- इलाहाबाद HC ने आजमगढ़ के आरोपी सचिन यादव की जमानत याचिका को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर खारिज किया
- शंभूपुर हत्याकांड के नाबालिग बच्चों को गोद लेकर वाले मानवीय कदम की कोर्ट ने सराहना की
- निर्देश दिया कि सभी अधिकारियों को HC के आदेशों के पालन में दुर्व्यवहार न करने का सख्त सर्कुलर जारी किया जाए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को आजमगढ़ से जुड़े एक जमानत के मामले में सुनवाई करते हुए आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया. साथ ही पिछले दिनों शंभूपुर तिहरे हत्याकांड में मां-बाप और भाई को खोने वाली परी और 11 महीने की शानवी को एसएसपी डॉ. अनिल कुमार द्वारा गोद लेने वाले मानवीय रुख की तारीफ की. कोर्ट ने कहा कि जिस तरह एसएसपी ने एक ऐसे अपराधी की दो नाबालिग बेटियों को गोद लेकर उनका संरक्षण किया, जिसने अपनी पत्नी और एक बच्चे की हत्या कर दी थी और बाद में वह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. कोर्ट ने कहा कि एसएसपी का यह मानवीय कदम समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में व्यापक रूप से सराहा गया है. कोर्ट भी उनके इस संवेदनशील आचरण की सराहना करती है.
वहीं सरकारी अधिवक्ता से फोन पर दुर्व्यवहार करने वाले एसएसपी आजमगढ़ के पीआरओ के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए सोमवार शाम पांच बजे तक कोर्ट की कस्टडी में रखने का आदेश दिया. कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि वह सभी पुलिस अधिकारियों को एक सर्कुलर जारी करें. जिसमें बताया जाए कि जब भी हाईकोर्ट का कोई राज्य विधि अधिकारी कोर्ट के आदेश के पालन के बारे में सूचित करे तो किसी भी अधिकारी का कोई भी दुर्व्यवहार कोर्ट की अवमानना माना जाएगा. साथ ही कानून के मुताबिक उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. कोर्ट ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वह जरूरी अनुपालन के लिए इस आदेश की एक कॉपी डीजीपी को भेजें. यह आदेश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने आवेदक सचिन यादव की जमानत याचिका को खारिज करते हुए दिया.
क्या है पूरा मामला
मामला आजमगढ़ के महाराजगंज थाने से जुड़ा हुआ है, जहां आवेदक सचिन यादव ने अपने खिलाफ बीएनएस की धारा 64(1), और आईटी एक्ट की धारा 66E, 67A में ट्रायल के दौरान कोर्ट से जमानत देने की गुहार लगाते हुए जमानत याचिका दाखिल की थी.पिछली सुनवाई में मामले के विवेचक विनय कुमार मिश्रा की कोर्ट में पेशी सुनिश्चित करने के संबंध में गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी हुआ था. जिसके अनुपालन के संदर्भ में हाईकोर्ट ने 29 सितंबर 2026 के आदेश के तहत एसएसपी आजमगढ़ को तलब किया था.
कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में आजमगढ़ एसएसपी डॉ. अनिल कुमार सोमवार को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित हुए और उन्होंने अपना विस्तृत अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत किया. हलफनामे में एसएसपी ने बिंदुवार स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) अनुराग पांडे की चिट्ठी 7 सितंबर 2026 को मिलने के तुरंत बाद उन्होंने 8 सितंबर 2026 को ही इसे अनुपालन के लिए रिट सेल को भेज दिया था. यह पत्र उसी दिन शाम थाना महाराजगंज में मिला और जीडी में दर्ज हुआ.
इस पुलिसवालों को कारण बताओ नोटिस
हालांकि जांच में यह तथ्य उजागर हुआ कि थाने के एसआई सुभाष सिंह ने वह पत्र अपने पास रख लिया और अनुपालन करने के बजाय देरी की. जब कोर्ट के 16 सितंबर 2026 के आदेश की सूचना मिली तब उन्होंने 18 सितंबर 2026 को थानाध्यक्ष महाराजगंज और एएसपी, पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम, वाराणसी को विवेचक विनय कुमार मिश्रा की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिए पत्र भेजा. एसएसपी ने प्राथमिक जांच के आधार पर कोर्ट को अवगत कराया कि थानाध्यक्ष महाराजगंज और उप-निरीक्षक सुभाष सिंह दोनों ही कोर्ट के आदेश का समय पर अनुपालन न करने में लापरवाह पाए गए है, जिसके चलते उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है. इस मामले में उनके खिलाफ अग्रिम विभागीय कार्रवाई की जा रही है.
एसएसपी ने गैर-जमानती वारंट का व्यक्तिगत रूप से पूर्ण अनुपालन न करा पाने को लेकर कोर्ट के सामने अपनी भूल स्वीकारते हुए माफी भी मांगी. उन्होंने बताया कि उनको लगा था कि विवेचक की उपस्थिति सुनिश्चित कराना ही अनुपालन के लिए पर्याप्त होगा. इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जब भी किसी पुलिस अधिकारी को हाईकोर्ट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट प्राप्त होता है तो संबंधित अधिकारी का यह दायित्व है कि वह व्यक्तिगत रूप से उस व्यक्ति की गिरफ्तारी सुनिश्चित कर उसे हाईकोर्ट के सामने पेश करे. क्योंकि जिला न्यायालय हाईकोर्ट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट में जमानत दे सकता है. इसके बावजूद कोर्ट ने एसएसपी आजमगढ़ के बेदाग सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए इस प्रकरण को भविष्य में अधिक सतर्क रहने की हिदायत के साथ खत्म कर दिया.
SSP के PRO के दुर्व्यवहार पर सख्ती
वहीं दूसरी ओर जब मामला एसएसपी के पीआरओ राजेश कुमार सिंह के दुर्व्यवहार का आया तो कोर्ट का रुख बेहद सख्त दिखा. हलफनामे के मुताबिक, जब सरकारी अधिवक्ता अनुराग पांडे हाईकोर्ट के आदेश की जानकारी देने के लिए मोबाइल फोन पर संपर्क कर रहे थे तब पीआरओ राजेश कुमार सिंह ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया. एसएसपी ने जैसे ही इस घटना की जानकारी उनके संज्ञान में आई उन्होंने तुरंत संज्ञान लेते हुए पीआरओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया और तत्काल प्रभाव से उन्हें पीआरओ के पद से हटा दिया. हाईकोर्ट ने एसएसपी द्वारा पीआरओ के खिलाफ की गई इस त्वरित कार्रवाई की भी सराहना की.
आरोपी सचिन यादव के अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता से शादी तय होने के दौरान की कुछ बातों के आधार पर झूठे आरोप लगाए गए हैं. कथित फर्जी फेसबुक आईडी आरोपी की नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी 1 मार्च 2025 से जेल में है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. वहीं सरकारी अधिवक्ता ने पेनड्राइव और साइबर सेल की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए जमानत का पुरजोर विरोध किया. साइबर सेल की जांच में यह सिद्ध हुआ कि आवेदक ने ही 8 सितंबर 2024 को राकेश यादव के नाम से फर्जी फेसबुक आईडी बनाई थी. उस पर पीड़िता की अश्लील तस्वीरें और वीडियो अपलोड किए थे. अपराध की गंभीरता और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने आवेदक सचिन यादव की जमानत अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया. साथ ही आदेश के अनुपालन के लिए रजिस्ट्रार अनुपालन को इसकी कॉपी डीजीपी को भेजने का निर्देश दिया.
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