- लाजावर्त पत्थर से बनेगा दुर्लभ शिवलिंग, मार्च 2027 में होगी स्थापना
- बाली के शिवलिंग से प्रेरित है इस अनूठी प्रतिमा का डिजाइन
- ग्वालियर के मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा गढ़ रहे हैं ऐतिहासिक कलाकृति
गहरा नीला रंग, उस पर सुनहरी चमक और वजन करीब डेढ़ टन. अफगानिस्तान के दुर्लभ लाजावर्त पत्थर से देश में पहली बार इतने बड़े आकार का शिवलिंग तैयार किया जा रहा है. मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित रीजनल आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा इसे आकार दे रहे हैं. इस महत्वाकांक्षी परियोजना में भारत सहित पांच देशों से विशेष पत्थर मंगाए गए हैं, जिनसे शिव परिवार और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनाई जाएंगी. यह अनूठी कलाकृति धार्मिक आस्था, अंतरराष्ट्रीय शिल्पकला और मूर्तिकला का अद्भुत संगम मानी जा रही है.

दुर्लभ पत्थर से ग्वालियर में तैयार हो रही हैं प्रतिमाएं
अफगानिस्तान से आ रहा है दुर्लभ लाजावर्त पत्थर
ग्वालियर में तैयार किए जा रहे इस विशेष शिवलिंग के लिए अफगानिस्तान से लाजावर्त यानी लैपिस लाजुली का एक विशाल सिंगल पीस पत्थर मंगाया जा रहा है. NDTV को प्राप्त जानकारी के अनुसार यह पत्थर लगभग 5×5 फीट आकार का होगा और जबकि इसकी कीमत करीब 15 लाख रुपये बताई जा रही है. पत्थर के जल्द ही ग्वालियर पहुंचने की उम्मीद है, जिसके बाद इसे तराशने का कार्य शुरू होगा. यह पत्थर अपने गहरे नीले रंग, सुनहरे प्रभाव और दुर्लभता के कारण दुनिया भर में विशेष महत्व रखता है.

पत्थर को तराशते हुए मूर्तिकार
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तीन फीट ऊंचा और डेढ़ टन वजनी होगा शिवलिंग
इस प्रोजेक्ट से जुड़े एक्सपर्ट के अनुसार पत्थर को तराशकर करीब 3 फीट ऊंचा और लगभग डेढ़ टन वजन का शिवलिंग तैयार किया जाएगा. डॉ. वासुदेव का दावा है कि देश में लाजावर्त के छोटे शिवलिंग तो मिलते हैं, लेकिन इस आकार और वजन का सिंगल पीस शिवलिंग पहली बार तैयार किया जा रहा है. इसी वजह से यह धार्मिक और कलात्मक दृष्टि से एक अनूठी उपलब्धि मानी जा रही है.

शिवलिंग आकार ले रहा है
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राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मूर्तिकार दे रहे आकार
बैजाताल स्थित रीजनल आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा इस पूरी परियोजना की प्रमुख जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. उनके नेतृत्व में शिव परिवार और अन्य धार्मिक प्रतिमाओं को अलग-अलग विशेष पत्थरों से तैयार किया जाएगा. मूर्तिकारों की टीम का कहना है कि हर प्रतिमा के लिए उसके स्वरूप और धार्मिक महत्व के अनुसार पत्थर का चयन किया गया है.

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा
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पांच देशों के पत्थरों से बनेंगी प्रतिमाएं
यह परियोजना केवल शिवलिंग तक सीमित नहीं है. मंदिर के लिए कुल 70 प्रतिमाएं बनाई जानी हैं, जिनमें से 60 प्रतिमाओं का निर्माण ग्वालियर में होगा. इन प्रतिमाओं के लिए भारत, अफगानिस्तान, ब्राजील, सूडान और वियतनाम सहित पांच देशों से विशेष पत्थर मंगाए जा रहे हैं. हर पत्थर को उसके रंग, बनावट और धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए चुना गया है.
अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए अलग पत्थर
परियोजना से जुड़ी जानकारी के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा सूडान से आने वाले हरे मर्गज स्टोन से बनाई जाएगी. इसकी पन्ने के विकल्प के रूप में ज्योतिषी मान्यता है. भगवान कार्तिकेय के लिए वियतनाम का ब्लैक मार्बल चुना गया है. नंदी की प्रतिमा राजस्थान के जैसलमेर के प्रसिद्ध गोल्डन स्टोन से तैयार होगी, जबकि माता पार्वती की प्रतिमा मकराना के शुद्ध सफेद संगमरमर से बनाई जाएगी. इस तरह प्रत्येक प्रतिमा को विशिष्ट स्वरूप देने की योजना बनाई गई है.

अलग-अलग देवी-देवताओं की मूर्तियां बन रही हैं
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बाली के शिवलिंग से मिली प्रेरणा
इस विशेष शिवलिंग का डिजाइन इंडोनेशिया के बाली द्वीप में स्थित एक संग्रहालय में स्थापित सैंडस्टोन शिवलिंग से प्रेरित बताया गया है. उसी कलात्मक स्वरूप को लाजावर्त पत्थर में उकेरा जाएगा. मंदिर का नाम 'वंशवृद्धि महादेव मंदिर' रखा गया है. धार्मिक मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि की आस्था से जुड़ा रहेगा.
मार्च 2027 में होगी स्थापना
तैयार होने के बाद इन प्रतिमाओं और शिवलिंग की स्थापना पंजाब के शहीद भगत सिंह नगर जिले के नवांशहर स्थित वंशवृद्धि महादेव मंदिर में मार्च 2027 में की जाएगी. मंदिर निर्माण से जुड़े लोग इसे देश की सबसे विशेष धार्मिक एवं शिल्पकला परियोजनाओं में से एक मान रहे हैं.
क्या होता है लाजावर्त?
लाजावर्त या लैपिस लाजुली एक बहुमूल्य नीला पत्थर है, जिसका उपयोग प्राचीन काल से आभूषण और कलात्मक वस्तुएं बनाने में किया जाता रहा है. इससे अंगूठियां, ब्रेसलेट, लॉकेट, पेंडेंट, झुमके और जपमालाएं तैयार की जाती हैं. इतिहास में इसका उपयोग पेंटिंग के लिए अत्यंत मूल्यवान, गहरे और टिकाऊ नीले रंग के निर्माण में भी किया जाता था.
धार्मिक आस्था और कला का संगम
ग्वालियर में आकार ले रही यह परियोजना केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पारंपरिक मूर्तिकला, अंतरराष्ट्रीय शिल्प संसाधनों और धार्मिक आस्था का अनूठा उदाहरण भी बन रही है. अफगानिस्तान के दुर्लभ नीले पत्थर से बनने वाला यह विशाल शिवलिंग और पांच देशों के पत्थरों से तैयार होने वाली प्रतिमाएं आने वाले समय में श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं.
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