- अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स को हथियार डालने की चेतावनी दी
- IRGC की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद नई इस्लामी व्यवस्था की रक्षा के लिए की गई थी
- IRGC के पास अपनी थलसेना, वायुसेना, नौसेना और विदेशों में गुप्त ऑपरेशन चलाने वाली यूनिट मौजूद है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) को चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें हथियार डाल देने चाहिए, नहीं तो इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. वहीं IRGC के सैनिकों ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी हालत में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. IRGC को ईरान के सुप्रीम लीडर की सबसे भरोसेमंद और ताकतवर सैन्य ताकत माना जाता है.
इस्लामी क्रांति के बाद उभरा शक्तिशाली सैन्य संगठन
IRGC की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद नई इस्लामी व्यवस्था की रक्षा करने और देश को अंदरूनी तथा बाहरी खतरों से बचाने के मकसद से की गई थी. समय के साथ यह संगठन इतना शक्तिशाली हो गया कि आज इसके पास अपनी थलसेना, वायुसेना और नौसेना तक मौजूद हैं. विदेशों में गुप्त ऑपरेशन चलाने के लिए इसकी अलग यूनिट भी काम करती है. IRGC का इतिहास ईरान की राजनीतिक उथल-पुथल से जुड़ा है.
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ईरान-इराक युद्ध और कुद्स फोर्स की भूमिका
1979 में अयातुल्ला रुहुल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति हुई और शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता समाप्त हो गई. उस समय सेना के भीतर बगावत की आशंका को देखते हुए IRGC का गठन किया गया. साल 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध में IRGC ने अहम भूमिका निभाई. विदेशी ऑपरेशन के लिए इसकी विशेष यूनिट “कुद्स फोर्स” बनाई गई, जो ईरान के बाहर खुफिया और सैन्य मिशन संचालित करती है.
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IRGC की ताकत और रणनीतिक प्रभाव
IRGC की कई शाखाएं हैं, ग्राउंड फोर्स, एयरोस्पेस फोर्स, नेवी, इंटेलिजेंस और बासिज फोर्स. IRGC के पास करीब 2.3 लाख प्रशिक्षित सैनिक हैं. गौर करने वाली बात ये है कि यह संगठन ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम से भी जुड़ा माना जाता है. इसी वजह से आज IRGC सिर्फ एक सैन्य बल नहीं, बल्कि ईरान की सत्ता संरचना का सबसे शक्तिशाली स्तंभ भी माना जाता है.
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