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बांग्लादेश आम चुनाव 2026: आज वोटिंग, भारत के दांव पर क्या और कैसे बदलेगा दक्षिण एशिया का शक्ति संतुलन?

बांग्लादेश में आज यानी 12 फरवरी 2026 को होने वाला आम चुनाव के नतीजों के असर से भारत और चीन भी अछूते नहीं रहेंगे. ढाका की सत्ता तय करेगी कि यह दक्षिण एशिया में सहयोग की दिशा में बढ़ेगा या अस्थिरता के नए दौर में प्रवेश करेगा.

बांग्लादेश आम चुनाव 2026: आज वोटिंग, भारत के दांव पर क्या और कैसे बदलेगा दक्षिण एशिया का शक्ति संतुलन?
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  • अवामी लीग के बाहर होने के बाद बीएनपी-जमात समीकरण और नई सरकार का बांग्लादेश में आना तय है.
  • भारत के साथ साझेदारी पर नई सरकार के रुख से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन की दिशा तय होगी.
  • यह चुनाव भारत के लिए सुरक्षा, पूर्वोत्तर क्षेत्र की स्थिरता और क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज से मायने रखता है.
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आम तौर पर भारत किसी पड़ोसी देश के चुनावों में इतनी बारीकी से दिलचस्पी नहीं लेता, लेकिन इस बार मामला अलग है. वजह साफ है- करीब दो दशकों बाद पहली बार बांग्लादेश में एक ऐसी सरकार बनने जा रही है जिसमें शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में नहीं होगी. भारत लंबे समय से अवामी लीग सरकारों के साथ काम करता आया है. अब उसे एक बिल्कुल नई राजनीतिक हकीकत का सामना करना पड़ रहा है. इस चुनाव से भारत को ऐसे नतीजों का सामना करना पड़ सकता है, जिनसे वह पिछले बीस साल में नहीं गुजरा. यही वजह है कि बांग्लादेश के चुनाव पर भारत की नजरें भी टिकी हुई हैं. हालांकि यह केवल इस वजह ने नहीं है. यह चुनाव भारत के लिए कैसे और क्यों मायने रखते हैं चलिए एक-एक कर इसे विस्तार से समझते हैं.

क्यों अलग है यह चुनाव?

2024 में बांग्लादेश में छात्रों के नेतृत्व में हुए बड़े जन आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया. इसके बाद बनी अंतरिम सरकार ने देश को चुनाव की राह पर डाला. अब करीब 13 करोड़ मतदाता पहली बार उस राजनीतिक व्यवस्था में वोट डालेंगे जिसमें न शेख हसीना मैदान में हैं, न ही उनकी चिर-प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया. यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि- बांग्लादेश की राजनीति की पूरी दिशा बदलने वाला चुनाव है. इस बार मतदाता सिर्फ सांसद नहीं चुनेंगे, बल्कि एक संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी वोट करेंगे. इसे 'जुलाई चार्टर' कहा जा रहा है. इसका मकसद है सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को खत्म करना, संस्थानों को मजबूत बनाना और शासन में संतुलन लाना. यानी यह चुनाव लोकतंत्र की मरम्मत का भी एक बड़ा टेस्ट है.

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मैदान में कौन-कौन है?

इस बार चुनावी मैदान में तस्वीर बिल्कुल बदली हुई है. तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) इस समय सबसे बड़ी पार्टी है और सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार मानी जा रही है. कभी भारत-विरोधी मानी जाने वाली यह पार्टी अब अपने रुख में काफी नरमी ला चुकी है.
लंबे समय तक प्रतिबंधित रहने के बाद जमात-ए-इस्लामी की राजनीति में वापसी हुई है. अवामी लीग के बाहर होने से जो खाली जगह बनी है, उसे भरने में जमात सबसे आगे दिख रही है. सत्ता में साझेदार बनकर, या मजबूत विपक्ष बनकर. छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) युवाओं को आकर्षित कर रही है और जमात के साथ गठबंधन में है. हालांकि छोटी पार्टियां भी मैदान में हैं, लेकिन असली मुकाबला बीएनपी और जमात के बीच माना जा रहा है.

भारत-बांग्लादेश सीमा

भारत-बांग्लादेश सीमा
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भारत की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

भारत के लिए इस चुनाव का सबसे संवेदनशील पहलू पूर्वोत्तर की सुरक्षा से जुड़ा है. भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा है, और यही सीमा भारत के असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय और पश्चिम बंगाल से जुड़ती है. शेख हसीना के लगभग 16 साल के शासन में भारत को बड़ी राहत यह थी कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल उत्तर-पूर्वी उग्रवादी संगठनों ने नहीं किया. उल्टा, ढाका ने उल्फा जैसे संगठनों के बड़े नेताओं- जैसे अनूप चेतिया और अरविंद राजखोवा को भारत के हवाले किया, जिससे भारत के पूर्वोत्तर में शांति प्रक्रिया को मजबूती मिली. अब भारत बारीकी से देख रहा है कि नई सरकार इस नीति को जारी रखेगी या नहीं. दिल्ली के रणनीतिक हलकों में इसे 'रेड लाइन' माना जाता है, यानी इस मुद्दे पर भारत किसी तरह का समझौता नहीं करेगा.

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फिर चिंता क्यों है?

कई भारतीय जानकार यह मानते हैं कि सुरक्षा चिंताओं को शायद जरूरत से ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर देखा जा रहा है, क्योंकि बांग्लादेश की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारत पर निर्भर है, जिसमें बिजली, व्यापार, ट्रांजिट और कनेक्टिविटी शामिल है. लेकिन दूसरी ओर, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वोत्तर की सुरक्षा भारत के लिए अस्तित्व का सवाल है, और इसमें कोई जोखिम नहीं लिया जा सकता. यही वजह है कि भारत यह देखने को बेचैन है कि क्या बीएनपी अपने दम पर सरकार बनाएगी या उसे जमात-ए-इस्लामी को सत्ता में शामिल करना पड़ेगा? और अगर जमात सत्ता में आती है या ताकतवर विपक्ष बनती है, तो उसका भारत और सुरक्षा नीति पर असर क्या होगा?

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जमात भारत के लिए ‘रेड लाइन' है, पर...

भारत दशकों से जमात-ए-इस्लामी को लेकर सतर्क रहा है. ऐतिहासिक तौर पर इसे भारत-विरोधी सोच से जुड़ा माना गया है. 2001 से 2006 तक जब बीएनपी-जमात गठबंधन ने खालिदा जिया के नेतृत्व में सरकार चलाई थी, वह दौर भारत के लिए सहज नहीं रहा. पर अब हालात अलग हैं. जानकारों का कहना है कि जमात भी अब यह समझ रही है कि भारत से खुले टकराव की राजनीति उसके हित में नहीं है. हाल ही में उसके नेताओं ने भारत के साथ रिश्तों में कुछ नरमी के संकेत दिए हैं. जानकार कहते हैं कि भारत अब व्यवहारिक सोच अपना रहा है. जमात अगर सत्ता में आए तो भी भारत उसे बदल तो नहीं सकता क्योंकि पड़ोसी बदले नहीं जा सकते. पर भारत सुरक्षा के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेगा.

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क्या बीएनपी भारत की पहली पसंद है?

दिल्ली के रणनीतिक हलकों में इस बात पर लगभग सहमति है कि मौजूदा हालात में बीएनपी भारत की पहली पसंद है. हालांकि बीएनपी का अतीत भारत-विरोधी राजनीति से जुड़ा  है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने अपने रुख में बदलाव किया है. भारत ने भी इस बदलाव को नोटिस किया है. जानकार मानते हैं कि बीएनपी अब जमात से कुछ दूरी बनाती दिख रही है, भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है और सत्ता में आने पर स्थिरता देने की क्षमता रखती है. यही वजह है कि दिल्ली में बीएनपी को 'सबसे कम खराब विकल्प' माना जा रहा है. यानी मौजूदा सीमित विकल्पों में उसे सबसे बेहतर बताया जा रहा है.

बांग्लादेश चुनाव से भारत की दूरी

दिलचस्प बात यह है कि इस बार बांग्लादेश के चुनाव में भारत पर हस्तक्षेप के आरोप लगभग नहीं लगे हैं. जबकि पहले के चुनावों में ऐसा अक्सर बड़ा मुद्दा रहा करता है. हालांकि 2024 में बांग्लादेश के जन आंदोलन के दौरान सिर्फ शेख हसीना ही नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ भी नाराजगी और नारे देखने को मिले थे. जानकार बताते हैं कि तभी जब अवामी लीग चुनाव से बाहर हुई, तब भी भारत ने सार्वजनिक तौर पर कोई बड़ा बयान नहीं दिया. लोकतंत्र और स्थिरता की सामान्य बातें कही गईं, लेकिन किसी पार्टी का खुला समर्थन या विरोध नहीं किया गया. यह भारत की रणनीतिक चुप्पी थी, ताकि भविष्य की किसी भी सरकार से रिश्ते बनाने के रास्ते खुले रहें.

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बांग्लादेश के मतदाताओं के मुद्दे क्या हैं?

बांग्लादेश के आम मतदाता इस समय सिर्फ विदेश नीति या भारत-पाकिस्तान जैसे मुद्दों पर वोट नहीं कर रहे. उनके सामने महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, महिलाओं व युवाओं की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली जैसे बड़े मुद्दे हैं. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, हाल के वर्षों में बांग्लादेश में गरीबी बढ़ी है और नौकरियां घटी हैं. 18 से 37 साल के युवा मतदाता रोजगार और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हैं. इसलिए यह चुनाव लोगों के लिए सिर्फ सरकार बदलने का नहीं, बल्कि यह तय करने का मौका है कि क्या अगला नेतृत्व देश में स्थिरता, निष्पक्षता और भरोसा लौटा पाएगा?

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चुनावी सिस्टम और जुलाई चार्टर

बांग्लादेश में 300 सीटों वाली संसद है और जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही जीतता है, चाहे यह 50% से कम वोट ही क्यों न हों. इस बार विदेश में रहने वाले बांग्लादेशी भी पोस्टल बैलेट से वोट कर सकेंगे. 12 फरवरी को मतदाता सिर्फ सांसद नहीं चुनेंगे, बल्कि एक अहम सवाल पर वोट करेंगे क्या बांग्लादेश को 'जुलाई चार्टर' के जरिए संवैधानिक सुधारों की राह पर ले जाया जाए? इस चार्टर का मकसद कार्यपालिका की ताकत कम करना, संसद और न्यायपालिका को मजबूत करना, सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना, और लोकतंत्र में संतुलन बनाना है. इसमें अगर हां हुआ तो नई संसद को 84 सुधार लागू करने होंगे, अगर जीत न की हुई तो सुधार करना सरकार की मर्जी पर निर्भर रहेंगे.

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दक्षिण एशिया का शक्ति संतुलन कैसे बदलेगा?

अगर बांग्लादेश में ऐसी सरकार बनती है जो भारत के साथ सहयोगी रुख अपनाती है तो सीमाई सुरक्षा मजबूत रहेगी, पूर्वोत्तर भारत में शांति बनी रहेगी और ट्रेड एवं कनेक्टिविटी में सुधार आएगा.  पर चुनावी नतीजे के बाद अगर बांग्लादेश ने भारत से कुछ दूरी बढ़ाई या सुरक्षा मुद्दों पर कम सहयोग किया तो सीमाई तनाव बढ़ेगा, पूर्वोत्तर राज्यों पर इसका असर अस्थिरता के रूप में देखने को मिल सकती है.

भारत की एक चिंता यह भी है कि शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों में नरमी दिखी है. 1971 के युद्ध के बाद से इन दोनों देशों के बीच रिश्ते कुल मिलाकर तनावपूर्ण ही रहे हैं पर शेख हसीन के सत्ता से हटने के बाद के महीनों में यह संपर्क बढ़ा है. ताजा उदाहरण टी20 वर्ल्ड कप से बांग्लादेश के हटने के विरोध में पाकिस्तान के रुख से स्पष्ट होता है. ऐसे में अगर नई सरकार पाकिस्तान के साथ रिश्ते और गहरे करती है, तो यह भारत के लिए सुरक्षा और खुफिया स्तर पर रणनीतिक चुनौती बन सकती है.

बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सिकरी का मानना है कि, "12 फरवरी के बाद सबसे ज्यादा संभावना इस बात की है कि 'राष्ट्रीय सहमति की सरकार' का गठन हो, जिसमें बीएनपी और जमात अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ हाथ मिला लें."

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एक तरफ बांग्लादेश, भारत-पाक के दक्षिण एशिया में समीकरणों को लेकर अहम है तो यह चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा में भी अहम कड़ी है. चीन बांग्लादेश को दक्षिण एशिया का प्रवेश द्वार मानता है, जो उसकी बेल्ट ऐंड रोड परियोजना के लिए अहम है. वहीं अमेरिका वहां लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर जोर दे रहा है और इसके जरिए वह चीन के प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास कर रहा है. लिहाजा नई बांग्लादेश सरकार का झुकाव इंडो-पैसिफिक संतुलन के लिहाज से अहम है. ऐसे में बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकार की वापसी और वहां स्थिरता का होना जहां अमेरिका की दक्षिण एशिया की रणनीतियों के लिए जरूरी है वहीं पड़ोसी मुल्क होने के कारण यह भारत के लिए उससे भी अधिक अहम है.

करीब बीस साल बाद भारत को ऐसे बांग्लादेश से निपटना होगा जहां उसकी पारंपरिक सहयोगी अवामी लीग सत्ता में नहीं होगी. यह अनिश्चितता जरूर है पर साथ ही यह भारत के लिए नई कूटनीति गढ़ने का मौका भी है और यही वजह है कि 12 फरवरी का दिन सिर्फ बांग्लादेश के लिए नहीं, पूरे दक्षिण एशिया के लिए अहम है.

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