नेपाल सीमा से सटी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी पर भूस्खलन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है. वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की हालिया रिसर्च में सामने आया है कि घाटी का 9 प्रतिशत हिस्सा अत्यंत उच्च जोखिम वाले भूस्खलन क्षेत्र में आता है, जबकि करीब 58 प्रतिशत आबादी उच्च और अत्यंत उच्च जोखिम वाले इलाकों में रहने को मजबूर है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बढ़ती बारिश, भूकंपीय गतिविधियों, ढलानों की अस्थिरता और मानवजनित निर्माण कार्यों के कारण खतरा लगातार बढ़ रहा है. कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग से जुड़ी यह घाटी रणनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रहा भूस्खलन का खतरा
उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों के दौरान भूस्खलन की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूकंपीय गतिविधियों और तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों ने पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित किया है. इसका सबसे बड़ा असर सीमावर्ती और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है. इसी खतरे को समझने के लिए देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी का विस्तृत अध्ययन किया. शोधकर्ताओं मोहम्मद शावेज़, संदीप कुमार, विक्रम गुप्ता, परवीन कुमार और गौतम रावत की टीम ने 2001 से 2023 के बीच दर्ज भूस्खलनों का विश्लेषण कर क्षेत्र की संवेदनशीलता, जोखिम और सामाजिक प्रभाव का आकलन किया.
295 भूस्खलन स्थलों की हाई-रिजोल्यूशन मैपिंग
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने दारमा घाटी में 295 भूस्खलन स्थलों की हाई-रिजोल्यूशन मैपिंग की. मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग, भू-आकृतिक आंकड़ों, वर्षा और भूकंपीय गतिविधियों के डेटा को मिलाकर भूस्खलन जोखिम का विस्तृत मॉडल तैयार किया गया. दारमा घाटी का क्षेत्रफल करीब 1364 वर्ग किलोमीटर है और यह दारमा नदी के साथ लगभग 91 किलोमीटर तक फैली हुई है. घाटी में बसे गांवों की ऊंचाई लगभग 1150 मीटर से 3410 मीटर के बीच पाई गई, जबकि आसपास के कई क्षेत्र इससे कहीं अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं.

Pithoragarh Landslide Risk: वाडिया संस्थान की रिपोर्ट
किस क्षेत्र में कितना खतरा?
वाडिया की रिसर्च में मशीन लर्निंग बेस्ड लैंडस्लाइड हैजर्ड ,एंड रिस्क एसेसमेंट इन दारमा वैली NW Himalaya रिपोर्ट जियोलॉजिकल जर्नल में पब्लिश हुई है. रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार दारमा घाटी का 9 प्रतिशत क्षेत्र अत्यंत उच्च जोखिम (Very High Risk Zone) में है. 22 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम (Moderate Risk Zone) में आता है. 26 प्रतिशत क्षेत्र कम जोखिम (Low Risk Zone) में है. 43 प्रतिशत क्षेत्र बहुत कम जोखिम (Very Low Risk Zone) में शामिल है. हालांकि सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि घाटी की कुल आबादी का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा उच्च और अत्यंत उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निवास करता है.
धार गांव सबसे अधिक खतरे में
अध्ययन में पाया गया कि दारमा घाटी के कई गांव सीधे भूस्खलन की जद में हैं. इनमें धार गांव सबसे अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है. इसके अलावा जमकू, खेत, नागलिंग, सोबला, बालिंग, तवाघाट और बौन जैसे गांव भी उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इन गांवों में भविष्य में बड़े भूस्खलन की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दारमा घाटी में तवाघाट, जम्कू, खेत, सोबला, दार, बालिंग, चांलकाम, उर्थिंग, मंडप, नागलिंग, फिलम, दुग्तू, बौन, गो, मार्चा, तिदांग और सिपु समेत कई गांव बसे हैं.

Pithoragarh Landslide Risk: दरमा घाटी में खतरे की घंटी?
बारिश और भूकंप से बढ़ रहा खतरा
दारमा घाटी में हर साल औसतन 2000 से 2500 मिलीमीटर तक वर्षा होती है. कुल बारिश का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के मानसून सीजन में दर्ज किया जाता है. रिपोर्ट के अनुसार केवल वर्षा के आधार पर भूस्खलन का खतरा लगभग 13 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. वहीं भूकंप के कारण 9 प्रतिशत का अतिरिक्त जोखिम मौजूद है. यदि दोनों कारकों को एक साथ देखा जाए तो भूस्खलन का उच्च स्तरीय खतरा 32 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के चलते अत्यधिक बारिश की घटनाओं में वृद्धि भविष्य में स्थिति को और गंभीर बना सकती है.
कमजोर होती चट्टानें भी बड़ी वजह
शोध में यह भी सामने आया कि दक्षिणी दिशा की ढलानों पर मौजूद चट्टानें अपेक्षाकृत अधिक कमजोर हो चुकी हैं. इसकी प्रमुख वजह लगातार सूर्य का प्रभाव, बर्फ का जमना और पिघलना तथा तापमान में तेजी से होने वाले बदलाव हैं. इसके साथ ही 20 से 50 डिग्री के बीच वाले पहाड़ी ढलान सबसे अधिक सक्रिय भूस्खलन क्षेत्रों में पाए गए. ऐसे ढलानों पर चट्टानों और मिट्टी का संतुलन अपेक्षाकृत तेजी से बिगड़ता है.
सड़क निर्माण और विकास परियोजनाओं से बढ़ी संवेदनशीलता
रिपोर्ट में मानवजनित गतिविधियों को भी बड़ा कारण बताया गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार सड़क कटिंग, भवन निर्माण और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं ने कई ढलानों की प्राकृतिक स्थिरता को प्रभावित किया है. अध्ययन में पाया गया कि करीब 36.48 प्रतिशत भूस्खलन क्षेत्र सड़कों से 300 मीटर के दायरे में स्थित हैं. लगभग 53.84 प्रतिशत भूस्खलन क्षेत्र नदियों और जलधाराओं से 300 मीटर के भीतर पाए गए. यह आंकड़े दर्शाते हैं कि सड़क निर्माण और नदी कटाव दोनों ही भूस्खलन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं.
कैलाश मानसरोवर मार्ग के लिए भी महत्वपूर्ण चेतावनी
दारमा घाटी भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से जुड़ी हुई है और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. ऐसे में यहां किसी बड़े भूस्खलन का असर स्थानीय आबादी के साथ-साथ तीर्थयात्रियों और सीमा क्षेत्र की कनेक्टिविटी पर भी पड़ सकता है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते पर्यटन और तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों के मद्देनजर संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी और भू-वैज्ञानिक अध्ययन को प्राथमिकता देनी होगी.
वैज्ञानिकों ने दिए ये सुझाव
वैज्ञानिकों ने इस बात के सुझाव दिए हैं कि अधिक जोखिम वाले साथ गांव में रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज चैनल और इमरजेंसी विस्थापन की योजना बनाई जानी चाहिए. इसके अलावा सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में भी वैज्ञानिक पद्धति से काम होना चाहिए. नई-नई सड़क मार्ग और बेसिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हुए वैज्ञानिक पद्धति को अपनाया जाना चाहिए और कम से कम क्षेत्र को नुकसान करते हुए निर्माण होना चाहिए. इसके अलावा हिमालय क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और सुरक्षित शहरी नियोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
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