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अगर अमेरिका ने ईरान पर बोला हमला तो कौन सा देश होगा किसके साथ, समझिए पावर गेम

अमेरिका ने ईरान में सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है. इस पर ईरान ने कहा है कि वह किसी भी अमेरिकी कार्रवाई का माकूल जवाब देगा.

अगर अमेरिका ने ईरान पर बोला हमला तो कौन सा देश होगा किसके साथ, समझिए पावर गेम
नई दिल्ली:

ईरान और इजरायल में जून 2025 में एक भीषण युद्ध हुआ था. यह युद्ध 12 दिन तक चला था. इसमें दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. पहली बार किसी देश ने इजरायल के अंदर मिसाइलें दागी थीं. इजरायल और अमेरिका ने ईरान को काफी नुकसान पहुंचाया था. युद्ध खत्म होने पर ईरान के हौसले बुलंद थे. लोगों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की सत्ता के प्रति थोड़ा विश्वास बढ़ा था. लेकिन दिसंबर आते-आते ईरान की जनता अपनी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई. इन दिनों ईरान विरोध-प्रदर्शनों की आग में झुलस रहा है. यह देख अमेरिका ने ईरान में सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है. वहीं ईरान ने कहा है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो वह इजरायल और अरब के दूसरे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा. इसके बाद से इस क्षेत्र में स्थिति और तनावपूर्ण हो गई है. 

अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो क्या होगा

ईरान पर हमले की चेतावनी अमेरिकी ने ऐसे समय दी है, जब कुछ दिन पहले ही वह वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठाकर अपने यहां ले जा चुका है. ऐसे में आशंका जताई जा सकती है कि अमेरिका ईरान में भी हमला कर वहां की सरकार को अस्थिर कर सकता है. ईरान पर अमेरिका के हमले की स्थिति में क्या होगा. यही सवाल हमने भारतीय थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च फेलो डॉक्टर पवन चौरसिया से पूछा. वो कहते हैं कि ईरान इस समय सबसे कमजोर स्थिति में है. उसे आर्थिक मोर्चे पर काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. वो कहते हैं कि इस बार का प्रदर्शन व्यापारियों ने शुरू किया है, यह व्यापारी वर्ग सत्ता के काफी करीब रहा है और वह धार्मिक भी है. वो कहते हैं 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद अयातुल्लाह खुमैनी पेरिस से जिस फ्लाइट से ईरान लौटे थे, उसका खर्च भी इन्हीं व्यापारियों ने दिया था. डॉक्टर चौरसिया कहते हैं कि इसलिए इन विरोध-प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ बता देना ठीक नहीं है. 

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अमेरिका के साथ युद्ध के हालात में ईरान को कितना समर्थन मिलेगा. इस सवाल के जवाब में डॉक्टर चौरसिया कहते हैं कि आज ईरान के प्रॉक्सी और उसके मित्र देश काफी कमजोर स्थिति में हैं. सीरिया से ईरान समर्थक असद सरकार का पतन हो चुका है और रूस खुद ही युद्ध में उलझा हुआ है. ऐसे में ईरान के पास सहयोगी बहुत कम हैं. वो कहते हैं कि वेनेजुएला की घटना के बाद से खामेनेई विरोधी ताकतों के हौसले बुलंद हैं, उन्हें लगता है कि जब एक राष्ट्रपति को इस तरह से पकड़ कर लाया जा सकता है तो यह ईरान में भी हो सकता है. डॉ. चौरसिया बताते हैं कि खामेनेई के उत्तराधिकारी को लेकर भी काफी अनिश्चितता है, ऐसे में उनके विरोधियों को यह लगता है कि वो उन्हें सत्ता से हटा सकते हैं. वो कहते हैं कि ईरान में यह भावना तेजी से बढ़ रही है.

डॉ. चौरसिया एक बात की ओर और इशारा करते हैं. वो कहते हैं कि ईरानी जनता इस बात से भी नाराज है कि खामेनेई शासन अपना घर छोड़कर गजा, लेबनान और यमन के विद्रोहियों की मदद कर रहे हैं. वो कहते हैं कि इस वजह से इस बार के प्रदर्शन में यह नारा लग रहा है'नाइदर गाजा, नॉर लेबनान, माई लाइफ फॉर ईरान'. ईरानी लोगों का कहना है कि दुनिया भर की चिंता करनी छोड़ कर हमें अपनी चिंता करनी चाहिए. 

अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन किधर होगा

युद्ध की स्थिति में चीन किधर होगा, इस सवाल के जवाब में डॉ. चौरसिया कहते हैं कि कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों लगता है कि चीन अभी भी लीडरशिप वाली भूमिका के लिए तैयार नहीं है. वो चीन की आर्मी को 'वर्जिन आर्मी'बताते हुए कहते हैं कि चीन ने बहुत सालों से कोई युद्ध नहीं लड़ा है, ऐसे में उसे भय है कि वह अगर कहीं युद्ध में फंसा तो हो सकता है कि उसकी पोल खुल जाए. इसलिए उसका सारा ध्यान व्यापार पर है.डॉ. चौरसिया एक और पहलू की ओर इशारा करते हैं. वो कहते हैं कि कई विश्लेषकों को यह लगता है कि चीन इस मामले में अमेरिका की मदद कर रहा है. वो कहते हैं कि चीन दरअसल अमेरिका की मदद कर एक ऐसा वर्ल्ड ऑर्डर बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसमें केवल दो वैश्विक महाशक्तियां हो. वो कहते हैं कि चीन पूर्वी दुनिया में अपनी पकड़ चाहता है और बाकी की दुनिया के लिए वह अमेरिका को खुली छूट दे रहा है. डॉ. चौरसिया इसे कोल्ड वॉर का नया संस्करण बताते हैं. 

हालांकि डॉ. चौरसिया यह भी कहते हैं कि इतना सब होने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका खामेनेई को सत्ता से हटा ही दे. वो कहते हैं कि 'इस्लामिक क्रांति' ईरान के किसी नेता से प्रेरित नहीं है, बल्कि वह एक विचारधारा है और उसके समर्थकों का आधार बहुत बड़ा है. 
 

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पिछले कई सालों से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझे हुए हैं.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पिछले कई सालों से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझे हुए हैं.

क्या विरोध-प्रदर्शनों का शांत कर पाएगा ईरान

अजीजुर रहमान आजमी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वेस्ट एशिया एंड नार्थ अफ्रीकन स्टडीज विभाग में पढ़ाते हैं. ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों को लेकर वो इस बात के लिए आश्वस्त नजर आते हैं कि खामेनेई सरकार उससे निपट लेगी और ईरान कुछ दिनों में शांत हो जाएगा. वो ईरान में सत्ता परिवर्तन होने से इनकार करते हैं. वो कहते हैं कि ईरान में अभी हो रहा विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, इन लोगों से अधिक संख्या इस्लामिक क्रांति के समर्थकों की है. वो कहते हैं कि इस्लामिक क्रांति के समर्थक सरकार के समर्थन में सड़क पर उतर रहे हैं.  अमेरिका के हमले के सवाल पर डॉ. रहमान कहते हैं कि ईरान प्रतिरोध तो करेगा ही. वो कहते हैं कि युद्ध की सूरत में इजरायल का बहुत अधिक नुकसान होगा और ईरान पश्चिम एशिया में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा. वो यह भी कहते हैं कि पश्चिम एशिया में अपने साथी को बचाने के लिए रूस और चीन भी कुछ न कुछ कदम जरूर उठाएंगे,क्योंकि ईरान के बाद उनका इस इलाके में कोई साथी नहीं रह जाएगा. 

ईरान और चीन ने 2021 में एक रणनीतिक सहयोगह समझौता किया था. यह समझौता 25 साल के लिए है. इसमें व्यापार के साथ-साथ खुफिया जानकारियां  साझा करना और सैन्य सहयोग भी शामिल है. 

ईरान में रजा पहलवी की क्या भूमिका होगी

रजा पहलवी की भूमिका के सवाल पर डॉ.चौरसिया कहते हैं कि वो कभी ईरान गए ही नहीं हैं. इस्लामिक क्रांति के समय वो अमेरिका में ही थे और उनका पूरा जीवन वहीं बीता है.वो समय-समय पर ईरान में सक्रिय होने की कोशिशें करते रहते हैं और आजकल लोकतंत्र की भी बात कर रहे हैं. लेकिन अमेरिकी शासन में इस बात को लेकर संशय है कि वो किसी देश में कठपुतली सरकार खड़ी करना फायदेमंद होगा. वो कहते हैं कि वेनेजुएला पर कार्रवाई के बाद लोगों को लगा था कि अमेरिका वहां नोबेल पुरस्कार विजेता मारिया कोरिना मचाडो की सरकार बनवा देगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वहां की उपराष्ट्रपति के पास सत्ता है और उनके अमेरिका से संबंध भी सुधर रहे हैं. डॉ. चौरसिया बांग्लादेश में मोहम्मद युनुस की सरकार बनाने का भी उदाहरण देते हैं, जो बहुत अधिक लाभदायक नहीं हुए. वो कहते हैं कि हो सकता है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की स्थिति में अमेरिका खामेनेई की सरकार में से ही किसी को सत्ता सौंप दे. और रजा पहलवी देखते ही रह जाएं.

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