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क्या ईरान ने भांप ली है ट्रंप की कमजोरी, आखिर अपनी शर्तों पर क्यों बातचीत करना चाहता है तेहरान?

अमेरिका और ईरान में दूसरे दौर की बातचीत को लेकर अभी कुछ साफ नहीं हो पाया है. ट्रंप का कहना है कि उनके प्रतिनिधि पाकिस्तान जा रहे हैं. जबकि, ईरान ने अभी तक इस बातचीत में शामिल होने का फैसला नहीं लिया है.

क्या ईरान ने भांप ली है ट्रंप की कमजोरी, आखिर अपनी शर्तों पर क्यों बातचीत करना चाहता है तेहरान?
ट्रंप की विरोधाभासी बातें उनकी झुंझलाहट दिखाती है.
  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की विरोधाभासी रणनीतियों ने ईरान के साथ तनाव और बातचीत की संभावना को प्रभावित किया है
  • ट्रंप ने बातचीत के संकेत देने के साथ ईरान को धमकी भी दी, जिससे दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ा है
  • ईरान ने अमेरिकी नाकाबंदी जारी रहने पर बातचीत से साफ इनकार किया है और अपनी तीन प्रमुख मांगें रखी हैं
नई दिल्ली:

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से फैसले ले रहे हैं, वह उनकी बेचैनी को दिखाता है. ट्रंप कभी ईरान से बातचीत का संकेत देते हैं. कभी कहते हैं कि युद्ध जल्दी खत्म हो जाएगा. तो कभी ईरान को धमकी भी दे देते हैं. सबकुछ ठीक चल रहा था, सुलह की उम्मीद भी नजर आ रही थी लेकिन ट्रंप की 'बेलगामी' ने ही सब बिगाड़ दिया. 

ट्रंप ने ईरान के साथ पहले बातचीत के संकेत दिए लेकिन वह होर्मुज के आसपास अमेरिकी नाकाबंदी को नहीं हटा रहे हैं. नतीजा- ईरान ने बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया.

अब अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ने लगा है. अमेरिकी नौसेना ने एक ईरानी कार्गो जहाज पर गोलीबारी की और उसे रोक दिया. यह तब हुआ जब कुछ घंटे पहले ही ट्रंप ने ईरान से बातचीत के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को भेजने की बात कही थी.

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बेचैन ट्रंप, बातचीत को बेताब अमेरिका!

माना जा रहा है कि ईरान के साथ जंग छेड़कर अमेरिका इसमें बुरी तरह फंस गया है. ईरान जंग अमेरिका के लिए 'गले की हड्डी' बन गया है, जिसे वह न तो निगल पा रहा है और न उगल पा रहा है. और इसी ने ट्रंप की 'बेचैनी' को बढ़ा दिया है.

ट्रंप दावा तो करते हैं कि उन्होंने ईरानी सेना को खत्म कर दिया है. उसे घुटने पर ला दिया है लेकिन ऐसा दिखता नहीं है. इतना ही नहीं, अमेरिका भी ईरान बातचीत के लिए बेताब है. 

ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर ट्रंप ने बताया था कि ईरान से बातचीत के लिए अमेरिकी डेलीगेशन इस्लामाबाद जा रहा है. ट्रंप ने कहा था, 'मेरे प्रतिनिधि इस्लामाबाद जा रहे हैं. वे बातचीत के लिए कल शाम वहां पहुंचेंगे.'

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ट्रंप ने ईरान से बातचीत के तो संकेत दिए लेकिन धमकी भी दी. ट्रंप ने कहा, 'हम एक बहुत ही निष्पक्ष और सही डील पेश कर रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि वे इसे मान लेंगे. क्योंकि अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो अमेरिका ईरान के हर एक पावर प्लांट और हर एक पुल को तबाह कर देगा.'

ट्रंप ने कहा कि अब और 'अच्छा आदमी' बनकर नहीं रह सकते. उन्होंने धमकाते हुए कहा कि डील नहीं मानी तो ईरान का वह हश्र होगा, जो 47 साल में दूसरे राष्ट्रपतियों को करना चाहिए था. उन्होंने कहा कि 'अब ईरान की हत्यारी मशीन को खत्म करने का समय आ गया है.'

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लेकिन ईरान है कि मानता नहीं

ट्रंप की धमकियों पर ईरान का कोई असर नहीं पड़ रहा है. ट्रंप ने बातचीत के लिए अपने प्रतिनिधि भेज तो दिए हैं लेकिन ईरान ने बातचीत में शामिल होने से इनकार कर दिया है. 

ट्रंप के ऐलान के बाद ईरान की तस्नीम न्यूज एजेंसी ने बताया कि फिलहाल ईरान ने पाकिस्तान में बातचीत के लिए कोई प्रतिनिधिमंडल भेजने का कोई फैसला नहीं लिया है. ईरान का कहना है कि जब तक ईरानी पोर्ट पर अमेरिकी नाकाबंदी जारी रहेगी, तब तक कोई बातचीत नहीं होगी.

बाद में सरकारी समाचार एजेंसी IRNA ने बताया कि ईरान ने बातचीत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है. क्यों? क्योंकि ईरान का कहना है कि अमेरिका 'बहुत ज्यादा' मांग रहा है. ट्रंप बार-बार ऐसी बात कर रहे हैं जो विरोधाभासी हैं. इतना ही नहीं, अमेरिका की नाकाबंदी भी जारी है, जिसे ईरान सीजफायर का उल्लंघन मानता है.

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ट्रंप की कमजोरी भांप गया है ईरान?

28 फरवरी को जब से ईरान युद्ध शुरू हुआ है, तब से ट्रंप बार-बार इस तरह की बातें कर रहे हैं जो समझ से परे है. 

ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत का संकेत तब दिया, जब IRGC ने होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा बंद कर दिया. इससे यह माना गया है कि होर्मुज को बंद करके अमेरिका और ट्रंप पर दबाव बनाया जा सकता है. 

इसके अलावा, इस युद्ध को लेकर ट्रंप जिस तरह की बातें कर रहे हैं और रणनीति अपना रहे हैं, वह भी साफ नहीं है. ट्रंप की तुलना में ईरान खुद को ज्यादा 'बेहतर' मानता है. ईरान समझ गया है कि ट्रंप बेचैन है और कमजोर हैं और ऐसे में उसे घबराने की बजाय मौके का फायदा उठाना चाहिए.

ट्रंप अब जिस तरह से फैसले ले रहे हैं. कभी बातचीत की पेशकश करते हैं. कभी धमकी देते हैं. यह दिखाता है कि ट्रंप इस जंग में घुस तो गए हैं लेकिन अब जल्द से जल्द इससे बाहर निकलना चाहते हैं. जबकि, ईरान अब शांत और संयम तरीके से जंग लड़ रहा है. 

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ट्रंप क्यों हड़बड़ा रहे हैं? 

क्योंकि होर्मुज संकट ने उन्हें उलझा दिया है. रूस को अपना तेल बेचने के लिए एक महीने की मोहलत और देना इसका सबसे बड़ा सबूत हैं. 

होर्मुज संकट के कारण दुनियाभर में तेल-गैस का संकट बढ़ गया है. अमेरिका में भी महंगाई बढ़ती जा रही है. मार्च में ही अमेरिका में थोक महंगाई दर 4% बढ़ गई है. तेल-गैस की कीमतों में 8.5% से ज्यादा का उछाल आ गया है.

ट्रंप की खीझ की एक वजह यह भी है कि ईरान जंग के कारण उनकी अप्रूवल रेटिंग गिरती जा रही है. ताजा सर्वे में 63% अमेरिकी उनके काम से 'असंतुष्ट' हैं. जनवरी 2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से उनकी अप्रूवल रेटिंग सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. ट्रंप जिस तरह से ईरान युद्ध को हैंडल कर रहे हैं, उससे 67% अमेरिकी 'नाखुश' हैं. उनकी अप्रूवल रेटिंग में गिरावट तब आई है, जब कुछ ही महीनों में अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन हैं.

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फिर कैसे बनेगी बात?

कभी पोप से भिड़ना तो कभी NATO पर गुस्सा उतारना... ये ट्रंप की झुंझलाहट को दिखाता है. लेकिन ईरान शांत है. 

अमेरिका बातचीत करना चाहता है लेकिन ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा है. अगले दौर की बातचीत तभी होगी, जब ईरान की तीन मांगों को मान लिया जाएगा. और वह है- लेबनान में पूरी तरह से सीजफायर. ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी को खत्म करना. और विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को रिलीज करना.

लेकिन ईरान की इन शर्तों को अमेरिका के लिए मानना भी मुश्किल है. क्योंकि ईरान उसकी शर्तें नहीं मान रहा है. फिलहाल ट्रंप जल्दबाजी में ऐला कर चुके हैं कि इस्लामाबाद में बैठक होने वाली है. लेकिन ईरान ने बातचीत में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

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लेखक के बारे में
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प्रियंक द्विवेदी
चीफ सब एडिटर
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