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क्या जंग के बीच ईरान में महिलाएं आजाद हो गई हैं या बिना हिजाब आ रही तस्वीरों की सच्चाई कुछ और

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस महीने कहा कि ईरान में अनिवार्य हिजाब के विरोध ने अधिकारियों को पिछले वर्षों की हिंसक सामूहिक गिरफ्तारियों और हमलों से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया है.हालांकि, अधिकारियों ने कार्यस्थलों, विश्वविद्यालयों और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में अनिवार्य हिजाब लागू करने के लिए मौजूदा कानूनों और नियमों का इस्तेमाल जारी रखा है.

क्या जंग के बीच ईरान में महिलाएं आजाद हो गई हैं या बिना हिजाब आ रही तस्वीरों की सच्चाई कुछ और
ईरान में आजकल बगैर हिजाब पहने लड़कियां और महिलाएं नजर आना आम हो गया है.
  • तेहरान में बिना हिजाब के महिलाओं की उपस्थिति और कैफे की तस्वीरें देश में बदलाव का संकेत नहीं हैं
  • ईरान में अनिवार्य हिजाब नियम का पालन कुछ शहरों में कमजोर हुआ है लेकिन अभी भी सख्ती बरती जाती है
  • महसा अमिनी की मौत के बाद महिलाओं द्वारा हिजाब विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए और इस संघर्ष की स्थिति अभी जारी है
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तेहरान के कैफे में बिना सिर ढके कॉफी पीती महिलाओं की तस्वीरों ने ईरान के बाहर भी लोगों का ध्यान खींचा है, लेकिन 32 वर्षीय एल्नाज के लिए यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. तेहरान की चित्रकार एल्नाज ने कहा, "मेरी राय में यह सरकार में किसी भी बदलाव का संकेत नहीं है, क्योंकि महिलाओं के अधिकारों के संबंध में कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है. वास्तव में, लोगों की स्वतंत्रता में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आया है, खासकर जब बात महिलाओं के बुनियादी अधिकारों की हो." इतना कहने के बाद एल्नाज ने एएफपी से उनका पूरा नाम इस बयान के साथ प्रकाशित नहीं करने का अनुरोध किया.

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ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के तुरंत बाद से ही महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर सिर ढकना अनिवार्य कर दिया गया था, जिसे लंबे समय से धार्मिक नेतृत्व का एक वैचारिक स्तंभ माना जाता रहा है, लेकिन इस नियम का पालन कमजोर होता दिख रहा है, कम से कम तेहरान और अन्य शहरों के कुछ हिस्सों में.

यह चलन 2022-2023 में महसा अमिनी की हिरासत में हुई मौत के बाद शुरू हुआ, जिन्हें कथित तौर पर ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में तेहरान में गिरफ्तार किया गया था. यह चलन जून 2025 में इजरायल के साथ युद्ध, जनवरी में महंगाई के विरोध में हुए प्रदर्शनों और अब अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध (जो फिलहाल युद्धविराम के साथ रुका हुआ है) तक जारी है. उन खूंखार सफेद गश्ती वैन का अब कोई नामोनिशान नहीं है, जो कभी चौकों और गलियों के कोनों पर महिलाओं को नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में पकड़ने के लिए घूमती रहती थीं.

लेकिन स्थिति अभी भी मिली-जुली है. कुछ महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अभी भी उनकी अपनी मर्जी है. तेहरान के अधिक उदार क्षेत्रों में भी हिजाब पहनने वाली और नहीं पहनने वाली महिलाओं को साथ-साथ चलते देखना आम बात है.

कुछ साल पहले तक था 'सिर्फ एक सपना'

कुछ क्षेत्रों में यह बदलाव चौंकाने वाला रहा है, जहां महिलाएं बिना हिजाब के बेफिक्र होकर घूमती नजर आती हैं, जो पांच साल पहले तक अकल्पनीय था. मध्य ईरान के इस्फहान की रहने वाली 57 वर्षीय गृहिणी जहरा ने कहा, "मैं उन सभी के लिए खुश हूं, क्योंकि तीन साल पहले तक यह सिर्फ एक सपना था. मेरी जवानी बीत गई और मुझे ये अनुभव नहीं मिल पाए; अब मैं हिजाब नहीं पहनती, लेकिन काश मैं जवानी के दिनों में ये सब अनुभव कर पाती."

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लेकिन हिजाब नहीं पहनने पर भी महिलाओं को अधिकारियों द्वारा तलब किया जा सकता है, और नियम का पालन नहीं करने पर कैफे बंद किए जा सकते हैं, जबकि अक्सर महिलाओं को बैंकों, शिक्षण संस्थानों और सरकारी इमारतों में प्रवेश करने के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य होता है.

इसके अलावा, मानवाधिकार समूहों के अनुसार, महिलाओं के अधिकार अभी भी सीमित हैं और वे एक ऐसी व्यवस्था के अधीन जी रही हैं, जिसने जनवरी के विरोध प्रदर्शनों के बाद हजारों लोगों को गिरफ्तार किया और मौजूदा युद्ध में महिलाओं सहित हजारों और लोगों को गिरफ्तार किया.

तेहरान में एक कैफे की मालकिन 34 वर्षीय नेगिन ने कहा, "कैफे और लड़कियों की खूबसूरत तस्वीरें हर जगह साझा की जा रही हैं, लेकिन कैपे मालिकों के रूप में, हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है." उन्होंने आगे कहा, "इन वर्षों में हमारे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया गया है, और यह सिलसिला आज तक जारी है। हमें कई बार बंद कराया गया, जुर्माना लगाया गया और रिश्वत देनी पड़ी... मुझे और भी गुस्सा तब आता है जब वे इसे 'आज़ादी' कहते हैं और कहते हैं कि महिलाएं ज्यादा आजाद हो रही हैं."

छूट या मौके की नजाकत

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस महीने कहा कि अनिवार्य हिजाब के प्रति व्यापक प्रतिरोध ने अधिकारियों को पिछले वर्षों की हिंसक सामूहिक गिरफ्तारियों और हमलों से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया है. हालांकि, अधिकारियों ने कार्यस्थलों, विश्वविद्यालयों और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में अनिवार्य हिजाब लागू करने के लिए मौजूदा कानूनों और नियमों का इस्तेमाल जारी रखा, जिससे विरोध करने वाली महिलाओं और लड़कियों को उत्पीड़न, मारपीट, मनमानी गिरफ्तारी, जुर्माना और रोजगार और शिक्षा से निष्कासन का सामना करना पड़ा.

एक उल्लेखनीय बदलाव यह रहा है कि सरकारी टेलीविजन पर हिजाब नहीं पहनने वाली ईरानी महिलाओं की तस्वीरें प्रसारित की जा रही हैं - लेकिन केवल तभी जब वे इस्लामी गणराज्य का समर्थन करती हैं और ईरान के दुश्मनों की निंदा करती हैं, जिसे आलोचक एक धूर्त चाल मानते हैं.

तेहरान की 39 वर्षीय गृहिणी शहरजाद ने कहा, "अधिक से अधिक महिलाएं हर दिन अपने डर को दरकिनार कर हिजाब के बिना बाहर निकलने का अनुभव कर रही हैं, और यह धीरे-धीरे अधिक व्यापक होता जा रहा है. लेकिन मुझे सरकारी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है. यह पहले जैसी ही है, सिवाय उन वीडियो के जिनमें लड़कियां बिना हिजाब के सरकारी समाचार कैमरों के सामने जाकर कह रही हैं, 'मेरे नेता, मेरे नेता, मैं उनके लिए खुद को कुर्बान कर दूंगी'.

'कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा'

ईरान में स्थिति एक जैसी नहीं है. 32 वर्षीय छात्रा महसा ने बताया कि पूर्वी ईरान के प्रमुख शहर मशहद में नियम और पालन अधिक सख्त हैं, जहां शिया इस्लाम के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक स्थित है. उन्होंने कहा, "जून में इजरायल के खिलाफ 12 दिन के युद्ध से पहले, मशहद में हमें हिजाब के बिना कहीं भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता था. अब वे लोगों को प्रवेश तो देते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से, हमें उतना बदलाव नहीं देखने को मिला है, जितना तेहरान के लोगों ने पिछले तीन वर्षों में देखा है."

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ईरान के रूढ़िवादी बड़े शहरों में से एक माने जाने वाले इस्फहान की 41 वर्षीय फरनाज ने बताया कि उन्हें इस महीने के अंत में हिजाब के पालन को लेकर अदालत में पेश होने के लिए समन भेजा गया है. इस्फहान में, पिछले कुछ दिनों से हिजाब के मुद्दे पर कैफे फिर से सील किए जा रहे हैं. उन्होंने युद्ध की स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार भी नहीं किया. यहां, आपको सरकार और आम जनता दोनों से निपटना पड़ता है. पहले की तरह ही कुछ इलाकों में, धार्मिक लोग कभी-कभी आपको चेतावनी देते हैं और परेशान करते हैं. यह सिर्फ मोरल पुलिस का मामला नहीं है. उन्होंने आगे कहा, "मुझे कोई खास बदलाव नज़र नहीं आ रहा."

इस्फ़हान की ही रहने वाली 35 वर्षीय मरियम ने बताया कि कुछ बैंकों में बिना हिजाब वाली महिलाओं को सेवा नहीं दी जाती. दुकानदारों को भी हिजाब पहनना पड़ता है. अगर आप सामाजिक या आर्थिक गतिविधियों में शामिल हैं, तो आपसे हिजाब पहनने की उम्मीद की जाती है. इस्फहान की गृहिणी जहरा ने कहा, "यहां तक पहुंचने के लिए हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. मानवाधिकार समूहों के अनुसार, महसा अमिनी विरोध प्रदर्शनों पर हुई कार्रवाई में सैकड़ों लोग मारे गए थे. अभी, वे (अधिकारी) सिर्फ युद्ध में उलझे हुए हैं, लेकिन उसके बाद, कौन जाने वे इसके बारे में क्या करेंगे.

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