बीजेपी के दलित कार्ड के जवाब में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ब्राह्मणों को साधने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी नजर उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण वोटों पर है. राज्य की आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी नौ से 11 फीसदी के बीच मानी जाती है. इसे देखते हुए अखिलेश अब कह रहे हैं कि उनके PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन में 'P' का मतलब 'पंडित' भी है.
समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर अखिलेश ने लखनऊ में एक सम्मेलन किया. इसमें समाजवादी पार्टी के ज्यादातर ब्राह्मण नेताओं को बुलाया गया था. बैठक में अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का उत्पीड़न हो रहा है और उनकी पार्टी हर जाति का सम्मान करती है.
बड़ा प्रभाव रखने वाली छोटी आबादी
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी बहुत ज्यादा नहीं है. प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से कोई भी ऐसी सीट नहीं है, जहां ब्राह्मणों की आबादी 50 फीसदी हो. प्रदेश में केवल सात सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मणों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है. फिर भी लखनऊ का कोई चुनावी रणनीतिकार ब्राह्मणों को साधे बिना चुनाव की योजना नहीं बना सकता है. इसकी वजह सिर्फ उनकी संख्या नहीं, बल्कि पूरे राज्य में उनका फैला हुआ प्रभाव, सामाजिक स्थिति और अब तेजी से बढ़ती राजनीतिक एकजुटता है.
VoteVibe के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की 212 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मणों की आबादी 10 फीसदी से कम है. 149 सीटों पर यह 10 से 20 फीसदी के बीच है. केवल 42 सीटों पर ब्राह्मणों की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है.
पहली नजर में उत्तर प्रदेश में यह संख्या ब्राह्मणों को कमजोर राजनीतिक ताकत दिखाती है, जहां सीट पर उम्मीदवार का निर्धारण जाति के आधार पर होता है. लेकिन अगर थोड़ा करीब से देखें तो 403 में से 97 सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मणों की आबादी 15 फीसदी से ज्यादा है. भारत की जाति आधारित चुनावी राजनीति में किसी करीबी मुकाबले का नतीजा बदलने के लिए यह संख्या काफी महत्वपूर्ण है.
इस तरह देखें तो यह समुदाय राज्य की करीब एक-चौथाई विधानसभा सीटों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.
बीजेपी के मजबूत किले की ताकत हैं ब्राह्मण
2012 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण प्रभाव वाली इन 97 सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा) का दबदबा था. सपा ने इनमें से 55 सीटें जीती थीं, यानी आधे से ज्यादा. वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 19, बीजेपी को 12 और कांग्रेस को सात सीटें मिली थीं. लेकिन पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई. साल 2017 के चुनाव में बीजेपी ने इन 97 में से 87 सीटें जीत लीं.इस तरह उसकी सीटों में करीब सात गुना की बढ़ोतरी हुई.वहीं सपा केवल और बसपा को पांच सीटें मिलीं. इन सीटों पर कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया. साल 2022 के चुनाव में थोड़ा बदलाव जरूर हुआ. बीजेपी की सीटें घटकर 72 रह गईं, जबकि सपा ने वापसी करते हुए 21 सीटें जीत लीं. लेकिन बड़ी तस्वीर में कोई खास बदलाव नहीं आया.

साल 2017 के बाद से ब्राह्मणों के प्रभाव वाली सीटों पर बीजेपी सबसे मजबूत पार्टी बनी हुई है. दूसरी कोई भी पार्टी अब तक उसके मुकाबले मजबूत चुनौती नहीं दे पाई है.
कितना पुराना है बीजेपी और ब्राह्मणों का साथ
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) की ओर से चुनाव बाद किए गए सर्वे से मतदाताओं की पसंद में आए बदलाव की तस्वीर सामने आती हैं. 1996 में जब राम मंदिर आंदोलन के दौर में जब हिंदुत्व मजबूत हो रहा था, तब 71 फीसदी ब्राह्मण मतदाताओं ने बीजेपी का समर्थन किया था.
मंडल आंदोलन और उसके बाद के सालों में बीजेपी के लिए ब्राह्मणों का समर्थन लगातार घटता गया. साल 2002 के चुनाव में यह 49 फीसदी, 2007 में 39 फीसदी और 2012 में घटकर 38 फीसदी रह गया. इस दौर में मायावती की बसपा ने अपनी 'सोशल इंजीनियरिंग' के दम पर तथाकथित ऊंची जातियों के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की. इसका असर यह हुआ कि ब्राह्मण वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी से दूर होकर बसपा के साथ चला गया.

बीजेपी के पक्ष में एकजुट होते ब्राह्मण
समय के साथ ब्राह्मण वोटों का झुकाव बीजेपी की ओर काफी बढ़ा है. 2017 तक बीजेपी के पक्ष में ब्राह्मणों का समर्थन बढ़कर 83 फीसदी हो गया था. साल 2022 में यह और बढ़कर 89 फीसदी तक पहुंच गया. इसे हाल के सालों में उत्तर प्रदेश में किसी एक जाति के वोटों का किसी एक पार्टी के पक्ष में सबसे मजबूत ध्रुवीकरण माना जा सकता है.
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग है. जिन 97 सीटों पर उनका प्रभाव महत्वपूर्ण है, उनमें 42 सीटें मध्य उत्तर प्रदेश और 41 सीटें पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं. यानी इन दोनों क्षेत्रों में ऐसी 85 फीसदी सीटें हैं. इसके मुकाबले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिर्फ 10 और बुंदेलखंड में चार ऐसी सीटें हैं.
इसलिए ब्राह्मणों को साधने की कोई भी रणनीति मुख्य रूप से मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश पर केंद्रित होगी. इसमें लखनऊ, अयोध्या, प्रयागराज, वाराणसी और इनके आसपास के जिले आते हैं.
उत्तर प्रदेश की विधानसभा में ब्राह्मण विधायकों की संख्या
दिलचस्प बात यह है कि ब्राह्मण वोटों के अलग-अलग पार्टियों की ओर जाने के बावजूद विधानसभा में ब्राह्मण विधायकों की संख्या में बहुत बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं आया.(देखें टेबल)

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Photo Credit: Samajwadi Party X
इससे पता चलता है कि ब्राह्मण वोट भले ही अलग-अलग चुनावों में अलग पार्टियों की ओर गए हों, लेकिन लगभग सभी पार्टियां ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देती रही हैं. विधानसभा में ब्राह्मण विधायकों की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी है, जो उनकी वास्तविक आबादी के अनुपात से ज्यादा है. इससे भी उनके राजनीतिक प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है.
ब्राह्मणों को क्यों साध रही है सपा?
आंकड़ों से साफ है कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों पर बीजेपी की पकड़ सिर्फ एक चुनाव तक सीमित नहीं है. लगातार दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने ब्राह्मण वोटों पर मजबूत पकड़ बनाए रखी है.समाजवादी पार्टी ने 2022 में ब्राह्मण प्रभाव वाली कुछ सीटों पर अपनी स्थिति बेहतर की थी. वहीं कांग्रेस 2012 के बाद से इन सीटों पर लगभग पूरी तरह बाहर हो गई है.ऐसे में अगर विपक्ष मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के वोटों का एक हिस्सा भी बीजेपी से अपनी ओर खींच पाता है, तो इसका असर उनकी आबादी के वास्तविक फीसद से कहीं ज्यादा हो सकता है.
समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों और राजपूतों के बीच कथित तनाव, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में लगाए जा रहे 'ठाकुरवाद' के आरोप,यूजीसी के नियमों और NEET पेपर लीक जैसी घटनाओं से पैदा हुई नाराजगी को ब्राह्मणों तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. हालांकि, ब्राह्मण समुदाय सत्ता में हिस्सेदारी चाहता है, लेकिन समाजवादी पार्टी के पास मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश यादव के अलावा कोई दूसरा बड़ा चेहरा नहीं है. वहीं बीजेपी सरकार में ब्राह्मण समुदाय को उपमुख्यमंत्री का पद मिला हुआ है. इसलिए बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी के साथ जाने का फैसला ब्राह्मणों के लिए आसान नहीं होगा.
टिकटों के मामले में भी 2022 में समाजवादी पार्टी ने 39 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था. बीजेपी ने 68 और बीएसपी ने 70 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया. ऐसे में ब्राह्मण उम्मीदवार के लिए बीजेपी के टिकट पर जीतने की संभावना ज्यादा मानी जाती है.
उत्तर प्रदेश में कई विधानसभा सीटों पर चुनाव परिणाम कुछ हजार या उससे भी कम वोटों के अंतर से तय होते हैं.ऐसे में 97 सीटों पर प्रभाव रखने वाला और 89 फीसदी तक एक पार्टी के साथ एकजुट हो चुका ब्राह्मण वोट महज एक छोटा चुनावी मुद्दा नहीं है.यह चुनावी रणनीति की एक बड़ी ताकत है.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक राजनीतिक टिप्पणीकार और चुनाव विश्लेषक हैं. वो इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में भी काम कर चुके हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)