पश्चिमी अंटार्कटिका में 'थ्वाइट्स ग्लेशियर' है जिसे डूम्सडे ग्लेशियर यानी प्रलय का ग्लेशियर भी कहा जाता है. इसे यह नाम इसलिए मिला है क्योंकि इसके ढहने से ऐसी भारी तबाही आएगी जो कभी देखी नहीं गई. यह धरती पर मौजूद सबसे चौड़ा ग्लेशियर है और अब वैज्ञानिकों को इसके बारे में ऐसी जानकारी मिली है जो भयावह है. थ्वाइट्स ग्लेशियर पहले के अनुमानों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पिघल रहा है. इसका मतलब यह है कि दुनिया भर में ग्लेशियर के पिछलने की वजह से समुद्र स्तर में होने वाली वृद्धि का जो मौजूदा अनुमान है, उससे दोगुना पानी बढ़ सकता है.
बिहार राज्य से लगभग दोगुने साइज का यह ग्लेशियर पृथ्वी की सबसे दुर्गम जगहों में से एक पर स्थित है. यह दशकों से पिघलकर पीछे हट रहा है. इसके पिघलने से समुद्र के वैश्विक स्तर में लगभग 4% की वृद्धि हो रही है. लेकिन इसके पिघलने से जुड़ीं प्रक्रियाएं बेहद जटिल हैं और इसी वजह से इसके भविष्य का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है. अब वैज्ञानिकों ने इसका तोड़ निकाल लिया है.
वैज्ञानिकों को क्या पता चला?
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, इरविन और नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के ग्लेशियोलॉजिस्टों (हिमनद वैज्ञानिकों) ने बर्फ की चादर का एक नया मॉडल तैयार किया है. उनका कहना है कि यह मॉडल इस बात को बेहतर ढंग से दर्शाता है कि बर्फ के इस विशाल भंडार के नीचे क्या हो रहा है. पता चला है कि थ्वाइट्स ग्लेशियर का तेजी से पीछे हटना उसकी ग्राउंडिंग लाइन पर होने वाली प्रक्रियाओं के कारण हो रहा है. ग्राउंडिंग लाइन वह बिंदु है जहां बर्फ समुद्र तल से ऊपर उठती है और एक 'आइस शेल्फ' (बर्फ की परत) के रूप में समुद्र पर तैरने लगती है.
अगर यह पिघल गया तो क्या होगा?
अध्ययन से पता चला है कि इस बात की 60% संभावना है कि सदी के अंत तक यह ग्लेशियर अपनी जगह से हट जाएगा. इसके बाद, इसके ढलान वाली चट्टानी सतह से नीचे की ओर, अगली बड़ी पहाड़ी (रिज) की तरफ तेजी से खिसकने की आशंका है. इन नतीजों से संकेत मिलता है कि थ्वाइट्स ग्लेशियर के खत्म होने के असर को शायद कम करके आंका गया है. समुद्र के जलस्तर में 1.2 इंच की वृद्धि सुनने में भले ही बहुत ज्यादा न लगे, लेकिन यह तटीय आबादी के लिए खतरों को काफी हद तक बढ़ाने के लिए काफी है.
थ्वाइट्स ग्लेशियर के पूरी तरह पिघलने या ढह जाने से दुनिया भर में गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे. तटीय और डेल्टा क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों को गंभीर या स्थायी बाढ़ का सामना करना पड़ेगा. बुरी तरह प्रभावित होने वाले शहरों की बात करें तो एशिया में शंघाई, ढाका, बैंकॉक, कोलकाता और मनीला डूब जाएंगे तो उत्तरी अमेरिका में मियामी, न्यूयॉर्क और न्यू ऑरलियन्स के साथ होगा. इसी तरह लंदन, टोक्यो, लागोस और एडिनबर्ग भी समंदर में होगा.
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