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इस सरकारी अस्पताल को लेकर हाईकोर्ट ने अधिकारियों की क्लास लगा दी 

कोर्ट ने कहा कि लखनऊ में बैठे राज्य के अफ़सर इस पर कोई नज़र नहीं रख रहे है. ऐसा लगता है कि प्रोजेक्ट को यूपी SIDCO के कुछ अफ़सरों और कॉन्ट्रैक्टर के हाथों में छोड़ दिया गया है जो प्रोजेक्ट को पूरा करने की कोई कोशिश नहीं कर रहे है.

इस सरकारी अस्पताल को लेकर हाईकोर्ट ने अधिकारियों की क्लास लगा दी 
प्रयागराज:

प्रयागराज के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में बदहाली और अव्यवस्था पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट ने स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल की बदहाली पर चिंता जताते हुए कहा कि अधिकारी प्रयागराज शहर और उसके आस-पास मेडिकल सुविधा का विकास करने में उत्साहित नहीं है जैसा कि उन्होंने कई मौकों पर वादा किया और शहर के लोगों को मेडिकल इलाज के लिए या तो नई दिल्ली या लखनऊ जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है. कोर्ट ने एसआरएन अस्पताल में सात वर्षों से चल रहे चिल्ड्रेन विंग के निर्माण कार्य में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए सात साल से चल रहे कंस्ट्रक्शन की रफ़्तार पर अपनी कड़ी नाराज़गी दर्ज की है.

कोर्ट ने कहा कि लखनऊ में बैठे राज्य के अफ़सर इस पर कोई नज़र नहीं रख रहे है. ऐसा लगता है कि प्रोजेक्ट को यूपी SIDCO के कुछ अफ़सरों और कॉन्ट्रैक्टर के हाथों में छोड़ दिया गया है जो प्रोजेक्ट को पूरा करने की कोई कोशिश नहीं कर रहे है. अख़बारों की रिपोर्ट रोज़ बता रही है कि प्रयागराज के एलनगंज स्थित चर्च लेन में चल रहे बच्चों के विंग की हालत खराब है. नए विंग का कंस्ट्रक्शन पूरी रफ़्तार से नहीं हो रहा है. 

मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने अगली सुनवाई पर यूपी SIDCO के प्रबंध निदेशक, मोतीलाल नेहरू अस्पताल के प्रिंसिपल और स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल के अधीक्षक को बच्चों के विंग के कंस्ट्रक्शन में मदद के लिए व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है. कोर्ट अब इस मामले में अगली सुनवाई 23 मार्च को दोपहर दो बजे करेगी. जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की सिंगल बेंच ने यह आदेश डॉ अरविंद गुप्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है.

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट मोतीलाल नेहरू कॉलेज के प्रोफेसर डॉ अरविंद गुप्ता की याचिका पर पिछले डेढ़ साल से सुनवाई कर रही है. अगस्त 2024 में याचिका दाखिल की गई थी. बुधवार को यूपी सरकार के मेडिकल हेल्थ और फैमिली वेलफेयर और मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी द्वारा पर्सनल एफिडेवि फाइल किया गया जिसे कोर्ट में रिकॉर्ड में ले लिया. 

कोर्ट ने राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल  एमसी चतुर्वेदी और चीफ स्टैंडिंग काउंसिल राजेश्वर त्रिपाठी ने पक्ष रखा. कोर्ट अपर मुख्य सचिव द्वारा दायर हलफनामे को पढ़कर हैरान हुआ क्योंकि उन्होंने उन्हीं तथ्यों को दोहराया था जिनका ज़िक्र उन्होंने अपने पिछले हलफनामे में किया था. कोर्ट को बताया गया कि स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में बच्चों के विंग का निर्माण पिछले सात वर्षों से चल रहा है. यह परियोजना वर्ष 2019 में शुरू हुई थी जो अब तक पूरी नहीं हो पाई है. कोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि फाइल किए गए एफिडेविट से यह साफ है कि प्रोजेक्ट सितंबर, 2026 के महीने में किसी समय पूरा हो जाएगा. यह भरोसा कोर्ट को कई बार दिया गया था. 

पहले के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी ने साल 2025 में कोर्ट में बयान दिया था कि बच्चों का विंग बहुत जल्द पूरा हो जाएगा और 2-3 महीने में चालू हो जाएगा. इसपर कोर्ट ने सात साल से चल रहे कंस्ट्रक्शन की रफ़्तार पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की आर कहा कि ऐसा लगता है कि लखनऊ में बैठे राज्य के अधिकारियों ने इस पर कोई नज़र नहीं रखी है. कोर्ट ने पाया कि नए विंग का कंस्ट्रक्शन पूरी रफ़्तार से नहीं चल रहा है. कोर्ट ने कहा कि दाखिल किए गए एफिडेविट के पैरा पांच से पता चलता है कि स्वरूपरानी नेहरू हॉस्पिटल के विस्तार के लिए 31,314 Sq.M. ज़मीन के ट्रांसफर के संबंध में NOC लेने के लिए अलग-अलग डिपार्टमेंट को एक लेटर भेजा गया है. यह बात संबंधित ऑफिसर द्वारा फाइल किए गए पहले के एफिडेविट में कही गई थी. 

कोर्ट ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि राज्य स्वरूपरानी नेहरू हॉस्पिटल के पक्ष में अतिरिक्त ज़मीन के जल्दी ट्रांसफर में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है ताकि हॉस्पिटल में अतिरिक्त मेडिकल सुविधाएं बनाई जा सकें. शहर के लोगों को इलाज के लिए या तो नई दिल्ली या लखनऊ जाना पड़ता है. हालांकि एएजी एमसी चतुर्वेदी ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वो प्रोजेक्ट को तेज़ी से पूरा करने के लिए संबंधित अधिकारियों से बात करेंगे. कोर्ट ने समाचार पत्रों की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि चर्च लेन में संचालित वर्तमान चिल्ड्रेन विंग की स्थिति बेहद खराब है फिर भी नए विंग का निर्माण पूरी गति से नहीं किया जा रहा है. कोर्ट अब इस मामले में 23 मार्च को अगली सुनवाई करेगी. 

बता दें कि 23 मई 2025 को भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसआरएन अस्पताल की तुलना पोस्टमार्टम हाउस से की थी. कोर्ट ने कहा था कि अस्पताल की स्थिति दयनीय होने के कारण तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है. कोर्ट तो तब भी यही बताया गया था कि 2019 से निर्माणाधीन बच्चों का अस्पताल अभी तक पूरा नहीं हुआ है और प्रयागराज का चर्चित बाल रोग विभाग सरोजिनी नायडू बाल चिकित्सालय, चर्च लेन में चल रहा है. राज्य सरकार ने यह वचन दिया था कि पूरी सुविधा सरोजिनी नायडू बाल चिकित्सालय से स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल परिसर में शिफ्ट कर दी जाएगी. उस दौरान जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने अपने आदेश में महाकुंभ का जिक्र करते हुए कहा था कि महाकुंभ 2025 में दो महीने के अंदर 66.30 करोड़ लोगों ने संगम में पवित्र डुबकी लगाई है. 

प्रयागराज शहर में न्यूनतम चिकित्सा सुविधा भी नहीं है. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य सरकार का पूरा ध्यान लखनऊ पर है जहां संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान स्थित है. कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि प्रयागराज शहर पिछले कुछ सालों में एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बन गया है और दुनिया भर से लोगों की भारी आमद को देखते हुए चिकित्सा सुविधा को उन्नत करने की आवश्यकता है. 

23 मई 2025 के फैसले में कोर्ट ने कहा था कि प्रयागराज मेडिकल माफियाओं की गिरफ्त में है. मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से जुड़ा स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल दयनीय स्थिति में है. कोर्ट ने कड़े शब्दों में नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा था कि शहर के निजी मेडिकल माफियाओं के कारण सरकारी मेडिकल व्यवस्था को बहुत बड़ा खतरा है. याची डॉ अरविंद गुप्ता द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था कि यह मामला एक क्लासिक उदाहरण है जो राज्य उपभोक्ता अदालत द्वारा पारित आदेश से उत्पन्न होकर हाईकोर्ट के समक्ष आया है जिसमें मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ अरविंद गुप्ता ने शहर के निजी अस्पताल में एक मरीज का इलाज किया था जिसने संबंधित डॉक्टर को जिला उपभोक्ता फोरम में घसीटा था. उपभोक्ता फोरम ने संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कुछ आदेश पारित किए थे.

इसके बाद ये मामला राज्य उपभोक्ता कोर्ट में चला गया जिसने डिस्ट्रिक्ट फोरम द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखा. याचिकाकर्ता मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के डॉ अरविंद गुप्ता जिन्होंने निजी नर्सिंग होम में मरीज का इलाज किया था. लापरवाही के कारण उसने इन्हें जिला उपभोक्ता फोरम व राज्य उपभोक्ता फोरम के चक्कर लगवा दिए. फोरम से मायूस डाक्टर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है जिसपर इलाहाबाद हाईकोर्ट पिछले डेढ़ सालों से लगातार सुनवाई कर रहा है.

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