बद्रीनाथ में 19-20 सितंबर को देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव 2026 का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में किया गया था. कार्यक्रम की थीम थी,'हमारी विरासत, हमारा भविष्य'. इसमें लोक संगीत, नृत्य और लाइव म्यूजिक जैसी प्रस्तुतियां हुईं. महोत्सव के बाद कार्यक्रम के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए. इनमें बद्रीनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में तेज संगीत और डीजे बजाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
मानवजनित शोर से इंसानों और वन्यजीवों पर पड़ रहे प्रभावों को लेकर प्रकाशित शोधपत्र इस विषय को समझने के लिए जरूरी हैं.
बद्रीनाथ जाने वाले रास्ते पर यात्रा सीजन में बढ़ता है शोर
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एडवांस्ड रिसर्च में 2016 में प्रकाशित 'Analysis of Vehicular Noise Pollution at Different Locations in Srinagar Town of Garhwal Uttarakhand, India' शीर्षक वाले शोधपत्र में उत्तराखंड के श्रीनगर में वाहनजनित शोर का अध्ययन किया गया.
There's a REASON why evn Shankh is forbidden in Badrinath Dham. That place has its own sanctity. And nw? DJs are blasting there. Club style music has a time & place. A sacred Teerth is NOT it. This govt's obsession to make every Dham a picnic spot is ruining the soul of Devbhumi. pic.twitter.com/IwTVViWfIn
— Himalayan Hindu (@himalayanhindu) September 22, 2026
इस शोधपत्र के लेखक डॉ. मोहन सिंह पंवार और पल्लवी उप्रेती हैं. शोधपत्र में चारधाम यात्रा के संदर्भ में बताया गया है कि यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाले यात्रियों के लिए एनएच-58 प्रमुख मार्ग था. इसी मार्ग पर स्थित श्रीनगर में यात्रा सीजन और गैर-यात्रा सीजन के दौरान वाहनों की संख्या और शोर की तुलना की गई.
यात्रा सीजन में औसत शोर की तीव्रता 73.8 डेसिबल थी जबकि गैर-यात्रा सीजन में यह 68.3 डेसिबल थी.
शोधकर्ताओं ने इसे यात्रा के व्यस्त समय में वाहनों की बढ़ी आवाजाही से जोड़ा. शोधपत्र में बताया गया है कि यात्रा सीजन में भारी और चार पहिया वाहनों की आवाजाही भी बढ़ी.वाहनों की बढ़ी आवाजाही और शोर का सबसे अधिक प्रभाव मुख्य सड़क पर देखा गया.
शोधकर्ताओं ने श्रीनगर के पांच स्थानों पर शोर का अध्ययन किया. इनमें से चार स्थानों पर शोर निर्धारित मानकों से ऊपर पाया गया.
शोधकर्ताओं ने श्रीनगर में 100 लोगों का सर्वे भी किया.सर्वे में लोगों ने शोर के संपर्क से सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, परेशानी, अनिद्रा, मानसिक सतर्कता में कमी और काम करने की क्षमता में कमी जैसी समस्याओं की जानकारी दी. शोधपत्र में शोर के संपर्क की अवधि और स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंध भी देखा गया.
चार से पांच घंटे तक तेज शोर के संपर्क में रहने वाले लोगों में अनिद्रा, परेशानी और सिरदर्द की शिकायत अधिक पाई गई.
यह हिस्सा इंसानों से जुड़ा है. उत्तराखंड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के अनुसार राज्य में पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या साल दर साल बढ़ रही है. ऐसे में सवाल क्षेत्र में रह रहे वन्यजीवों का भी है.
जानवरों के लिए शोर बस आवाज नहीं है
2013 में क्लिंटन डी फ्रांसिस और जेस आर बारबर ने 'A Framework for Understanding Noise Impacts on Wildlife: An Urgent Conservation Priority' नाम से शोधपत्र प्रकाशित किया था. यह शोधपत्र Frontiers in Ecology and the Environment, Volume 11, Issue 6, pages 305-313 में प्रकाशित हुआ. इसमें मानव गतिविधियों से पैदा होने वाले शोर और वन्यजीवों पर उसके प्रभाव से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की गई है.शोधकर्ताओं के मुताबिक शोर वन्यजीवों को प्रभावित कर सकता है. अलग-अलग तरह के शोर और अलग-अलग परिस्थितियों में जानवरों की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है.
लगातार आने वाला शोर जानवरों की महत्वपूर्ण आवाजों को सुनने में बाधा डाल सकता है. अचानक और अप्रत्याशित शोर को जानवर खतरे के रूप में भी ले सकते हैं. इस शोधपत्र में बताया गया है कि शोर के संपर्क में आने पर जानवर अपने व्यवहार में बदलाव कर सकते हैं.ऐसे व्यवहारिक बदलाव बाहर से हमेशा दिखाई नहीं देते. कोई जानवर शोर वाली जगह पर बना रह सकता है और फिर भी उसके व्यवहार में बदलाव हो सकता है.
शोधकर्ताओं ने बताया कि व्यवहार में होने वाले ये बदलाव बाहर से शोर की आदत पड़ जाने जैसे दिखाई दे सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि शोर का कोई प्रभाव नहीं है.
शोर की आदत पड़ना, असर न होने का प्रमाण नहीं
लेखकों के अनुसार शोर के संपर्क में रहने वाले जानवरों में व्यवहार में बदलाव हो सकते हैं. बाहर से वे शोर के आदी दिखाई दे सकते हैं, लेकिन ये व्यवहारिक बदलाव उनकी जीवित रहने और प्रजनन से जुड़ी क्षमता पर असर डाल सकते हैं. इसलिए किसी जानवर का शोर वाली जगह पर बने रहना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि शोर का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है.
शोधकर्ताओं के अनुसार शोर के प्रभाव को समझने के लिए अलग-अलग स्तर के शोर के सामने जानवरों की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना जरूरी है. इसके लिए शोर की अलग-अलग विशेषताओं और जानवर के व्यवहार को साथ में देखना होगा. शोधपत्र में यह समझने पर जोर दिया गया है कि शोर की कौन सी विशेषताएं और किस तरह की व्यवहारिक परिस्थितियां जानवरों के लिए अधिक नुकसानदेह होती हैं.
शोधकर्ताओं के अनुसार शोर के विभिन्न स्तरों पर जानवरों की प्रतिक्रिया का अध्ययन करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस स्तर पर प्रभाव शुरू होता है और शोर बढ़ने के साथ प्रतिक्रिया किस तरह बदलती है.
शोर कम करने के उपाय
शोधपत्र में शोर कम करने के उपायों पर लिखा है कि शोर का स्तर कम करने से वन्यजीवों और इंसानों दोनों को लाभ मिल सकता है. शोधपत्र में प्राकृतिक गैस निकालने वाली गतिविधियों से होने वाले शोर को कम करने के लिए शोर रोकने वाली दीवारों का उदाहरण दिया गया है. लेखकों के अनुसार ऐसे उपायों से शोर के संपर्क में आने वाले क्षेत्र को कम किया जा सकता है. हालांकि शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि ऐसे उपायों के दूसरे प्रभाव हो सकते हैं. उदाहरण के लिए सड़कों के किनारे बनाई गई शोर रोकने वाली दीवारें वन्यजीवों की आवाजाही को रोक सकती हैं और उनके बीच आनुवंशिक संपर्क को प्रभावित कर सकती हैं.
खतरे में बद्रीनाथ के हैंगिंग ग्लेशियर
पर्यावरण विशेषज्ञ प्रोफेसर एसपी सती का कहना है कि बद्रीनाथ क्षेत्र में हैंगिंग ग्लेशियर का खतरा काफी ज्यादा है. ऐसे क्षेत्र में डीजे और तेज आवाज से बचना चाहिए. उनका कहना है कि अत्यधिक शोर से ग्लेशियरों में दरारें पड़ सकती हैं. इन दरारों से उसी समय कोई घटना हो जाए, यह जरूरी नहीं है, लेकिन बाद में इनके कारण हिमस्खलन जैसी घटना हो सकती है.
प्रोफेसर सती के अनुसार बद्रीनाथ क्षेत्र में रहने वाले पशु-पक्षी भी इतने अधिक शोर के आदी नहीं हैं. लगातार और तेज शोर का उन पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है. वो कहते हैं कि अत्यधिक ट्रैफिक और ब्लैक कार्बन के कारण हिमालय पहले ही दबाव में है. ऐसे में हिमालयी तीर्थ स्थलों पर कैरिंग कैपेसिटी यानी किसी क्षेत्र में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कितनी मानवीय गतिविधि और कितने लोगों का दबाव सहा जा सकता है, तय करना जरूरी है.
प्रोफेसर सती का कहना है कि ऐसा नहीं किया गया तो नेपाल, धराली और केदारनाथ जैसी आपदाओं से मिलने वाले सबक को नजरअंदाज करने का खतरा रहेगा. उनके मुताबिक आपदाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनके प्रभाव और आकार को कम किया जा सकता है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)