- बांग्लादेश में फरवरी में चुनाव हो रहा है, जिसमें बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी प्रमुख दावेदार हैं
- जमात-ए-इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी होने के बावजूद अब सभी वर्गों के मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रही है
- जमात के उम्मीदवार मीर अहमद बिन कासिम अरमान भारत के साथ सहयोग बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं
बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव हो रहा है. अगस्त 2024 से बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार का शासन रहा है, क्योंकि शेख हसीना के नेतृत्व वाली पिछली सरकार को जुलाई 2024 के हिंसक प्रदर्शनों में सत्ता से बेदखल कर दिया गया था. तब से ही सभी का इस बात पर ध्यान है कि चुनाव के बाद बांग्लादेश पर कौन शासन करेगा? चुनाव में जीत के दो प्रमुख दावेदार हैं बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी. जमात एक कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी है, जो अब समाज के सभी वर्गों के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है.
"हम फासीवाद दोबारा नहीं चाहते"
एनडीटीवी ने इन चुनावों में जमात के एक प्रमुख उम्मीदवार से बात की. ढाका-14 निर्वाचन क्षेत्र से जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार बैरिस्टर मीर अहमद बिन कासिम अरमान एक हाई-प्रोफाइल चुनाव लड़ रहे हैं. बांग्लादेश में जबरन गायब किए जाने के शिकार अरमान का मुकाबला बीएनपी की संजीदा इस्लाम से है, जिन्हें तुली के नाम से जाना जाता है. संजीदा इस्लाम जबरन गायब किए जाने के पीड़ितों के परिवारों द्वारा गठित समूह 'मदर्स कॉल' की समन्वयक हैं. अरमान कहते हैं, "हम फासीवाद दोबारा नहीं चाहते. मैं खुद जबरन गायब किए जाने का शिकार हुआ था. मुझे उम्मीद है कि जनमत संग्रह में 'हां' की जीत होगी."
Bangladesh Polls | Jamaat Candidate Mir Ahmad Bin Quasem Arman Speaks On Women, Minorities, & Change
— NDTV WORLD (@NDTVWORLD) February 9, 2026
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भारत से मिलकर काम करने की वकालत
अरमान भी जमात के प्रमुख चेहरों में से एक हैं और भारत के साथ मिलकर काम करने की वकालत कर रहे हैं. एनडीटीवी को दिए एक साक्षात्कार में अरमान ने कहा, "भारत और बांग्लादेश एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं, और हमें मिलकर काम करना होगा."
इस टिप्पणी को इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि जमात अपने इतिहास और पहले के पाकिस्तान समर्थक रुख के बावजूद भारत के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है. हाल के महीनों में भारत से अलगाव ने बांग्लादेश की स्थिति को और खराब कर दिया है और यह सरकार के लिए एक चुनौती बना हुआ है, क्योंकि बांग्लादेश की लगभग पूरी भू-सीमा भारत से लगती है.
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हालांकि बांग्लादेश पर नजर रखने वाले अधिकांश लोगों के अनुसार बीएनपी सबसे आगे है, लेकिन जमात ने उन क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाई है जहां वह कमजोर थी, और यह तब से हो रहा है जब से उस पर लगा प्रतिबंध हटा है. अब उसका लक्ष्य बहुमत हासिल करना है. जमात के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान कहते हैं, "महज एक साल पहले, मेरी पार्टी को हाशिए पर खड़ी पार्टी मानकर खारिज कर दिया गया था, और अनुमान था कि उसे मुट्ठी भर सीटें ही मिलेंगी. आज, जमात बहुमत के कगार पर खड़ी है. यह जनता की इच्छा है. जब जनता एकजुट हो जाती है, तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता."
"आधुनिक बांग्लादेश चाहिए"
उन्होंने आगे कहा, "मैं एक ऐसा आधुनिक बांग्लादेश चाहता हूँ जो परिपक्व और शासन करने के लिए तैयार हो. इसीलिए मैंने वैश्विक विशेषज्ञों के साथ देश का पहला नीति शिखर सम्मेलन शुरू किया है ताकि मैं अपना घोषणापत्र और 100 दिनों का स्पष्ट शासनात्मक रोडमैप प्रस्तुत कर सकूं."
जमात जानती है कि अपने कट्टरपंथी अतीत के कारण अधिक मतदाताओं को अपने पक्ष में करना मुश्किल होगा. इसीलिए वह उन वर्गों को लुभाने की कोशिश कर रही है, जो इस्लामी ताकतों के प्रति शत्रुतापूर्ण रहे हैं, विशेषकर हिंदू समुदाय और महिला मतदाताओं जैसे अल्पसंख्यकों को.
जमात हिंदुओं को वोट देने के लिए कैसे मनाएगी?
जब अरमान से पूछा गया कि हिंदू विरोधी छवि के बावजूद जमात हिंदुओं को अपने पक्ष में वोट देने के लिए कैसे मनाएगी, तो उन्होंने एनडीटीवी को बताया, "हम बदलाव का वादा कर रहे हैं, और जो भी बदलाव चाहता है, वह जाति, धर्म और लिंग की परवाह किए बिना हमारे साथ खड़ा होगा. मेरा मानना है कि हिंदुओं पर ऐतिहासिक रूप से अत्याचार हुए हैं, और मेरा मानना है कि वे भी बदलाव चाहते हैं, और बदलाव की इस मांग के कारण हमें उनका समर्थन मिलेगा."

मीर अहमद बिन कासिम, फांसी पर लटकाए गए जमात-ए-इस्लामी नेता मीर कासिम अली के छोटे बेटे हैं. उन्हें 2024 में शेख हसीना की सत्ता से बेदखल होने के बाद 'गुप्त हिरासत' से रिहा किया गया था. उन्हें जमात के शीर्ष नेतृत्व के करीबी के रूप में देखा जाता है और उम्मीद है कि अगर जमात चुनाव में जीत हासिल करने में कामयाब होती है तो उनकी आवाज प्रमुख होगी. अरमान अपने पिता की कानूनी टीम में काम करते थे, इससे पहले कि सितंबर 2016 में बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा उन्हें 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किए गए अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया और फांसी दे दी गई.
मीर अहमद बिन कासिम ने इन्स ऑफ कोर्ट स्कूल ऑफ लॉ (आईसीएसएल) से बार वोकेशनल कोर्स (बीवीसी) पूरा किया और इंग्लैंड और वेल्स के बार में बैरिस्टर के रूप में शामिल हुए. उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की थी.
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