- यूरोप के कई देशों के नेताओं ने AfD की जीत को कट्टरपंथी खतरा बताते हुए चिंता व्यक्त की है
- रूस समर्थक AfD पार्टी ने यूक्रेन को दी जाने वाली मदद रोकने और शरणार्थी स्थिति खत्म करने की मांग की है
- चीन जापान की बढ़ती सैन्य ताकत और रूस समर्थक पार्टी की जर्मनी में सत्ता पर सतर्क नजर रख रहा है
'ऑल्टरनेटिव फ़ॉर जर्मनी' (AfD) पार्टी सैक्सनी-एनहाल्ट में हुए राज्य चुनावों में 44% वोट हासिल करके पहले नंबर पर आ गई है. लेकिन प्रवासियों का विरोध करने वाली और रूस की समर्थक इस पार्टी को पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी सीटों से तीन सीटें कम मिलीं. इसका मतलब है कि या तो उसे गठबंधन के लिए कोई साथी खोजना होगा या फिर अल्पमत में रहते हुए सरकार चलाने की कोशिश करनी होगी.
दोनों ही स्थितियों में उनके घोषणापत्र की कई बातें शायद कभी हकीकत न बन पाएं, क्योंकि जर्मनी की मुख्यधारा की पार्टियां बरसों से इस पार्टी के साथ काम करने से इन्कार करती रही हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से सभी दल दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी से दूरी बनाती रही हैं. मगर अब वो सत्ता की दहलीज पर है. अगर वो सरकार बना लेती है तो आने वाले समय में जर्मनी की केंद्र सरकार की भी दावेदार बन सकती है. मगर एडीएफ की जीत सिर्फ जर्मनी के लिए बड़ी खबर नहीं है, ये दुनिया के लिए बड़ी खबर है.
फ्रांस से लेकर इटली तक में चिंता
एडीएफ की ऐतिहासिक जीत के बाद पूरे यूरोप के मुख्यधारा के नेताओं ने चिंता जताई है, जबकि राष्ट्रवादी नेताओं ने इस नतीजे का स्वागत करते हुए इसे बदलाव का जनादेश बताया है. स्पेन के सोशलिस्ट प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने सोमवार को मैड्रिड में पार्टी की एक बैठक में कहा कि नतीजों से पता चलता है कि कट्टरपंथी खतरा, जो काफी हद तक पारंपरिक दक्षिणपंथी गुटों के घुटने टेकने की वजह से बढ़ा है, यूरोप और दुनिया भर में अपनी जगह बना रहा है. फ्रांस के वित्त मंत्री रोलैंड लेस्क्योर ने कहा कि यह साफ तौर पर बहुत ही चिंताजनक संकेत देता है. इससे पता चलता है कि हमें एक बड़ी चुनौती का सामना करना है - वह है लोकलुभावन लहर, जो आज दुनिया भर में फैल रही है और जिसका हमें मुकाबला करना होगा.
लेस्क्योर की ये बातें रविवार शाम फ्रांस के यूरोपीय मामलों के मंत्री बेंजामिन हद्दाद की बातों से मिलती-जुलती थीं. हद्दाद ने सोशल मीडिया पर लिखा था: "जर्मनी के क्षेत्रीय चुनावों में दक्षिणपंथी गुटों की जीत यूरोप के लिए बहुत गंभीर स्थिति है. हमें लोगों के गुस्से, डर और चिंताओं को विनम्रता से सुनना होगा और उन पर सही तरीके से जवाब देना होगा. लेकिन राष्ट्रवाद और विदेशियों के प्रति नफरत कभी भी इसका समाधान नहीं हो सकते. हम अपना इतिहास नहीं भूल सकते." पोलैंड के विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की ने सोमवार को कहा कि AfD की जीत बहुत चिंताजनक संकेत है. पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने रविवार रात पोलैंड में कहा कि सिर्फ बेवकूफ या गद्दार ही जर्मनी में AfD की जीत पर खुश हो सकते हैं. इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने चुनाव नतीजों को बहुत बुरी खबर बताया. क्योंकि यह एक ऐसी राजनीतिक ताकत से जुड़ा है जो उदारवादी और पश्चिमी मूल्यों के खिलाफ है.
तो इस जीत से खुश कौन है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप की राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए अपना समर्थन कभी नहीं छिपाया है. उन्होंने अपने 'ट्रुथ सोशल' प्लेटफॉर्म पर चुनाव के अनुमानित नतीजों का स्क्रीनशॉट बिना किसी टिप्पणी के पोस्ट किया. वहीं रूस के राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रिएव ने ट्रंप की पोस्ट का स्क्रीनशॉट लिया और व्यावहारिक AfD की ऐतिहासिक जीत की तारीफ की. AfD क्रेमलिन की समर्थक पार्टी है और उसने यूक्रेन को दी जाने वाली मदद और यूक्रेन के लोगों को मिलने वाले शरणार्थी दर्जे को खत्म करने की मांग की है. एलन मस्क भी काफी खुश हैं.
मगर चीन खुश नहीं है. चीन इसे संयमित होकर देख रहा है. कारण ये है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जापान पहली बार डिफेंसिव होना छोड़कर आक्रामक हो रहा है. जापान अपना रक्षा खर्च बढ़ा रहा है. जापान के रक्षा मंत्रालय ने अगले फाइनेंशियल ईयर के लिए लगभग ¥9 ट्रिलियन ($57.7 बिलियन) की मांग की है और साल के आखिर तक तीन अहम सिक्योरिटी डॉक्यूमेंट्स में बदलाव के बाद यह आंकड़ा ¥10 ट्रिलियन से भी ज्यादा हो सकता है, फिर भी ये आंकड़े उस 3.5% GDP के लक्ष्य से काफी कम रहेंगे, जिसे अमेरिका ने अपने सहयोगियों के लिए तय करने को कहा है. मतलब साफ है कि ट्रंप के मन मुताबिक जापान अपनी ताकत बढ़ाने में लग गया है.
अब अगर जापान मजबूत हुआ तो उसका सबसे ज्यादा झगड़ा आज भी चीन से है. सेनकाकू द्वीप समूह और ताइवान के मुद्दे के चलते चीन ने जापान को रेयर अर्थ मैटेरियल भी देने से मना कर दिया है. दोनों देशों में शुरू से तनातनी रही है. चीन के लोग जापान के लोगों से नफरत करते हैं. वैसे ही जापान के लिए चीन से. ऐसे में जापान को लेकर चीन पहले से सतर्क है. अब इस बीच अगर जर्मनी में भी ऐसी पार्टी सत्ता में आ जाए जो रूस समर्थक हो तो रूस भी मजबूत हो जाएगा. ट्रंप के आने के बाद पहले से रूस पर दबाव कम हो गया है. तो चीन जो खुद को महाशक्ति बनाने के ख्वाब देख रहा है, उसके लिए ये बुरी खबर है. क्योंकि रूस के आर्थिक रूप से कमजोर होने का सबसे ज्यादा फायदा चीन को है. अगर रूस मजबूत हो गया तो जाहिर है फिर वो चीन की हर बात मानने पर मजबूर नहीं होगा. निश्चित रूप से इसका एशिया और मध्य पूर्व पर भी प्रभाव पड़ना तय है.
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