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संघर्ष, रणनीति और सख्ती: कैसे खामेनेई ने 36 साल में ईरान की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाई

US-Israel Attack Iran: इजरायली मीडिया दावा कर रहा है कि अमेरिका और ईजरायल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई है.

संघर्ष, रणनीति और सख्ती: कैसे खामेनेई ने 36 साल में ईरान की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाई
US-Israel Attack Iran: हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत का दावा कर रहा इजरायल

अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया है जिससे मिडिल ईस्ट में एक और जंग शुरू हो गई है. ईरानी मीडिया ने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत की पुष्टि भी कर दी है. इस तनाव के माहौल में हम आपके लिए अली खामेनेई की कहानी लेकर आए हैं जो सिर्फ एक धार्मिक नेता के उत्थान की कहानी नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति, संघर्ष और सत्ता संतुलन की जटिल यात्रा है. 1963 में जेल की यातनाओं से लेकर क्रांति और युद्ध के दौर तक सक्रिय भूमिका निभाने वाले अली खामेनेई ने खुद को धीरे-धीरे ईरान की राजनीति के केंद्र में स्थापित किया. 1989 में अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमेनी की मृत्यु के बाद संवैधानिक बदलावों के बीच उनका सुप्रीम लीडर बनना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था. चलिए आपको उनके सुप्रीम लीडर बनने की कहानी बताते हैं. साथ ही समझेंगे कि बीते 36 वर्षों में कैसे उन्होंने ईरान पर शासन किया है.

खामेनेई कैसे बने सुप्रीम लीडर

1963 में शाह के शासन के दौरान राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें जेल में डाला गया और यातनाएं दी गईं.  ईरानी क्रांति के बाद सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमेनी के नेतृत्व में वे उप रक्षा मंत्री बने और 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान सुरक्षा बलों के करीब आए. जून 1981 में तेहरान की अबूजर मस्जिद में हुए टेप रिकॉर्डर बम से वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उनका दाहिना हाथ लकवाग्रस्त हो गया और उन्हें एक कान से सुनाई देना बंद हो गया. वे सबकी नजर में क्रांति के जीवित शहीद बन गए थे और इसने उनकी छवि को मजबूत कर दिया. कुछ ही महीनों के भीतर, रूहुल्लाह के समर्थन से वह ईरान के राष्ट्रपति के रूप में चुने गए.

जून 1989 में अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमेनी की मृत्यु के बाद, असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स (धार्मिक विद्वानों की एक परिषद) ने अली खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना. खास बात थी कि उस समय तक खामेनेई शिया धर्मगुरुओं में उस जरूरी ऊंचे धार्मिक पद तक नहीं पहुंचे थे, जिसे सुप्रीम लीडर बनने के लिए संविधान में अनिवार्य बताया गया था. वहां कोई “मरजा-ए-तकलीद” (सबसे बड़े धार्मिक मार्गदर्शक) या ग्रैंड अयातुल्लाह ही सुप्रीम लीडर बन सकता था..

इस समस्या को ठीक करने के लिए संविधान में बदलाव किया गया. उसमें यह लिखा गया कि सर्वोच्च नेता को “इस्लामी ज्ञान” होना चाहिए. इससे खामेनेई को चुनना आसान हो गया. उन्हें एक ही रात में धार्मिक पद होज्जत-उल-इस्लाम से बढ़ाकर अयातुल्लाह बना दिया गया.

शुरुआत में बहुत लोग अली खामेनेई को कमजोर मानते थे. उन्हें लगता था कि वे इस्लामी गणराज्य के संस्थापक अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमेनी के सही उत्तराधिकारी नहीं हैं. खामेनेई के लिए धार्मिक अधिकार के जरिए ताकत चलाना मुश्किल था, जबकि उस समय तक ईरान की व्यवस्था ऐसी ही थी. काफी समय तक वे अपने गुरु खोमेनी की छाया से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करते रहे. लेकिन बाद में उन्होंने अपने प्रति वफादार एक मजबूत सुरक्षा तंत्र बनाया और उसी के सहारे ईरान पर अपनी पकड़ मजबूत की.

खामेनेई पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका पर भरोसा नहीं करते थे. वे लंबे समय से अमेरिका पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह उन्हें सत्ता से हटाना चाहता है. यहां तक की जनवरी के प्रदर्शनों के बाद एक भाषण में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अशांति के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ईरानी जनता को हुए नुकसान और मौतों के लिए अपराधी हैं.

खामेनेई इतने ताकतवर कैसे हुए?

अपने 36 साल के कार्यकाल में जब भी दबाव बढ़ा, खामेनेई ने अक्सर इस्लामिक रिव्यूशनरी कॉर्प्स गार्ड (IRGC) और बसीज नाम के अर्धसैनिक बल की मदद ली. ये दोनों ईरान के अंदर विरोध को दबाने में उनकी मदद करते रहे हैं. 2009 में चुनाव में गड़बड़ी के आरोपों के बाद जब विरोध प्रदर्शन हुए, तो इन्हीं बलों ने उन्हें कुचल दिया. 2022 में महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद हुए प्रदर्शनों में भी सख्ती दिखाई गई. जनवरी के ताजा प्रदर्शनों को भी इन्हीं बलों ने दबाया.

खामेनेई की ताकत का एक और बड़ा कारण “सेताद” नाम का एक बड़ा आर्थिक नेटवर्क है, जो सीधे उनके नियंत्रण में है. इसकी कीमत अरबों डॉलर बताई जाती है और इसने सुरक्षा बलों में भारी निवेश किया है.

खास बात है कि खामेनेई ने सुप्रीम लीडर का पद संभालने के बाद से ईरान नहीं छोड़ा. राष्ट्रपति रहते हुए 1989 में उत्तर कोरिया की अपनी आखिरी विदेश यात्रा की थी.

कब-कब खामेनेई ने समझौता किया?

2013 में उन्होंने “हीरोइक फ्लेक्सिबिलिटी” (लचीलेपन) की बात कही. इसका मतलब है कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए जरूरत पड़ने पर रणनीतिक समझौता करना. यह वैसा ही था जैसे 1988 में उनके गुरू ने खोमेनी ने इराक के साथ 8 साल के युद्ध के बाद युद्धविराम स्वीकार किया था.

2015 में ईरान ने छह बड़ी ताकतों के साथ परमाणु समझौता किया. खामेनेई ने इसे सावधानी से समर्थन दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि प्रतिबंध हटाने से अर्थव्यवस्था सुधरेगी और उनकी सत्ता मजबूत होगी. लेकिन ट्रंप ने 2018 में इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया और ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए. जवाब में ईरान ने धीरे-धीरे परमाणु कार्यक्रम की शर्तों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया.

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