अचानक क्या हुआ कि जर्मनी के लोगों को एक बार फिर सपनों में हिटलर दिखाई देने लगा है. ऐसा क्या बदल गया कि लोगों को लगने लगा है कि फिर से हिटलर आएगा. क्यों लोग नारे लगा रहे कि No Nazi क्यों लोग तख्तियां में No AFD लिख कर प्रदर्शन कर रहे हैं. क्या सिर्फ एक चुनाव के नतीजे ने पूरे यूरोप को फिर से चिंता में डाल दिया. विश्व भर में चर्चा के केंद्र में पूर्वी जर्मनी की ताक़तवर पार्टी AfD यानी 'अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' है. इस पार्टी ने जर्मनी के राज्य सेक्सनी-अनहाल्ट में चुनाव लड़ा और दशकों से सत्तारूढ़ पार्टियों की जमीन को छीन लिया. लेकिन AfD के चुनाव जीतते ही जर्मनी में इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू हो गए. क्या AfD चुनावी जीत जर्मनी को नई क्रांति को लेकर जा रहे हैं. ऐसा क्यों है इसको विस्तार से समझिए.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐतिहासिक परिणाम
6 सितंबर 2026 को दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि जब जर्मनी के सेक्सनी-अनहाल्ट राज्य के चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति को हिला कर रख दिया. जर्मनी की मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के लिए नतीजे सबसे ज़्यादा ख़राब साबित हुए. 2013 में बनी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी AfD ने चुनाव में 43.8% फ़ीसदी वोटों के साथ बहुमत काफ़ी क़रीब तक पहुँच गई. यह परिणाम AfD की सोच से भी कहीं ज़्यादा था. वहीं सेंटर राइट रहने वाली पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन ऑफ जर्मनी (CDU) का जनाधार समाप्त होता दिखाई दिया.CDU को महज़ 17.2% वोट मिले जो 2021 की तुलना में 37.1% कम थे. इस मतदान से पता चला कि AfD का समर्थन सबसे ज़्यादा उन्होंने किया जो पहले कभी मतदान में शामिल नहीं हुए थे साथ CDU के समर्थक भी भारी संख्या में शिफ्ट हो गए. इस चुनाव में AfD को 83 में से 39 सीटें मिलीं जो बहुमत से तीन कदम दूर है.
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जर्मनी को अपने इतिहास पर ही संदेह
अब बड़ा सवाल है कि क्यों इस नतीजे ने जर्मनी के लोगों को परेशान किया? Right Wing को लेकर जर्मनी अपने इतिहास पर भरोसा नहीं कर पाता है उसे अपने इतिहास पर ही संदेह है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद की राजनीतिक और आर्थिक पतन के बाद हिटलर और नाज़ी पार्टी सत्ता में आ गए. हिटलर 1933 में चांसलर बन गया और तेजी से जर्मनी के लोकतंत्र को देश को तानाशाही में बदल दिया गया. जो हिटलर ने कहा वही कानून बन गया.नाज़ी शासन की नस्लवादी और यहूदी-विरोधी विचारधारा के कारण Holocaust हुआ, जिसमें 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई, और एक ऐसा युद्ध शुरू हुआ जिसने करोड़ों लोगों की जान ले ली.
इसी वजह से जर्मनी की ख़ुफ़िया एजेंसी इसे Right Wing Extremist मानती हैं. जबकि AfD के नेताओं का दावा है वो राष्ट्रवादी हैं. AfD का मानना है कि जर्मन होने की पहचान सिर्फ़ पासपोर्ट नहीं है बल्कि उनकी जर्मन नस्ल और संस्कृति से है.
हिटलर जैसी सोच
AfD का नारा ही री-माइग्रेशन का है, पार्टी का मानना है शरणार्थियों प्रवासियों यहाँ जर्मन संस्कृति को न मानने वाले को देश से बाहर कर देना चाहिए. सीमा सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात करते हैं. हिटलर भी कुछ ऐसी सोच रखता था कि आर्यन की असली जर्मन है बांकी सब जर्मनी के लिए खतरा हैं. एएफडी के हिसाब से मुस्लिम प्रवासी और शरणार्थी देश की संस्कृति और अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है. जैसे हिटलर यहूदियों को सभी समस्याओं का ज़िम्मेदार मानता था.
इस बात की चर्चा अब जर्मनी में हो रही है. चिंता इस बात से भी क्यों कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब नाजी का उदय हो रहा था तब भी जर्मनी के Working Class ने नाज़ी को वोट दिया और आज भी सेक्सनी-अनहाल्ट में AfD को वर्किंग क्लास का (59%) वोट मिला है. आर्थिक स्थिति को ख़राब मानने वाले 57% वोट AfD को मिला है.उन लोगों ने सबसे ज़्यादा वोट AfD को दिया जिनको लगता है देश में विदेशी घुस आयें हैं और सीमा सुरक्षा बढ़ानी चाहिए.
विरोध में लगने लगे नारे
अब इस राष्ट्रवाद की भावना का विस्तार हो रहा है जिससे कई अनुमानों में यह भी कहा जा रहा है कि 2029 के चुनावों में AfD बड़ी पार्टी बनकर सामने आ सकती है. इस नतीजे के बाद लोगों को लग रहा कोई नया हिटलर आ गया है. समाज में विभाजन हो गया है. बर्लिन म्यूनिख डेस्ड्रन की सड़कों पर Never Again के नारे लग रहे हैं. प्रदर्शनकारी निराश ना होने की बात कर रहे हैं. AfD ने चुनाव जीत लिया है लेकिन वह अकेले सरकार नहीं बना पाएगी जर्मनी की मुख्य पार्टियों ने AfD के साथ काम करने से इनकार कर दिया है. जिससे पार्टी के पास सत्ता में आने का कोई सीधा रास्ता नहीं बचा है.
ऑस्ट्रिया की 'फ्रीडम पार्टी' 2024 के चुनाव में देश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई और बाद में सरकार में शामिल हुई. फ्रांस की 'नेशनल रैली' भी एक प्रमुख राजनीतिक दल बन चुका है. यूरोपीय काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' (ECFR) ने 2025 में कहा था कि राइट विंग पार्टियां पहले से ही छह यूरोपीय संघ देशों (हंगरी, इटली, स्लोवाकिया, फिनलैंड, क्रोएशिया और चेकिया / चेक गणराज्य) में सरकार में थीं और कई अन्य देशों में या तो सर्वेक्षणों में आगे थीं या सत्ता के करीब थीं. अब इसका विस्तार इसकी ताक़त जर्मनी में भी देखने को मिल रही है.
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