- अमेरिकी सेना के फरवरी 2020 में अफगानिस्तान से हटने के बाद तालिबान ने फिर से सत्ता संभाली
- नादिया हाशमी का उपन्यास 'सिटी ऑफ विडोज' अफगान महिलाओं की तालिबान शासन के बाद की कठिनाइयों को दर्शाता है
- उपन्यास में अफगान महिलाओं को डॉक्टर, टीचर, वकील, सैनिक और टीवी न्यूज एंकर जैसे आधुनिक पेशों में दिखाया गया है
फरवरी 2020 में अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से हट गई और देश को उसके नए शासकों, तालिबान, के हवाले कर दिया. लेकिन उन प्रगतिशील अफगान महिलाओं का क्या हुआ जिन्होंने पिछले दो दशकों में देश में नेतृत्व की भूमिकाएं निभाई थीं, जब तालिबान ने फिर से सत्ता हासिल कर ली? मशहूर लेखिका नादिया हाशमी का नया उपन्यास, "सिटी ऑफ विडोज", ऐसी अफगान महिलाओं की जिंदगी पर केंद्रित है जिनकी दुनिया तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद रातों-रात बदल गई.
नई शुरूआत की दास्तां
हार्परकॉलिन्स के एक बयान के मुताबिक, यह उपन्यास एक दिलचस्प और दिल दहला देने वाली, लेकिन अंततः उम्मीद जगाने वाली कहानी कहता है. यह तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद के सालों में अफगान महिलाओं की जिंदगी पर आधारित है. डर, प्रतिरोध, बदलाव और नई शुरुआत की कहानी बयां करने वाली यह किताब इतिहास के एक अहम मोड़ पर खड़ी उन अफगान महिलाओं की आवाज बनती है जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता.
डॉक्टर, टीचर, वकील और सैनिक मगर अब...
किताब की प्रस्तावना में बताया गया है कि 20 साल अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान में रहने के कारण ये महिलाएं काफी हद तक शांतिपूर्ण माहौल में बड़ी हुई थीं; उन्होंने स्कूल की पढ़ाई की थी, नौकरियां की थीं और यहां तक कि सेना और संसद में भी काम किया था. जब इन अफगान महिलाओं ने तालिबान को सड़कों पर फिर से कब्जा करते देखा, तो उन्हें पता था कि सब कुछ बदलने वाला है. यह किताब काबुल जैसे हलचल भरे, आधुनिक शहर पर आधारित है, जहां महिलाएं टीवी न्यूज एंकर, दुकान की मालकिन, डॉक्टर, टीचर, वकील और सैनिक के तौर पर काम करती हैं. इनमें मरजान भी शामिल है, जिसने अफगान सेना के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी और अब अपनी बेटी हवा, को सुरक्षित रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है.
मरजाना और सोराया की कहानी
किताब के मुताबिक, मरजान का असली नाम रहीमा था और वह 'बाचा पोश' के तौर पर रहती थी - यानी ऐसी लड़की जिसे किशोरावस्था तक लड़के की तरह पाला-पोसा गया हो. रहीमा ने अपने वॉरलॉर्ड पति के चंगुल से भागने के बाद मरजान नाम अपनाया था. उसने अपने लिए एक नई जिंदगी बनाई थी, जिसे वह तालिबान के शासन में भी आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं थी. इसी तरह, सोराया, जो कभी लाल लिपस्टिक लगाकर महिलाओं की एक आर्मी कॉम्बैट यूनिट की अगुवाई करती थीं, अब एक 'वॉन्टेड' महिला हैं. उनका अपना भाई भी अब तालिबान से बचाने के लिए उन्हें पनाह देने से इन्कार कर चुका है.
अब क्या है इनके पास ऑप्शन
यह किताब ऐसी अफगान महिलाओं के जिंदा रहने और हालात का सामना करने पर सवाल उठाती है. किताब में लिखा है, "तालिबान के राज में इन काबिल अफगान महिलाओं के पास क्या विकल्प बचते हैं? क्या उन्हें लड़ना चाहिए, भाग जाना चाहिए या कोई तीसरा रास्ता खोजना चाहिए? एक बात तो पक्की है: उनमें से कोई भी चुपचाप अपनी किस्मत को स्वीकार नहीं करेगी." 599 रुपये की कीमत वाली यह किताब ऑनलाइन और ऑफलाइन स्टोर पर उपलब्ध है.
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