- भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल चीन में हैं और विदेश मंत्री एस जयशंकर रूस में अपने दौरे पर हैं
- भारत ने किसी पक्ष को चुनने की बजाय सभी देशों के साथ संतुलित और शांतिपूर्ण कूटनीतिक संबंध बनाए रखे हैं
- अजीत डोभाल और उनके चीनी समकक्ष के बीच सीमा विवाद पर बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ने की संभावना जताई जा रही है
आज और कल भारत की कूटनीति के लिए बहुत अहम दिन हैं. भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल आज चीन में हैं तो विदेश मंत्री एस जयशंकर रूस में हैं. ये महज इत्तेफाक नहीं है कि जब अमेरिका अपने सबसे करीबी सहयोगी कनाडा के साथ टैरिफ वॉर में उलझ रहा है तब भारत अपने दोस्त से मजबूत संपर्क बनाए हुए है. वहीं जिस देश के साथ सीमा को लेकर तनाव है, उसके साथ डायलॉग के जरिए बात कर रहा है. इन सबके पीछे भारत के धैर्य के साथ ही खुद की बढ़ती ताकत पर विश्वास भी है, जो तेजी से बदलती कूटनीति में भी उतावलेपन की जगह शांत पर सधी हुई कूटनीति के रास्ते आगे बढ़ रहा है.

भारत के पड़ोस में ही देखें तो आज क्या स्थिति है. पाकिस्तान कभी ईरान से दोस्ती की कोशिश करता है तो कभी उसी ईरान के कट्टर दुश्मन सऊदी अरब से समझौता कर लेता है. आनन-फानन में तुर्की को भी जोड़ता है और कहता है कि तीनों देशों में से किसी पर हमला हुआ तो तीनों पर हमला माना जाएगा. मगर हमले के बाद भी बयानों के जरिए निंदा करता रहता है. इस बीच वो अपने सबसे करीबी मुल्क रहे संयुक्त अरब अमीरात से भी सऊदी अरब के लिए अपने संबंध बिगाड़ लेता है. एक और देश बांग्लादेश का हाल देखिए. भारत का करीबी मुल्क बांग्लादेश कभी पाकिस्तान की ओर झांकता है तो कभी चीन की ओर. बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने पद संभालने के बाद भारत का दौरा करने की जगह चीन का दौरा किया. भारत से संबंध बेहतर करने का वो इंतजार कर रहे हैं. मगर, सवाल है कि क्या ये सिर्फ भारत की जिम्मेवारी है या जरूरत है कि बांग्लादेश से संबंध अच्छे रखे.

यूरोप का हाल तो और भी अलग है. कभी अमेरिका को बनाने वाला यूरोप कब अमेरिका का पिछलग्गू बन गया उसे पता ही नहीं चला. यूक्रेन युद्ध के साथ शुरू हुई अनबन ईरान युद्ध तक पूरी दुनिया के सामने खुलकर सामने आ गई. अमेरिका इस युद्ध में एकतरफा यूक्रेन के पाले में नहीं रहना चाहता. जबकि यूरोप कोल्ड वॉर के दौरान की कूटनीति में ही जीता रहा कि एक तरफ रूस और दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप. अब वो अलग-थलग पड़ा हुआ है. यही नहीं दक्षिण कोरिया का ही देखिए. ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के जानी दुश्मन नॉर्थ कोरिया के किम जोंग उन की तारीफ कर दी है. वो किम के साथ फिर से मिलना चाह रहे हैं. ऐसे में दक्षिण कोरिया के दिल पर क्या बीत रही होगी, ये तो वही जाने. इजरायल से भी गाजा और ईरान के मसले पर अमेरिका की अनबन की खबरें आईं. मगर भारत इन सब हलचलों के बीच अपने आप में मस्त रहा. ऐसा लग रहा था कि भारत दुनिया की कूटनीति से गायब सा हो गया है.

मगर यही भारत की सबसे बड़ी ताकत बनती दिख रही है. भारत ने किसी पक्ष को चुनने के बजाए दोस्तों के साथ दोस्ती निभाई. रूस और इजरायल के साथ भारत खड़ा दिखा, मगर उनके फैसलों में शामिल नहीं हुआ. वहीं अमेरिका और ईरान के बीच भी भारत ने तटस्थ रुख अपनाए रखा. किसी एक पक्ष की तरफ झुकने और हेडलाइंस की होड़ में शामिल होने की बजाए संबंधों पर काम किया. ईरान से भी संपर्क बनाए रखा और अमेरिका से भी. स्थिति ये रही कि भारत के संबंध किसी से बिगड़े नहीं, लेकिन दोस्तों के साथ संबंध मधुर बने रहे. अब आज अजीत डोभाल के चीन दौरे के दिन ही रायटर्स ने खबर दी है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में 12-13 सितंबर को भारत आ सकते हैं. उनके साथ एक बड़ा डेलिगेशन भी आ सकता है. जाहिर है बड़ा डेलिगेशन सिर्फ ब्रिक्स के लिए तो नहीं आएगा. भारत-चीन इस दौरे को कुछ बड़ा करने की कोशिश करेंगे. वैसे भी जिनपिंग 7 साल बाद भारत दौरे पर आ रहे हैं. कल अजित डोभाल अपने चीनी समकक्ष के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर स्ट्रक्चर्ड बातचीत करेंगे. जाहिर है इसमें तत्काल कुछ बड़ा नहीं निकलेगा, लेकिन ये संभावना जताई जा रही है कि जिस तरह से माहौल बन रहा है वार्ता सकारात्मक दिशा में ही जाएगी.

उधर, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर रूस पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत हुआ. खुद राष्ट्रपति पुतिन ने उनसे मुलाकात की. रूसी राष्ट्रपति ने कहा, "मुझे यह देखकर खुशी है कि इस साल हमारे व्यापार में बढ़ोतरी हुई है. पिछले साल इसमें थोड़ी गिरावट आई थी, लेकिन इस साल यह बढ़ रहा है." पुतिन ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय विदेश मंत्री का मौजूदा मॉस्को दौरा उन रिश्तों के स्तर को दिखाता है जो रूस और भारत ने दशकों में बनाए हैं. साथ ही, उन्होंने कहा कि लगभग सभी क्षेत्रों में सहयोग चल रहा है, जिसमें दोनों सरकारों, संसदों और व्यवसायों के स्तर पर सहयोग शामिल है. रूस और भारत के संबंधों में इतनी गहराई है कि कई बार बड़ी चीजें होने के बाद ही पता चलता है कि इस बड़ी चीज पर भी दोनों देशों में सहमति बनी थी. ब्रिक्स में पुतिन के आने की भी पूरी संभावना है. ऐसे में महज इन दो दौरों ने दुनिया की कूटनीति में हलचल मचा रखी है और सबकी नजरें भारत, रूस और चीन के अगले कदमों पर हैं.
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