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यूपी में यादवों से भी ज्यादा कुर्मी वोटरों की क्यों हो रही चर्चा? BJP से सपा तक सबके फोकस में

यूपी में यादव बिरादरी का बड़ा हिस्सा सपा के साथ ही रहा है, लेकिन कुर्मी पूरी तरह किसी के साथ नहीं रहे. इसलिए सभी दलों को लगता है कि उन्हें साथ मिल जाएगा, ओबीसी वर्ग में दूसरी सबसे बड़ी जाति मिल जाएगी.

यूपी में यादवों से भी ज्यादा कुर्मी वोटरों की क्यों हो रही चर्चा? BJP से सपा तक सबके फोकस में
यूपी चुनाव को लेकर राज्य में सियासी रणनीति बनने शुरू हो चुके हैं.
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  • यूपी की राजनीति में कुर्मी जाति यादवों के बाद दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है.
  • भाजपा ने कुर्मी वोटरों को साधने के लिए पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाया.
  • कुर्मी समाज पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड व तराई क्षेत्रों में कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक प्रभाव रखती है.
लखनऊ:

उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा का चुनाव होना है. लोकतंत्र के इस महापर्व को लेकर सभी राजनीतिक दलें अपनी-अपनी तैयारियों में जुट चुकी हैं. सत्तारूढ़ भाजपा हो या विपक्ष सपा, बसपा हो या कांग्रेस... सभी पार्टियां अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश में जुट चुकी हैं. जातिगत आंकड़े मिलाए जा रहे हैं, वोट बैंक के हिसाब से जातियों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. ताकि उनके बीच दलों का जनाधार मजबूत हो. लेकिन इस कोशिश के बीच यूपी की राजनीति से एक रोचक चीज यह देखने को मिल रही है कि यादवों  से ज्यादा कुर्मी वोटरों की चर्चा तेज हो गई है. भाजपा से लेकर सपा तक ने कुर्मी वोटरों पर फोकस बढ़ा दिया है. इसका कारण क्या है? आइए समझते हैं...

यूपी में कुर्मी जाति क्यों महत्वपूर्ण?

उत्तर प्रदेश की सियासत में कुर्मी, यादवों के बाद OBC की दूसरी सबसे बड़ी जाति है. यही कुर्मी समाज भाजपा की नई रणनीति का केंद्र बनी है. जब केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाया था तो उसे जानकार 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा संदेश मान रहे थे.

इससे पहले भी भाजपा का कुर्मी कार्ड वर्ष 2022 में सफल हुआ था, उस समय स्वतंत्र देव सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे और भाजपा की पांच वर्ष सरकार रहने के बावजूद 403 में से 255 सीटें मिली थीं.

प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज की आबादी भले ही आठ प्रतिशत हो, लेकिन 70 से 80 विधान सभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव माना जाता है. खासकर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई क्षेत्रों में कुर्मी मतदाता कई सीटों पर जीत-हार का रुख तय करते हैं.

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यूपी की राजनीति में कुर्मियों का इतना महत्व क्यों?

2001 में यूपी सरकार की बनाई हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, कुर्मी (और पटेल) की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है. यह रिपोर्ट ग्रामीण परिवार रजिस्टरों पर आधारित थी. इसमें OBC की कुल आबादी 50% से अधिक बताई गई थी.

2011 जनगणना में यूपी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ थी. 2025 की अनुमानित आबादी करीब 25 करोड़ है. इस हिसाब से प्रदेश में कुर्मी की आबादी करीब 1.75 से 2 करोड़ के बीच मानी जाती है.

किस दल में कितने कुर्मी विधायक और सांसद

अगर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य की बात करें, तो प्रदेश के 403 विधायकों में कुर्मी/पटेल की संख्या 40 है. इसमें भाजपा से 27, सपा से 12 और कांग्रेस से 1 विधायक हैं. 100 एमएलसी में 5 कुर्मी समाज से हैं. यूपी की 80 लोकसभा सीटों में भी 11 सांसद कुर्मी समाज से हैं. इसमें सपा से 7, भाजपा के 3 और अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल सांसद हैं.

विधायकों में ब्राह्मण के बाद सबसे अधिक कुर्मी विधायक हैं. जबकि सांसदों में ब्राह्मणों के बराबर इनकी संख्या है. उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल, अवध, मध्य यूपी और बुंदेलखंड में 128 सीटों पर कुर्मी वोटर प्रभावी भूमिका रखते हैं. जबकि, 48-50 सीटों पर वे निर्णायक असर रखते हैं. इसी तरह लोकसभा की 27 सीटों पर उनका प्रभाव है. लेकिन, 11 सीटों पर जीत-हार तय करते हैं. 

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90 के दशक से यूपी की सियासत में बढ़ा कुर्मी नेताओं का प्रभुत्व

यूपी की राजनीति में कुर्मी 'किंग मेकर' की भूमिका निभाते हैं. लेकिन यादवों (सपा) या जाटवों (BSP) की तरह किसी एक पार्टी से बंधे नहीं हैं. 90 के दशक में कांशीराम (राम लखन सिंह पटेल, लालजी वर्मा) और मुलायम सिंह यादव (बेनीप्रसाद वर्मा, नरेश उत्तम पटेल) ने कुर्मी नेताओं को आगे बढ़ाकर इस वोटबैंक को साधा.

  • भाजपा ने विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह और महज 26 की उम्र में पंकज चौधरी को सांसद बनाकर कोशिश की, पर 2014 से पहले यह वोटबैंक ज्यादा सपा-बसपा के पास रहा.
  • 2014 में अमित शाह के नेतृत्व में 'अपना दल' से गठबंधन और स्वतंत्र देव सिंह व पंकज चौधरी जैसे नेताओं को आगे बढ़ाने से भाजपा को बड़ा राजनीतिक फायदा मिला.
  • 2022 में भाजपा के सबसे अधिक 27 कुर्मी विधायक चुने गए; अब 2024 के झटके के बाद 2027 चुनाव से पहले कुर्मी समाज को फिर साधने के लिए पंकज चौधरी को कमान सौंपी गई है.
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कुर्मी वोटरों को साधने के लिए अखिलेश भी लगा रहे जोर

कुर्मी वोटरों को साधने के लिए अखिलेश यादव भी जोर लगा रहे हैं. वो गैर-यादव ओबीसी राजनीति के तहत एक बेहद सोची-समझी और आक्रामक रणनीति पर काम कर रहे हैं. अखिलेश यादव ने अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे के तहत पारंपरिक 'यादव-मुस्लिम' (Y-M) समीकरण से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ों, विशेषकर कुर्मी (पटेल) समाज को तरजीह दी है. 

बीते कुछ सालों में समाजवादी पार्टी में चुनाव और पार्टी संगठन दोनों में ही कुर्मियों की भागीदारी को दोगुना किया गया है. अखिलेश यादव ने हालिया चुनावों में पारंपरिक रूप से बीजेपी की तरफ झुकाव रखने वाले कुर्मी समाज को बड़े पैमाने पर टिकट दिए हैं. जानकारों का मानना है कि अखिलेश आगामी चुनाव में भी इसी पैटर्न पर चलते नजर आ आएंगे. 

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