- चीन में दुल्हन लाने के लिए लाखों का ‘ब्राइड प्राइस’, भारत में दहेज से जा रही बेटियों की जान
- भारत में हर दिन 15 से ज्यादा दहेज हत्याएं, आंकड़े चौंकाते हैं
- चीन में पुरुषों की बढ़ती संख्या ने बदल दी शादी की तस्वीर
दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले दो बड़े देशों में एक मूल समस्या की दो अलग-अलग तस्वीर सामने आ रही है. जहां एक ओर चीन में 'ब्राइड प्राइस' के चलते लाखों चीनी युवा शादी से दूरी बनाने की राह चुन रहे हैं. वहीं भारत में हर साल हजारों बेटियों व महिलाओं की मौत दहेज की वजह से हो जाती है. हाल ही में बीबीसी वर्ल्ड के एक स्पेशल पॉडकॉस्ट में बताया गया है कि चीन में करोड़ों युवाओं पर प्रॉपर्टी के साथ-साथ लाखों रुपये के ‘ब्राइड प्राइस' का आर्थिक दबाव है. वहीं भारत में ये दबाव लड़की पर या उसके घरवालों पर होता है. दहेज की कुप्रथा ही भारत में बेटियों को किसी बोझ तरह महसूस कराती है. एक्सपर्ट ने पॉडकॉस्ट में कहा कि चीन में कई युवा पुरुष मानते हैं कि शादी अब सामाजिक संस्था से ज्यादा आर्थिक बोझ बन चुकी है. इसी असंतोष ने चीन में एक नए ‘मैनोस्फेयर' को जन्म दिया है, जिसे हम आगे समझेंगे. लेकिन सबसे पहले बात ‘दहेज सिस्टम' पर करेंगे, जिससे हम चीन और भारत का अंतर समझेंगे, कैसे महंगाई के इस दौर में ये कुरीति हमारे यहां लड़कियों के लिए जानलेवा बन रही है, जबकि चीन में लड़कों की जिंदगी खराब कर रही है.
वन चाइल्ड पॉलिसी का असर आज भी दिख रहा
चीन की वन चाइल्ड पॉलिसी पूरी दुनिया में चर्चित हुई थी, जिसका प्रभाव आज भी वहां के समाज में दिखाई देता है. चीन में कई परिवारों ने इसी नीति के चलते वंश बढ़ाने के लिए बेटों को प्राथमिकता दी, जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि शादी की उम्र आते-आते पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी अधिक हो गई. पॉडकास्ट में इस बात का जिक्र किया गया कि 2027 तक विवाह योग्य आयु वर्ग में पुरुषों की संख्या महिलाओं से करोड़ों अधिक हो सकती है. इस असंतुलन ने विवाह को और अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है. बड़ी संख्या में युवाओं को जीवनसाथी तलाशने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है.
आखिर शादी से क्यों दूर हो रहे हैं युवा?
मकाऊ यूनिवर्सिटी के शोधार्थी (रिसर्च स्कॉलर) यिहुआन झांग के अनुसार चीन में युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत केवल साथी न मिलना नहीं है, बल्कि शादी का खर्च है.
कई पुरुषों का कहना है कि विवाह से पहले घर खरीदना, आर्थिक रूप से स्थिर होना और ‘ब्राइड प्राइस' देना उनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है. इसी वजह से कुछ युवा पुरुष विवाह को खुशी के बजाय आर्थिक बोझ के रूप में देखने लगे हैं.
क्या है ‘ब्राइड प्राइस'?
चीन में ‘कै ली' (Cai Li) या ब्राइड प्राइस एक अहम सामाजिक परंपरा है. शहरी क्षेत्रों में यह अक्सर एक प्रतीकात्मक रस्म होती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसका आर्थिक महत्व काफी अधिक है. इंटरनेशन जर्नल इकोनॉमिक मॉडलिंग में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक ग्रामीण चीन में पारंपरिक तौर पर लिया जाने वाला अत्यधिक ‘ब्राइड प्राइस' (दुल्हन मूल्य) आज भी एक बड़ी आर्थिक चुनौती बना हुआ है. यह व्यवस्था कई युवा ग्रामीण पुरुषों को आर्थिक दबाव के ऐसे चक्र में फंसा देती है, जिससे उनकी शादी करने और बच्चे पैदा करने की इच्छा कमजोर पड़ रही है. जिन क्षेत्रों में ब्राइड प्राइस की राशि अधिक है, वहां के पुरुषों में विवाह और संतान पैदा करने की अपेक्षा तथा इच्छा दोनों अपेक्षाकृत कम पाई गई हैं. यह प्रवृत्ति विशेष रूप से करीब 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में अधिक स्पष्ट रूप से देखी गई है.
वहीं एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह मुद्दा केवल महिलाओं से नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक ढांचे से जुड़ा हुआ है.

1961 से प्रतिबंध फिर भी हर साल हजारों हत्याएं
भारत में 1961 से दहेज पर कानूनी प्रतिबंध है, लेकिन हमारे समाज की कड़वी सच्चाई यह है कि दूल्हे के परिवार की ओर से दहेज की मांग आज भी बड़ी बेशर्मी से जारी है. दहेज की मांग पूरी न कर पाने वाली महिलाओं को कई मामलों में शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न, प्रताड़ना तथा कुछ मामलों में हत्या तक का सामना करना पड़ता है.
चार बड़ी खामियां, लेकिन कानून में सुधार नहीं
ओपी जिंदल लॉ कॉलेज के एक रिसर्च आर्टिकल में बताया गया है कि दहेज निषेध कानून और उससे जुड़े मामलों में अदालतों ने वर्षों से चार प्रमुख संरचनात्मक कमियों की ओर ध्यान दिलाया है. पहली समस्या ‘दहेज' की परिभाषा को लेकर है. कानून में इसकी परिभाषा व्यापक है, लेकिन जांच एजेंसियां और प्रवर्तन तंत्र अक्सर इसे सीमित अर्थों में लागू करते हैं, जिससे कई मामलों में पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता.
तीसरी समस्या भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113बी से जुड़ी है, जिसमें दहेज मृत्यु के मामलों में एक वैधानिक अनुमान (Presumption) का प्रावधान है, लेकिन प्रारंभिक साक्ष्य की कमी के कारण यह प्रावधान कई बार लागू ही नहीं हो पाता. चौथी समस्या जमानत व्यवस्था से जुड़ी है. धारा 498ए के दुरुपयोग को रोकने के लिए बने सुरक्षा उपाय कई मामलों में आरोपियों को साक्ष्य प्रभावित करने, जांच में सहयोग न करने और दंड से बचने का अवसर दे देते हैं.
भारत में हर 90 मिनट में एक मौत दहेज की वजह से
एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में दहेज हत्या के मामलों में पिछले एक दशक में गिरावट जरूर आई है, लेकिन समस्या अब भी भयावह बनी हुई है. 2024 में देशभर में 5,737 दहेज हत्याएं दर्ज की गईं, यानी औसतन हर दिन 15 से अधिक महिलाओं की जान दहेज से जुड़े उत्पीड़न और हिंसा के कारण गई. सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश (2,038), बिहार (1,078) और मध्य प्रदेश (450) में दर्ज हुए. राजस्थान और पश्चिम बंगाल भी इस सूची में प्रमुख राज्यों में शामिल रहे. आंकड़े संकेत देते हैं कि दहेज प्रथा और उससे जुड़ी हिंसा आज भी कई राज्यों में सामाजिक संरचना का गहरा हिस्सा बनी हुई है.

एनसीआरबी के आंकड़े क्या कहते हैं?
एनसीआरबी के अनुसार 2024 में देश में पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1.20 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए. उत्तर प्रदेश में 21 हजार से ज्यादा और पश्चिम बंगाल में 19 हजार से अधिक मामले सामने आए. वहीं दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में लगभग 37 प्रतिशत मामले अब भी लंबित हैं.

इन राज्यों के आंकड़े सबसे ज्यादा खराब
आदिवासी समुदाय और पूर्वोत्तर राज्यों में उलट है तस्वीर
भारत में जहां दहेज प्रथा आज भी कई राज्यों में सामाजिक अभिशाप बनी हुई है और हर साल हजारों महिलाएं दहेज उत्पीड़न, हिंसा और हत्या का शिकार होती हैं, वहीं देश के कुछ आदिवासी और पूर्वोत्तर के समुदाय बिल्कुल अलग सामाजिक व्यवस्था की मिसाल पेश करते हैं. छह साल पहले केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपनी सोशल मीडिया में पोस्ट में आमिर खान के प्रसिद्ध शो सत्यमेव जयते की एक क्लिप शेयर की थी जिसमें पूर्वोत्तर राज्य के एक ऑडियंस ने अपने एक्सपीरियंस शेयर करते हुए बताया था कि उन्होंने केवल किताब में दहेज के बारे में पढ़ा है. उनके यहां ये बिल्कुल भी नहीं होता.
इसी तरह अरुणाचल प्रदेश की गालो जनजाति में विवाह के दौरान दुल्हन पक्ष पर आर्थिक बोझ नहीं डाला जाता, बल्कि वर पक्ष की ओर से पारंपरिक रूप से ‘न्यिरपुंग' (Bride Price) दिया जाता है, जिसे महिला के सम्मान और सामाजिक महत्व का प्रतीक माना जाता है. ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि जहां देश के कई हिस्सों में दहेज के कारण महिलाओं की जान तक जा रही है, वहीं अनेक आदिवासी और पूर्वोत्तर समाज लैंगिक सम्मान, सामुदायिक परंपराओं और अपेक्षाकृत समानतापूर्ण वैवाहिक व्यवस्थाओं की अलग तस्वीर पेश करते हैं.
अब जानते हैं क्या है चीन का ‘मैनोस्फेयर'?
पॉडकास्ट में चर्चा में शामिल एक्सपर्ट्स के अनुसार ‘मैनोस्फेयर' कोई एक संगठन या आंदोलन नहीं है, बल्कि विचारों का एक व्यापक ऑनलाइन नेटवर्क है. चीन में यह पश्चिमी देशों से अलग रूप में दिखाई देता है. यहां कोई खुद को स्त्री-विरोधी बताने वाला इन्फ्लुएंसर एंड्रयू टेट जैसा प्रभावशाली चेहरा नहीं है, जिसके इर्द-गिर्द बड़ी संख्या में लोग जुटते हों. इसके बजाय कई छोटे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और ऑनलाइन समूह हैं, जहां कुछ पुरुष महिलाओं, फेमिनिस्ट और सामाजिक बदलावों को अपनी समस्याओं का कारण बताते हैं.
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