तीन बड़े मकसद रखे थे. ईरान के परमाणु रास्ते को हमेशा के लिए बंद करना, क्षेत्र में उसके खतरों को खत्म
करना और वहां की जनता के जरिए हुकूमत का तख्तापलट करना. लेकिन इनमें से एक भी लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है. राष्ट्रीय खुफिया अधिकारी रहे जोनाथन पनिकोफ का कहना है कि ईरान इतने बड़े हमलों के बाद भी खुद को जिंदा बचाकर ही अपनी जीत मान रहा है. ईरान को समझ आ गया है कि वह खाड़ी के समुद्री रास्तों को रोककर अमेरिका पर दबाव बना सकता है और इसके लिए उसे कोई बड़ी कीमत भी नहीं चुकानी पड़ेगी.
सहयोगियों की बेरुखी भी परेशान कर रही होगी
ट्रंप का यह सोचना भी गलत साबित हुआ कि जंग से ईरान के उग्रवादी गुटों को मिलने वाली मदद रुक जाएगी. उल्टा, ईरान में अब पहले से भी ज्यादा सख्त मिजाज के नेता सत्ता में आ चुके हैं. इसके अलावा, अमेरिका के पारंपरिक यूरोपीय सहयोगियों ने भी इस जंग से दूरी बना ली है क्योंकि ट्रंप ने हमला करने से पहले उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया था. चीन और रूस भी इस पूरी जंग को करीब से देख रहे हैं और अमेरिकी सैन्य तौर-तरीकों की कमजोरियों को भांप रहे हैं.
मशहूर विचारक रॉबर्ट कगन ने इस पूरे मामले पर अपनी बेबाक राय रखते हुए लिखा है कि यह नतीजा वियतनाम और अफगानिस्तान में अमेरिका को मिली हार से भी ज्यादा शर्मनाक साबित हो सकता है.
उनके मुताबिक, "अब पुराने हालात वापस नहीं आने वाले. अमेरिका की कोई भी ऐसी अंतिम जीत नहीं होने जा रही जो इस जंग से हुए नुकसान की भरपाई कर सके. ईरान के मामले में अमेरिका अब शह-मात के खेल में फंस चुका है."
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