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न घर के, न घाट के... अमेरिका के मददगारों से ट्रंप ने मुंह फेरा! 'नरक' में जीने को मजबूर हजारों अफगानी

अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिकी सैनिकों की मदद करने वालों के सैकड़ों परिजन कुवैत के शेल्टर होम में डेढ़ साल से दिन गिन रहे हैं, क्योंकि जिस अमेरिका के लिए उन्होंने जान दांव पर लगाई, वो अपने यहां शरण देने के वादे से मुकर गया है.

न घर के, न घाट के... अमेरिका के मददगारों से ट्रंप ने मुंह फेरा! 'नरक' में जीने को मजबूर हजारों अफगानी

अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान जिन हजारों लोगों और उनके परिवारों ने अमेरिका के लिए तालिबान से दुश्मनी मोल ली, अपनों को खोया और मौत के साये में रहकर मुखबिरी की, आज वही लोग दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं. अमेरिका की 'वादाखिलाफी' से ये मंझधार में फंस गए हैं. कुवैत के एक शेल्टर होम में महिलाओं और बच्चों समेत करीब 1100 लोग करीब डेढ़ साल से दिन गिन रहे हैं, क्योंकि जिस अमेरिका के लिए इन्होंने जान दांव पर लगाई, वो अपने यहां बसाने के वादे से मुकर गया है. इन लोगों की बेबसी की कहानी गार्डियन ने विस्तार से छापी है. 

वादा करके पीछे हटा अमेरिका?

अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों करीब 20 साल रही थीं. इस दौरान तालिबान के खिलाफ मुखबिरी और उनकी भाषा समझने के लिए हजारों अफगानियों की मदद ली गई. बदले में इन लोगों और उनके परिवारों को अमेरिका में शरण देने का वादा किया गया. बहुत से परिवारों को अमेरिका में पनाह मिल भी गई, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शरणार्थियों को लेकर अमेरिकी सरकार की सख्ती ने ऐसे हजारों परिवारों की राह में कांटे बो दिए हैं. 

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कुवैती कैंप में कैद, GPS ट्रैकर से निगरानी

गार्डियन की रिपोर्ट बताती है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों द्वारा बचाकर निकाले गए करीब 1100 लोगों के परिवार कतर के अस-सयलियाह कैंप में रह रहे हैं. इनमें लगभग 700 महिलाएं और बच्चे हैं. अमेरिका ले जाने से पहले, ट्रांजिट कैंप के रूप में इन्हें यहां रखा गया था, लेकिन महीनों से ये यहीं अटके हैं. ये डर भी सता रहा है कि कब ईरान की कोई मिसाइल हमला न कर दे.

वक्त बीतने के साथ कुवैती कैंप में हालात बदतर हो रहे हैं. एक हैंगर में कंटेनरों के अंदर हजारों लोग रह रहे हैं. न अलग टॉयलेट, न रसोई, न बच्चों की पढ़ाई के इंतजाम. बाहर जाने की इजाजत नहीं है. कोई भाग न जाए, इसके लिए जीपीएस ट्रैकर पहना दिए गए हैं. कई लोग इस कैंप की तुलना 'नरक' और 'कैदखाने' से कर रहे हैं. 

ट्रंप के फरमान से सपने चकनाचूर

यहां रह रही एक महिला की कहानी रुला देने वाली है. गार्डियन के मुताबिक, उसके पिता और भाई को तालिबान ने मार दिया था. वो अमेरिकी सैनिकों के ट्रांसलेटर थे. तालिबान के आने पर उन्हें भागकर कतर आना पड़ा. कतर के कैंप में लाकर उन्हें अमेरिका भेजने की तैयारी होने लगी. मंजूरी भी मिल गई. जिस दिन वह अपने पति और 4 बच्चों के साथ अमेरिका के डेनवर रवाना होने वाली थीं, उससे एक हफ्ते पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने शरणार्थियों के आवेदनों पर रोक लगा दी. बस सबके अरमान चूर चूर हो गए.

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कांगो भेजना चाहता है अमेरिका

अमेरिकी अब इन मददगारों को कथित तौर पर कांगो भेजना चाहता है. अफ्रीकी देश कांगो में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है. वहां पहले से ही 6 लाख से अधिक रिफ्यूजी रह रहे हैं. कुवैत कैंप में रहने वाले कई परिवार इसके लिए तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि वह एक जंग से भागकर दूसरी जंग में नहीं फंसना चाहते. वह कहते हैं कि वो किसी और देश में भी नहीं जा सकते क्योंकि अमेरिका में उनका शरणार्थी स्टेटस पेंडिंग है. 

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Photo Credit: सांकेतिक AI Image

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वफादारी की कीमत महज कुछ डॉलर

अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिकी सेना के मददगार अफगानियों की सहायता करने वाले एनजीओ AfghanEvac के प्रेसिडेंट शॉन वैनडिवर कहते हैं कि इन लोगों ने अमेरिका के लिए जान दांव पर लगाई थी. इन्हें अमेरिका पहुंचाकर हक अदा किया जाना चाहिए. उन्होंने गार्डियन से दावा किया कि ट्रंप सरकार कुवैती कैंप में रह रहे अफगानियों को अमेरिका में रहने का दावा छोड़ने और वापस अफगानिस्तान लौटने के लिए वित्तीय सहायता की पेशकश कर रहा है. मुख्य आवेदकों को 4500 डॉलर और परिवार के सदस्यों के 1200 डॉलर ऑफर किए जा रहे हैं. लेकिन अफगानी परिवार तैयार नहीं हैं. 

गार्डियन ने एक सूत्र के हवाले से यह भी दावा किया कि ट्रंप प्रशासन इन अफगानियों से पीछा छुड़ाना चाहता है. क्योंकि उसे इनकी नहीं बल्कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में रह रहे इसी तरह के डेढ़ लाख अफगानियों की चिंता सता रही है. वजह चाहे जो हो, लेकिन इतना तय है कि अमेरिकी सरकार की नीतियों से इन मददगारों को अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा है. 

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