- अजीत डोभाल बीजिंग जाकर भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि वार्ता के 25वें दौर में भाग लेंगे
- यह वार्ता 2020 के बाद पहली बार पुनः सक्रिय हुई है और सीमा पर शांति बनाए रखने पर चर्चा होगी
- दोनों पक्ष अक्टूबर 2024 के डिसइंगेजमेंट समझौते की समीक्षा और सीमा प्रबंधन के व्यापक मुद्दों पर विचार करेंगे
अजीत डोभाल सोमवार को बीजिंग के लिए रवाना हो रहे हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) मंगलवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर 'विशेष प्रतिनिधियों' (SR) की वार्ता के 25वें दौर के लिए बैठक करेंगे. दोनों देशों के राजनयिक कई हफ़्तों से इस बैठक पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं.
महत्व समझिए
डोभाल और वांग 'विशेष प्रतिनिधियों' के तौर पर काम करते हैं. यह व्यवस्था 2003 में शुरू हुई थी, जिसका मकसद दोनों देशों के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा के विवाद को सुलझाना था. इसमें प्रगति कभी आसान नहीं रही. 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प और उसके बाद पूर्वी लद्दाख में बने तनावपूर्ण हालात के कारण यह बातचीत लगभग पांच साल तक रुकी रही. यह बातचीत दिसंबर 2024 में फिर से शुरू हुई, जब बीजिंग में 23वां दौर हुआ. इसके बाद 24वां दौर पिछले साल अगस्त में नई दिल्ली में हुआ था.
डोभाल के लिए यह यात्रा पहली बार हो रही है. 2024 में बातचीत फिर से शुरू होने के बाद SR-स्तर की वार्ता के लिए बीजिंग की यह उनकी पहली यात्रा है. यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब दोनों सरकारें चुपचाप संकेत दे रही हैं कि उनके संबंध बेहतर हो रहे हैं.
एजेंडा में क्या-क्या हो सकता है
उम्मीद है कि दोनों पक्ष अक्टूबर 2024 के डिसइंगेजमेंट (सेना पीछे हटाने के) समझौते का जायजा लेंगे. क्या पिछली बातचीत के बाद से 'लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल' (LAC) पर शांति बनी हुई है? बीजिंग का कहना है कि बॉर्डर पर हालात "आमतौर पर स्थिर" हैं, दोनों पक्षों के अधिकारियों का कहना है कि 24वें दौर की बातचीत के बाद से वे समझौते पर अमल करने और अगली बैठक की तैयारी में जुटे रहे हैं.
सिर्फ सैनिकों की तैनाती ही चर्चा का विषय नहीं होगी. तनाव कम करने, सीमा तय करने और बॉर्डर इलाकों के मैनेजमेंट के लिए बड़े सिस्टम पर भी चर्चा होने की उम्मीद है. भारत सीमा पार आतंकवाद को लेकर अपनी चिंताएं भी उठा सकता है. पिछले साल 24वें दौर की बातचीत में भी भारत ने यही मुद्दा उठाया था.
हाल की बैठकों का असर
डोभाल और वांग की पिछली मुलाकात जून में नई दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक के दौरान हुई थी. वहां दोनों पक्षों ने रिश्तों को "धीरे-धीरे सामान्य" करने की दिशा में हुई प्रगति पर बात की थी, लेकिन वह औपचारिक SR (विशेष प्रतिनिधि) बैठक नहीं थी. इसका मतलब है कि मंगलवार का सेशन असल में पिछले अगस्त के बाद से दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े मुद्दों पर पहली वास्तविक बातचीत होगी.
यह दौर क्यों इतना अहम है?
राजनयिक अभी से ही मंगलवार के आगे की सोच रहे हैं. सितंबर के आखिर में ब्रिक्स समिट के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे की संभावना पर सबकी नज़र है. अगर बीजिंग के साथ बातचीत अच्छी रही, तो इससे उस दौरे और भविष्य में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच और बातचीत का रास्ता साफ़ हो सकता है.
किन बातों पर नजर रहेगी?
क्या दिल्ली और बीजिंग इस बार कोई साझा बयान जारी करेंगे? या फिर वे एक ही बैठक के बारे में अलग-अलग बातें कहेंगे? क्या तनाव कम करने की समय-सीमा को लेकर कोई नई बात सामने आएगी? क्या और व्यापार मार्गों या सीमावर्ती बाज़ारों को फिर से खोलने का कोई संकेत मिलेगा? और क्या मोदी-शी की बैठक के लिए कोई रूपरेखा तैयार हो पाएगी?
जयशंकर ने खींची लक्ष्मण रेखा
बीजिंग में डोभाल और वांग के बीच बातचीत से पहले, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शनिवार को फिर कहा कि चीन के साथ अच्छे रिश्तों के लिए सीमावर्ती इलाकों में शांति और स्थिरता जरूरी है. उनके ये बयान हाल के हफ्तों में अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी इलाके में चीनी सैनिकों के आक्रामक रवैये की खबरों के बीच आए हैं. जयशंकर ने शनिवार को नई दिल्ली में 'इकोनॉमिक टाइम्स वर्ल्ड लीडर्स फोरम' में कहा, "मुझे लगता है कि हमने 2020 की गर्मियों और 2024 की शरद ऋतु के बीच काफ़ी मुश्किल दौर देखा, और यह मुख्य रूप से सीमावर्ती इलाकों की स्थिति का नतीजा था. आखिरकार, अच्छे रिश्तों के लिए सीमावर्ती इलाकों में शांति और स्थिरता जरूरी है, और सीमा की स्थिति ही काफी हद तक रिश्तों की स्थिति तय करेगी."
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