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UP में 150 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी में कितना दम? 330 सीटों पर 5 हजार वोट भी नहीं मिले थे, आंकड़ों से समझिए जमीन

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर चर्चा तेज है. 2022 विधानसभा चुनाव में सपा को 111 सीटें और 32.76% वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी. ऐसे में सवाल यही है कि गठबंधन में असली 'बड़ा भाई' कौन है?

UP में 150 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी में कितना दम? 330 सीटों पर 5 हजार वोट भी नहीं मिले थे, आंकड़ों से समझिए जमीन
यूपी चुनाव से पहले सीट शेयरिंग पर टकराव, सपा-कांग्रेस में बढ़ी खींचतान
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  • यूपी में कांग्रेस की असली जमीन क्या है? चुनावी आंकड़ों से समझिए पूरा गणित
  • इंडिया गठबंधन में सीटों को लेकर खींचतान, किसके पास कितना दम
  • अखिलेश-राहुल गठबंधन में बड़ा भाई कौन? आंकड़े दे रहे जवाब
लखनऊ:

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (UP Election 2027) में सीधी लड़ाई बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए (NDA) और सपा-कांग्रेस के गठबंधन वाले इंडिया अलायन्स (INDIA Alliance) के बीच दिखाई दे रही है. इंडिया अलायन्स में सीटों के लिहाज़ से सपा कांग्रेस से कहीं बड़ी पार्टी है लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस सपा से बराबरी का हक़ मांगने में पीछे नहीं है. कांग्रेस के नेता कभी आधी सीटों की बात करते हैं तो कभी थोड़ा झुकते हैं तो 170 या 150 से कम पर बात नहीं करते. सपा और कांग्रेस के बीच ‘बड़ा भाई' बनने की बड़ी लड़ाई लंबे समय से नेताओं के बयानों में देखा जा रहा है. आंकड़ों से समझते हैं कि दोनों में बड़ा भाई आख़िर है कौन?

पहले एक नजर 2022 के चुनावी आंकड़ों पर

आंकड़ों की बात करें तो साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस अलग अलग चुनाव लड़े थे. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने आरएलडी और सुभासपा से गठबंधन के बावजूद 403 में से अकेले 111 सीटों पर जीत हासिल की थी वहीं कांग्रेस को 403 में सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी.

वोट शेयर की बात करें तो सपा को जहां 32.76 प्रतिशत वोट मिले तो वहीं कांग्रेस को मात्र 2.39 फ़ीसदी वोट ही हासिल हुए.

पिछले चुनाव में कुल 15 करोड़ 19 लाख 44 हज़ार 079 वोटर्स में से 60.2% यानी 9,15,25,592 मतदाताओं ने मतदान किया. इसमें सपा को 2 करोड़ 95 लाख 43 हज़ार 934 वोट मिले थे वहीं कांग्रेस को कुल 21 लाख 51 हजार 234 वोट प्राप्त हुए.

यूपी चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीटों की खींचतान

यूपी चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीटों की खींचतान
Photo Credit: NDTV

सीटों का हिसाब-किताब ऐसा है

अब सीटों के गणित की बात करें तो कांग्रेस ने पिछला चुनाव अकेले लड़ा था. कुल 403 सीटों में से कांग्रेस ने दो सीटें जीतीं थीं. इन दो को छोड़ दें तो कांग्रेस को सिर्फ 19 सीटों पर 20 हज़ार से अधिक वोट्स मिले. वहीं 21 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस को 10 हज़ार से 20 हज़ार के बीच वोट मिले. इनके अलावा 31 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस पार्टी को 5 हज़ार से 10 हज़ार के बीच में वोट्स मिले. यानी 19+21+31 को जोड़ लें तो ये नम्बर 71 बैठता है जहां कांग्रेस को पांच हज़ार से ऊपर वोट मिले. 

यूपी की 403 सीटों के से दो पर कांग्रेस जीती. बाक़ी बची 401 सीटों में 71 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस को पांच हज़ार से ज़्यादा वोट मिले. अब अगर 401 में 71 घटा दें तो ये आंकड़ा 330 हो जाता है. यानी 330 ऐसी सीटें हैं, जहां अपने दम पर कांग्रेस को पांच हज़ार से कम वोट मिले. कुछ सीटें ऐसी भी थीं जहां कांग्रेस प्रत्याशी की ज़मानत ज़ब्त हो गई.

लोकसभा की बात करें तो 2014 में कांग्रेस को सिर्फ़ दो सीटें मिलीं. एक सोनिया गांधी और दूसरे राहुल गांधी. 2019 में राहुल गांधी भी हारे और कांग्रेस सिर्फ़ एक पर सिमट गई. 2024 में सपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ने पर कांग्रेस के कुल छह सांसद चुनाव जीतने में सफल हुए.

कांग्रेस इन सीटों की करेगी मांग

जिन 73 सीटों (दो विधायकों को जोड़कर) पर कांग्रेस को पांच हज़ार से अधिक वोट मिले, उनमें 16 सीटों पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली. ऐसे में जब सीट शेयरिंग पर बात होगी तो कांग्रेस उन सीटों की मांग सबसे पहले करेगी जहां उसे संतोषजनक वोट मिले. अगर पांच हज़ार से ऊपर वाली सीटों को संतोषजनक कहें तो ऐसी 71 सीटों में से सपा ने जिन 16 सीटों पर चुनाव जीता, वहां वो अपने सिटिंग विधायक वाली सीट तो गठबंधन में देगी नहीं. यानी अगर पांच हज़ार वोट को सीट की दावेदारी का आधार माना जाए तो भी इस हिसाब से 73 में से 16 सपा को सिटिंग विधायकों वाली सीटों को घटाने के बार कुल 57 सीटें ही बचती हैं. यानी कांग्रेस एक विधानसभा सीट पर पांच हज़ार वोट का आंकड़ा रख कर दावेदारी करे तो भी उसके पास 57 पर ही दावेदारी का दम दिखाई देता है. 

कांग्रेस का कहना है कि अखिलेश यादव को सीएम बनना है तो उन्हें कुछ ‘एडजस्ट' करना होगा. एडजस्टमेंट से मतलब अधिक सीटें देने से है.

ऐसे में अगर एक विधानसभा सीट पर औसत 400 बूथ मानें जायें और कांग्रेस के पांच हज़ार वोटों से भाग दिया जाये तो औसत 12.5 वोट एक बूथ पर कांग्रेस को मिल रहे हैं. दस हज़ार वोटों वाली सीट पर ये आंकड़ा औसत हर बूथ पर 25 वोट का हो जाएगा. वहीं यही औसत अगर सपा की सीटों पर लगाए जायें तो सपा को अगर औसत 50 हज़ार वोट एक विधानसभा मिले तो एक बूथ पर उसे कम से कम 125 वोट मिल रहे हैं. यानी कांग्रेस का दस गुना ज़्यादा वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं. 

यहां कांग्रेस को मिले थे 20 हजार से ज्यादा वोट

कांग्रेस को 2022 के विधानसभा चुनाव में कुल 19 सीटों पर 20 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले थे. सीटों को बात करें तो इनमें मथुरा की सदर, आगरा की खेरागढ़, हरदोई की बिलग्राम, रायबरेली की बछरावाँ, अमेठी की जगदीशपुर, कानपुर की किदवई नगर, गोंडा की गौरा, कुशीनगर की तमकुहीराज, देवरिया की रुद्रपूर, वाराणसी की पिंडरा, रायबरेली की सरैनी, अमेठी की गौरीगंज, कानपुर की गोविंदनगर, प्रयागराज की उत्तरी, प्रयागराज की कोराओं, बाराबंकी की जैदपुर, अमेठी की तिलोई, सिद्धार्थनगर की शोहरतगढ़ और वाराणसी की कैंट वो सीटें हैं जहां कांग्रेस को 20 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले.

ज़िलों की बात करें तो जहां कांग्रेस को पांच हज़ार से ज़्यादा वोट मिले तो इनमें मथुरा, आगरा, हरदोई, रायबरेली, अमेठी, कानपुर, गोंडा, कुशीनगर, देवरिया, वाराणसी, प्रयागराज, बाराबंकी, सिद्धार्थनगर, रामपुर, ग़ाज़ियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, शाहजहांपुर, लखनऊ, जालौन, हमीरपुर, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, जौनपुर और सोनभद्र की सीटें शामिल हैं. यानी कई ऐसे भी ज़िले हैं जिन ज़िलों में किसी भी विधानसभा सीट पर कांग्रेस को पांच हज़ार वोट भी नहीं मिले हैं. 

इसी तरह 5 हज़ार से 10 हज़ार वोटों वाली कुल 31 सीटें हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस की ज़मीनी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. ये सही है कि देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी का तमग़ा कांग्रेस को मिल सकता है लेकिन जब बात यूपी की राजनीति की होगी तो वर्तमान में सपा ‘बड़े भाई' की भूमिका में नज़र आता है.

कांग्रेस और सपा के अपने-अपने तर्क

इन आंकड़ों को लेकर कांग्रेस के यूपी के कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद इमरान मसूद सपा को समझाईश देते हुए कहते हैं कि दिल्ली के कांग्रेस की 15 साल की सरकार को नई नवेली आम आदमी पार्टी ने गिरा दिया था. ऐसे में किसी दल को कांग्रेस का इतिहास देखने की बजाय वर्तमान देखना चाहिए. वो दावा करते हैं कि कांग्रेस ने ज़मीन पर मेहनत करके अपना मुक़ाम तैयार कर लिया है. 

समाजवादी पार्टी के सूत्र बताते हैं कि सपा अभी इंतज़ार में हैं. कांग्रेस नेताओं की बयानबाज़ी को नज़रअंदाज़ कर उन्हें इंतज़ार है कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे कब औपचारिक बातचीत करते हैं.

सपा का कहना है कि किसी नेता की बयानबाज़ी सिर्फ़ गठबंधन को नुक़सान पहुंचाने का काम कर रही है. ऐसे में कांग्रेस को 50-70 के बीच सीटें देने पर सपा तैयार है. अगर कांग्रेस इससे ज़्यादा चाहती है तो उसे ये बताना होगा कि आख़िर ज़्यादा सीटों पर लड़ने का आधार क्या होगा, प्रत्याशी कौन होंगे और जाति-धर्म का फैक्टर कैसा रहेगा और किन मुद्दों पर कांग्रेस चुनाव जीतने का दम भरेगी.

गठबंधन रहेगा या नहीं?

फ़िलहाल सपा और कांग्रेस के नेता इंडिया अलायन्स के गठबंधन के बने रहने का दावा कर रहे हैं. हालांकि इन दावों के बीच कई बार ऐसी बयानबाज़ी कर दी जाती है जिससे आशंका पैदा हो जाती है कि ये गठबंधन रहेगा या नहीं. इन बयानों के बीच अब तक औपचारिक तौर पर कोई बैठक होने का ज़िक्र सपा या कांग्रेस के नेता नहीं कर रहे हैं. ज़ाहिर है दोनों दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व को बैठकर तय करना है कि सीट शेयरिंग कैसे होगी. ये देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अधिक से अधिक सपा से कितनी सीटें ले पाती है और ये भी देखना रोचक होगा कि सपा कांग्रेस को कितनी सीटों पर समझा कर रोक पाती है.

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