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माथे पर तिलक लगाने से रोका तो लंदन में 9 साल के लड़के के पिता ने ठोंका 31 लाख मुआवजे का दावा

'एक्शन फॉर हार्मनी' के प्रमुख नितिन पालन ने कहा कि ब्रिटेन के हर बच्चे को सम्मान महसूस करने और अपने धर्म का पालन करने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह मामला निष्पक्षता को बढ़ावा देने के बारे में है.

माथे पर तिलक लगाने से रोका तो लंदन में 9 साल के लड़के के पिता ने ठोंका 31 लाख मुआवजे का दावा
ब्रिटेन में दस लाख से अधिक हिंदू रहते हैं. (फोटो-एनडीटीवी)
  • यूके हाई कोर्ट में एक 9 साल के ब्रिटिश हिंदू बच्चे के माथे पर तिलक लगाने को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है
  • बच्चे के पिता ने स्कूल पर धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाकर मुआवजे की मांग की है
  • आरोप है कि स्कूल ने बच्चे को गतिविधियों से रोका और धार्मिक स्कूल में भेजने की सलाह दी थी

यूके हाई कोर्ट में 9 साल के एक ब्रिटिश हिंदू लड़के के माथे पर लगे पवित्र तिलक को लेकर एक बड़ी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है. इस मामले ने ब्रिटिश स्कूलों में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.  लड़के के पिता ने अपने बेटे के पूर्व प्राइमरी स्कूल पर धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया है. उनका आरोप है कि स्कूल ने उनके बेटे को माथे पर 'तिलक-चांदलो' लगाने की अनुमति नहीं दी.

2021 से ही लगाता था तिलक

परिवार ने 'इक्वालिटी एक्ट 2010' (समानता अधिनियम) के तहत धार्मिक भेदभाव और 'ह्यूमन राइट्स एक्ट 1998' (मानवाधिकार अधिनियम) के तहत अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस मामले में 'आश्रय लॉ' उनका प्रतिनिधित्व कर रहा है, और उन्हें 'एक्शन फॉर हार्मनी' नामक संगठन का समर्थन प्राप्त है. लड़के के पिता ने पश्चिमी लंदन स्थित 'विकर्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल' की गवर्निंग बॉडी से 25,000 पाउंड (करीब 31 लाख रुपये) के मुआवजे की मांग की है.  यह लड़का स्वामी नारायण परंपरा का पालन करने वाला हिंदू है. वह 2021 से ही स्कूल में माथे पर 'तिलक-चांदलो' (चंदन के पेस्ट से बना U-आकार का निशान, जिसके बीच में लाल कुमकुम की बिंदी होती है) लगाकर जा रहा था, और तब तक किसी को इससे कोई आपत्ति नहीं थी.

2025 में अचानक आई आपत्ति

कोर्ट में दाखिल दस्तावेजों में परिवार ने आरोप लगाया है कि 2025 के आखिर में स्कूल ने इस तिलक पर आपत्ति जताई. उनका आरोप है कि बच्चे से बार-बार उसके धर्म के बारे में सवाल पूछे गए, उसे स्कूल काउंसिल से हटा दिया गया और कई गतिविधियों में हिस्सा लेने से रोक दिया गया. माता-पिता का दावा है कि स्कूल ने उनसे यह भी कहा कि अगर वे चाहते हैं कि उनका बेटा तिलक लगाना जारी रखे, तो वे उसे किसी धार्मिक स्कूल में भेज दें. हालांकि, स्कूल ने इन आरोपों से इनकार किया है. स्कूल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने कोई भेदभाव नहीं किया, बल्कि पूरी संवेदनशीलता के साथ काम किया और कुछ अन्य विकल्प भी सुझाए थे.

'मजबूर नहीं कर सकते'

माता-पिता का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम से उनका बच्चा काफी परेशान और तनावग्रस्त हो गया था, जिसके चलते उन्हें उसे स्कूल से निकालना पड़ा. कुछ महीने पहले जब यह मामला सामने आया, तो ब्रिटिश हिंदू समुदाय में इसे लेकर काफी आक्रोश देखा गया. आश्रय लॉ के वकील और निदेशक अंबरीश लिंबाचिया ने कहा, "यह मामला सिर्फ एक बच्चे या एक स्कूल तक सीमित नहीं है. यह ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है. किसी भी बच्चे को अपने धर्म और अपनी शिक्षा के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए." 

कोर्ट में मामले विचाराधीन

'एक्शन फॉर हार्मनी' के प्रमुख नितिन पालन ने कहा कि ब्रिटेन के हर बच्चे को सम्मान महसूस करने और अपने धर्म का पालन करने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह मामला निष्पक्षता को बढ़ावा देने के बारे में है, न कि लोगों के बीच बंटवारा करने के बारे में. यूके में दस लाख से अधिक हिंदू रहते हैं, इसलिए इस मामले को एक अहम परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है कि मुख्यधारा के ब्रिटिश स्कूलों में अल्पसंख्यक धर्मों को किस तरह जगह दी जाती है. लिंबाचिया ने कहा, "हमें उम्मीद है कि इस कानूनी प्रक्रिया से सभी धार्मिक पृष्ठभूमियों वाले बच्चों के अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद मिलेगी." अभी तक कोई अंतिम न्यायिक आदेश नहीं आया है और यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.

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