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अमेरिका में कौन लोग हैं जो ट्रंप को हटाना चाहते हैं? क्या ईरान युद्ध से ट्रंप के दुश्मन और बढ़े?

डोनाल्ड ट्रंप बेबाक हैं. अपनी बात खुलकर रखते हैं. यही कारण है कि उनके विरोधी भी बहुत हैं. उनकी 'अमेरिका पहले' की नीति से अमेरिका में ही कई लोग असहज हैं. ईरान युद्ध के बाद उनकी रेटिंग भी काफी कम हुई है. इस बीच उन पर तीसरी बार हमला किया गया.

अमेरिका में कौन लोग हैं जो ट्रंप को हटाना चाहते हैं? क्या ईरान युद्ध से ट्रंप के दुश्मन और बढ़े?
ट्रंप तीसरी बार जानलेवा हमले में बच गए हैं.
  • डोनाल्ड ट्रंप पर अब तक तीन बार जानलेवा हमले की कोशिश की जा चुकी है, जिनमें से पहला हमला जुलाई 2024 में हुआ था
  • पहला हमलावर थॉमस मैथ्यू क्रुक्स था, जिसने चुनावी रैली में फायरिंग की, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हुई थी
  • दूसरा हमला सितंबर 2024 में रयान वेस्ली राउथ ने किया था, जो ट्रंप से नफरत करता था और उसे उम्रकैद की सजा मिली है
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर शनिवार देर रात वाशिंगटन हिल्टन के इंटरनेशनल बॉलरुम में जानलेवा हमला करने की कोशिश की गई. वो ट्रंप तक पहुंच पाता या हमला कर पाता, उससे पहले ही पकड़ा गया. ये ट्रंप पर तीसरी बार हमला हुआ है. सवाल है क्यों? अमेरिकी खुफिया एजेंसिया हमलावर से इस बारे में पूछताछ कर रही हैं. यूं तो अमेरिका के राष्ट्रपति के दुश्मन पूरी दुनिया में हैं, लेकिन अमेरिका में भी कम नहीं हैं. अमेरिका का इतिहास भी यही बता बताता है. जब-जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों से अमेरिकी लोगों में उबाल आया है तो उन पर हमला हुआ है.

अमेरिका के अब तक 7 राष्ट्रपतियों पर हमला हो चुका है. इन हमलों में अमेरिका के 4 राष्ट्रपति की हत्या तक हो चुकी है. बचने वालों में फ्रैंकलिन डी रूजेवेल्ट, रोनाल्ड रीगन और डोनाल्ड ट्रंप हैं. 

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13 जुलाई 2024 को ट्रंप पर पहला हमला

थॉमस मैथ्यू क्रुक्स नाम का 20 साल का युवक अमेरिका के ही पेंसिल्वेनिया के बेथेल पार्क का रहने वाला था. पेंसिल्वेनिया के बटलर में चुनावी रैली में शाम करीब 6:15 बजे उसने ट्रप पर हमला किया. क्रुक्स रैली स्टेज से करीब 130 गज दूर एक निर्माणाधीन बिल्डिंग की छत पर था. उसने AR-15 स्टाइल राइफल से गोलियां चलाईं. एक गोली ट्रंप के दाएं कान को छूती हुई निकल गई. रैली में आए 1 शख्स की मौत हो गई और 2 गंभीर रूप से घायल हो गए. सीक्रेट सर्विस के स्नाइपर ने तुरंत क्रुक्स को मार गिराया. क्रुक्स का मकसद क्या था ये आज तक पता नहीं चला. FBI और तत्कालीन राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा कि हमले का कोई ज्ञात मकसद पता नहीं चला. जांच में ये बातें सामने आईं कि क्रुक्स रजिस्टर्ड रिपब्लिकन था, लेकिन 17 साल की उम्र में उसने डेमोक्रेटिक ग्रुप ActBlue को $15 डोनेट किए थे. 2022 में हाई स्कूल से ग्रेजुएट, मैथ-साइंस में $500 का अवार्ड मिला था. उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था. FBI ने बयान जारी किया, "शूटर के मकसद का अभी पता नहीं चल पाया है." बाइडेन ने कहा, "अभी तक हमें शूटर के मकसद के बारे में कोई जानकारी नहीं है. आप सभी से मेरी अपील है कि हमलावर के मकसद को लेकर ज्यादा धारणा न बनाएं."

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15 सितंबर 2024 को ट्रंप पर दूसरा हमला

59 साल का रयान वेस्ली राउथ अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना का रहने वाला था. फ्लोरिडा के वेस्ट पाम बीच में ट्रंप इंटरनेशनल गोल्फ क्लब में 15 सितंबर 2024 को सेमी-ऑटोमैटिक राइफल लेकर गोल्फ कोर्स की बाड़ के पास झाड़ियों में छिपा था. ट्रंप से दूरी सिर्फ 250-350 मीटर थी. तभी सीक्रेट सर्विस एजेंट ने झाड़ियों से राइफल की नाल देखी और फायर किया. राउथ मौके से भागा, लेकिन AK-47 स्टाइल राइफल, 2 बैकपैक और GoPro कैमरा छोड़ गया. बाद में गिरफ्तार हुआ. पूछताछ में पता चला कि उसे ट्रंप से नफरत थी. अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में बताया कि राउथ का ऑनलाइन रिकॉर्ड ट्रंप के प्रति नफरत दिखाता है. उसने अपनी किताब में भी ट्रंप की हत्या की बात लिखी थी. प्रॉसिक्यूटर ने कहा कि राउथ का मकसद "अमेरिकी लोकतंत्र को खत्म करना" था. जज एलीन कैनन ने कहा - "यह साफ है कि उसने एक इंसान की जान लेने के लिए सोची-समझी साजिश रची थी." राउथ पहले भी कई आपराधिक मामलों में दोषी रह चुका है. चोरी का सामान रखने जैसे आरोप थे. वो यूक्रेन समर्थक था, 2022 में यूक्रेन जाकर लड़ने की कोशिश भी की थी. फरवरी 2026 में फ्लोरिडा की कोर्ट ने उम्रकैद सुनाई. सुनवाई के दौरान राउथ ने 20 पन्नों का बयान पढ़ने की कोशिश की और खुद को "अच्छा इंसान" बताया, लेकिन जज ने खारिज कर दिया. हालांकि, ट्रंप पर दोनों हमले दूसरे बार राष्ट्रपति बनने से पहले हुए. चुनाव के समय ट्रंप के दावों से ही अमेरिका में काफी तनाव बढ़ गया था.

शनिवार रात हुए तीसरे हमले की जांच अभी जारी है.

अमेरिका में ट्रंप के दुश्मन कौन

ट्रंप के दुश्मनों को जानने से पहले दो बात जान लीजिए. पहला कि अमेरिका में गन रखना आम बात है. दूसरा ये अमेरिका में दो दल हैं. एक डेमोक्रेट और दूसरा रिपब्लिकन. ट्रंप के आने से पहले दोनों दल एक-दूसरे पर तीखे हमले नहीं करते थे. हां, दोनों दल अपने विचार जनता के सामने रखते थे और जनता उसके आधार पर वोट डालती थी. डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी से हैं. रिपब्लिकन पार्टी की पारंपरिक विचारधारा ये है कि ये कम सरकार, कम टैक्स, फ्री मार्केट,गर्भपात के खिलाफ, गन राइट्स के पक्ष में, पारंपरिक परिवार, मजबूत सेना, पीस थ्रू स्ट्रेंथ चाहते हैं. ट्रंप इसमें और फ्लेवर एड करते हैं. वो राइट-विंग पॉपुलिस्ट नेशनलिज्म की बात करते हैं. यही कारण है कि पुराने रिपब्लिकन जैसे बुश और रोमनी भी उन्हें बहुत पसंद नहीं करते. वहीं डेमोक्रेट लिबरल/प्रोग्रेसिव पार्टी है. मानती है कि सरकार को एक्टिव होकर असमानता कम करनी चाहिए. वो अमीरों पर ज्यादा टैक्स, मिनिमम वेज बढ़ाना चाहती है. यूनियन के पक्ष में रहती है. "ट्रिकल-डाउन" के बजाय "मिडिल-आउट" इकोनॉमी चाहती है. क्लाइमेट चेंज को बड़ा खतरा मानती है. गन कंट्रोल, अवैध इमिग्रेंट्स के लिए नागरिकता का रास्ता, बॉर्डर सिक्योरिटी तो चाहती है पर "दीवार" के खिलाफ है. जाहिर है ट्रंप के आने के बाद लिबरल और राइट विंग पॉपुलिस्ट नेशनलिज्म के बीच जंग छिड़ गई है.

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लिबरल बनाम पॉपुलिस्ट नेशनलिज्म क्या है

लिबरल बनाम पॉपुलिस्ट नेशनलिज्म का मतलब ये है कि दोनों विचारधाराएं आपस में टकरा रही हैं. जो गरीब हैं, वो लिबरल पार्टी यानी डेमोक्रेट के पक्ष में हैं. जो अवैध तरीके से अमेरिका में आए हैं, वो भी डेमोक्रेट का समर्थन करते हैं. जो युद्ध नहीं चाहते, वो भी कहीं ना कहीं डेमोक्रेट का समर्थन करते हैं. दूसरे देशों से आकर अमेरिकी नागरिकता पाने वाले भी ज्यादातर डेमोक्रेट को ही समर्थन करते हैं. वहीं ट्रंप अमीरों के पक्ष में ज्यादा नीतियां बनाते हैं. वो मूल अमेरिकी लोगों की बातें करते हैं और उनके पक्ष में खड़े दिखते हैं. वो अमेरिका पहले की बात करते हैं. उनको इससे मतलब नहीं है कि कौन दोस्त है. उनको मतलब है कि अमेरिका को फायदा होना चाहिए. ये ब्रिटेन, यूरोप, भारत जैसे देशों पर उन्होंने टैरिफ लगाकर साबित भी किया है. ऐसे में जाहिर है अमेरिका में जो ट्रंप को पसंद करते हैं, वो बहुत ज्यादा पसंद करते हैं. ट्रंप के दीवाने हैं, लेकिन जो पसंद नहीं करते, वो धीरे-धीरे दुश्मन बनते जा रहे हैं. टैरिफ के बाद अब ईरान युद्ध के कारण अमेरिकियों को भी महंगाई से लेकर बेरोजगारी तक का सामना करना पड़ रहा हैं. 

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