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बांग्लादेश चुनाव: उतरते नकाब और आगे की राह

Veena Sikri
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 11, 2026 20:33 pm IST
    • Published On फ़रवरी 11, 2026 20:12 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 11, 2026 20:33 pm IST
बांग्लादेश चुनाव: उतरते नकाब और आगे की राह

"चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी वैसी की वैसी रहती हैं" बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले चुनाव को लेकर ये कहावत सटीक बैठती है. एक-एक करके सारे नकाब उतर चुके हैं. जुलाई-अगस्त 2024 की वो घटनाएं, जिन्हें "छात्रों का विद्रोह" कहा गया था और जिसके कारण शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी, बांग्लादेश के इतिहास में 'शासन परिवर्तन' के रूप में सामने आया. यह ठीक वैसा ही है जैसा 1975 में बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान और 1981 में जिया-उर-रहमान की हत्या के बाद देखा गया था. शेख हसीना अपनी जान बचाकर कैसे निकलीं, ये अपने आप में एक अलग घटनाक्रम है.

बांग्लादेश में 13वें संसदीय चुनाव 12 फरवरी को होने हैं. ये चुनाव शेख हसीना सरकार के कार्यकाल में हुए पिछले चुनावों खासकर 2024 के चुनावों से काफी अलग हैं. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर बैन लगा दिया है, जिससे वो इन चुनावों में हिस्सा नहीं ले पा रही. बांग्लादेश में 35 से 40 प्रतिशत के बीच वोट शेयर रखने वाली सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को प्रतिबंधित करने से साफ है कि ये चुनाव सर्व-समावेशी और सर्व-भागीदारी वाले नहीं रह गए हैं. लोकतांत्रिक मानकों पर ऐसे चुनावों को विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता. इसके उलट, बांग्लादेश की दूसरी बड़ी पार्टी बीएनपी (तारिक रहमान के नेतृत्व वाली) के ऊपर अवामी लीग ने कभी बैन नहीं लगाया. 2024 के चुनावों से बीएनपी अलग रही तो उसकी वजह वह खुद थी. चुनाव में हिस्सा न लेने का फैसला उसका खुद का था.

पिछले साल अक्टूबर में 'प्रथम आलो' के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत लोग चाहते थे कि अवामी लीग किसी न किसी रूप में इन चुनावों में हिस्सा ले. हालांकि संभावित वोट शेयर के मामले में सर्वेक्षण में दावा किया गया कि लगभग 66 प्रतिशत लोग बीएनपी को और 26 प्रतिशत जमात-ए-इस्लामी को वोट दे सकते हैं. अवामी लीग के मामले में यह प्रतिशत महज 7.2 का रहा. ये सिर्फ संयोग नहीं है कि जमात-ए-इस्लामी को वोट देने वाले संभावित लोगों और अवामी लीग की भागीदारी का विरोध करने वालों का प्रतिशत लगभग एक बराबर था.

पिछले 18 महीनों से बांग्लादेश सरकार पर जमात-ए-इस्लामी का एक तरह से सिक्का चल रहा है और मोहम्मद यूनुस उनके प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं. जमात का असल मकसद 12 फरवरी के चुनावों के जरिए इस कंट्रोल को कानूनी जामा पहनाना है. भीड़तंत्र और हिंसा के जरिए जमात ने न्यायपालिका, नौकरशाही और विश्वविद्यालयों के शीर्ष पदों से उन लोगों को निकाल फेंका है जो उसके अनुकूल नहीं थे. हिंदू, बौद्ध, ईसाई, सूफी और अहमदिया जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले लगातार जारी हैं, जिन्हें अक्सर राजनीतिक और असांप्रदायिक गतिविधि बताकर जायज बताने की कोशिश होती रही है. मीडिया को भी डरा-धमकाकर या पत्रकारों की गिरफ्तारी के जरिए काबू कर लिया गया है.

जहां एक तरफ पश्चिम के पारंपरिक लोकतांत्रिक देश बांग्लादेश के इस हाल पर चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं जमात-ए-इस्लामी ने सत्ता के तमाम अहम स्तंभों पर अपना मजबूत कंट्रोल स्थापित कर लिया है और वह हर लोकतांत्रिक संस्था को अंदर से खोखला कर रही है. जमात की युवा शाखा इस्लामी छात्र शिबिर ने ढाका विश्वविद्यालय, जहांगीरनगर विश्वविद्यालय और जगन्नाथ विश्वविद्यालय जैसे प्रमुख संस्थानों के छात्र संघ चुनावों में जीत हासिल की है. ये जीत छात्र संगठनों पर उनके बढ़ते दबदबे का साफ संकेत है. इसने बीएनपी और हाल ही में गठित एनसीपी (नेशनल सिटीजन्स पार्टी) दोनों को हाशिए पर धकेल दिया है. एनसीपी में वही 'छात्र' शामिल हैं जो जुलाई-अगस्त 2024 के घटनाक्रम में एक्टिव थे और यूनुस से करीबी जुड़ाव के कारण 'किंग्स पार्टी' के नाम से चर्चित थे. वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक हालिया लेख में एक अमेरिकी राजनयिक की बातचीत का हवाला दिया गया है, जो जमात के प्रति अमेरिका के संभावित समर्थन की तरफ इशारा करता है.

13 जनवरी 2026 को प्रथम आलो ने दिसंबर 2025 में हुए चुनावी सर्वे के नतीजे प्रकाशित किए. ये सर्वे सभी 64 जिलों में किया गया था. इससे साफ संकेत मिलते हैं कि बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के समर्थकों की संख्या बढ़ी है, जो अब बीएनपी के साथ कांटे की टक्कर में है. सर्वे दिखाता है कि जमात का समर्थन बढ़कर 33 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो बीएनपी के 34 प्रतिशत के लगभग बराबर है. जमात के 11 दलीय गठबंधन का हिस्सा बन चुकी एनसीपी को लगभग 7 फीसदी वोट शेयर मिलता बताया गया है, जबकि देश में शरिया कानून की समर्थक इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश को 3 फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई गई है. अगर ये सर्वे सही निकला तो ये न सिर्फ जमात की स्थिति को मजबूत करेगा बल्कि एनसीपी के वोट शेयर का भी फायदा दिलाएगा. हालांकि 17 फीसदी वोटर अभी भी अनिश्चय की स्थिति में हैं और जीत की चाबी इन्हीं मतदाताओं के हाथ में मानी जा रही है. 

इन अनिश्चित वोटरों में बड़ी संख्या महिलाओं की है, जो पिछले 18 महीनों में बढ़ती असुरक्षा, महंगाई और कट्टरपंथी संगठनों द्वारा थोपे जा रहे ड्रेस कोड से काफी परेशान हैं. ढाका और अन्य शहरों में रेप, छेड़छाड़ की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है. यहां तक कि बिंदी लगाने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. इतना ही नहीं महिला कामगारों की रोजीरोटी छीन ली गई है. महंगाई ने कमर तोड़कर रख दी है.

चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों में 4 फीसदी से भी कम संख्या महिलाओं की है, और जो हैं भी वो परिवारवाद की परंपरा निभाते हुए मैदान में हैं. जमात ने एक भी महिला को उम्मीदवार नहीं बनाया है. बीएनपी के 250 उम्मीदवारों में महज 10 महिलाएं हैं. जमात के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान द्वारा महिलाओं के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों ने उन्हें और किनारे कर दिया है. इसका खामियाजा जमात को वोटों के रूप में मिल सकता है, लेकिन सवाल यही है कि क्या नाखुश महिलाओं के ये वोट बीएनपी के खाते में जाएंगे या नहीं?

चुनाव से ठीक पहले 'प्रथम आलो' का अंतिम जनमत सर्वेक्षण 9 फरवरी को प्रकाशित हुआ. 21 जनवरी से 5 फरवरी के बीच सभी 300 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में किए गए इस सर्वे के नतीजे जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलीय गठबंधन के लिए चिंताजनक हैं, क्योंकि जनवरी में मिलने वाली बढ़त अब घटती दिख रही है. आंकड़ों के अनुसार, बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 44.1 प्रतिशत वोट शेयर मिलने की संभावना है, जबकि जमात के नेतृत्व वाला गठबंधन 43.9 प्रतिशत पर सिमटता दिख रहा है. इस सर्वे में एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह दिखा है कि अनिश्चित वोटरों की संख्या घटकर अब महज 6.5 प्रतिशत रह गई है. साफ है कि चुनावी मुकाबला बिल्कुल तलवार की धार पर टिका है और जीत-हार का अंतर बहुत कम रहने वाला है.

अवामी लीग ने अपने चुनाव चिह्न 'नाव' का इस्तेमाल करते हुए इन चुनावों का बहिष्कार करते हुए "नो बोट, नो वोट" अभियान चलाया है. इसमें सभी समर्थकों से चुनावों के बहिष्कार का आह्वान किया गया है. इसकी वजह से मतदान प्रतिशत में भारी गिरावट आने की आशंका है. पूरे बांग्लादेश में अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर जमात और बीएनपी की ओर से वोट डालने का भारी दबाव बनाया जा रहा है. धमकियां दी जा रही हैं. 9 फरवरी को एक निजी संस्था द्वारा प्रकाशित सर्वे में चौंकाने वाला दावा किया गया था कि अवामी लीग के 80 प्रतिशत समर्थक और 77 प्रतिशत महिलाएं बीएनपी को वोट दे सकती हैं. यदि ऐसा होता है तो बीएनपी को 300 में से 208 सीटों के साथ भारी बहुमत मिल सकता है और जमात के खाते में केवल 46 सीटें आ सकती हैं. हालांकि ये एक चरम स्थिति है जिसके हकीकत में बदलने के आसार कम ही लगते हैं.

इन चुनावों में बड़े पैमाने पर 'वोट इंजीनियरिंग' यानी चुनावी धांधली के आरोप लग रहे हैं. बताते हैं कि बीएनपी नेता तारिक रहमान ने खुद चुनाव आयोग से वोटर लिस्ट में हुई भारी उलटफेर की शिकायत की है. अकेले ढाका के 17 निर्वाचन क्षेत्रों में ही 15 लाख नए मतदाता दिखाए गए हैं. गड़बड़ी के ऐसे भी उदाहरण सामने आए हैं जहां 4 वोटरों वाले एक परिवार को बिना किसी स्पष्टीकरण के 41 वोटर स्लिप थमा दी गई हैं. बांग्लादेश के चुनावों में मतपेटियों में फर्जी वोट भरने की समस्या कोई नई नहीं है. चूंकि इस वक्त सत्ता की कमान जमात-ए-इस्लामी के हाथों में है, ऐसे में चुनाव से पहले हो रही इन तमाम घटनाओं को जमात और उसके सहयोगियों द्वारा बहुमत हासिल करने की सुनियोजित कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि कोई नहीं जानता कि आखिर में यह लक्ष्य उनके लिए महज छलावा साबित हो जाए.

12 फरवरी के बाद सबसे ज्यादा संभावना इस बात की है कि 'राष्ट्रीय सहमति की सरकार' का गठन हो, जिसमें बीएनपी और जमात अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ हाथ मिला लें. ये विकल्प जून 2025 से टेबल पर है, जब यूनुस ने लंदन दौरे में तारिक रहमान से विस्तृत बातचीत की थी. एक फॉर्मूला ये भी है कि यूनुस राष्ट्रपति बन जाएं, तारिक रहमान को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिले और जमात के अमीर को डिप्टी पीएम का पद सौंप दिया जाए. इसके बावजूद एक 'राष्ट्रीय सहमति की सरकार' बनने की संभावना बनी हुई है, क्योंकि किसी भी एक दल को अपने दम पर बहुमत मिलना मुश्किल नजर आ रहा है. 

मुहम्मद यूनुस ने 'जुलाई नेशनल चार्टर-2025' पर जनमत संग्रह कराने में काफी रुचि दिखाई है, जो राष्ट्रीय चुनावों के साथ ही होना है. उनकी सरकार ने तो सरकारी तंत्र को 'हां' के पक्ष में वोट सुनिश्चित कराने के निर्देश तक दे दिए थे, जिस पर चुनाव आयोग ने कड़ी आपत्ति जताई. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस जनमत संग्रह के बैलेट पेपर पर कोई नंबर नहीं है, जिससे अनलिमिटेड छपाई का रास्ता खुल जाता है. इसमें 84 जटिल सवालों के जवाब केवल एक 'हां' या 'ना' में मांगे गए हैं. बांग्लादेश के संविधान में जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है और न ही अंतरिम सरकार के पास संवैधानिक सुधार करने या सरकार के ढांचे को बदलने का अधिकार है. फिर भी 'जुलाई चार्टर' को अंतिम रूप दे दिया गया है, जो प्रधानमंत्री की शक्तियों को कम कर राष्ट्रपति को अधिक अधिकार देने का प्रस्ताव रखता है. 

यूनुस खुद को राष्ट्रपति पद के मुख्य दावेदार के रूप में देख रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश में जमीनी स्थिति ये है कि उनकी लोकप्रियता काफी घट चुकी है और उनकी आलोचना बढ़ रही है. अंततः राष्ट्रपति के रूप में यूनुस की स्वीकार्यता ही नई सरकार की स्थिरता का टर्निंग पॉइंट होगी. बांग्लादेश की जनता अब तक धैर्य बनाए हुए है, लेकिन अब लोग खराब होती अर्थव्यवस्था, चरमराती कानून व्यवस्था और जनमत संग्रह के जरिए थोपे जा रहे संवैधानिक बदलावों के खिलाफ मुखर हो रहे हैं. पूरे देश में "आगेई भालो छिलो" (पहले ही अच्छा था) की गूंज सुनाई दे रही है. अगर चुनाव नतीजों में किसी भी तरह की धांधली या हेरफेर की कोशिश की गई तो देश में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़कने का खतरा भी कम नहीं है.

लेखिका वीना सीकरी बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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