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आधी रात को याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो क्या....सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्याज-लहसुन’ पर रिसर्च वाली PIL कर दी खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक वकील की ओर से पार्टी-इन-पर्सन के रूप में दायर कई जनहित याचिकाओं (PIL) पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए उन्हें खारिज कर दिया. CJI सूर्यकांत ने कहा कि आधी रात को ये सब याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो क्या?

आधी रात को याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो क्या....सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्याज-लहसुन’ पर रिसर्च वाली PIL कर दी खारिज
  • सुप्रीम कोर्ट ने लहसुन और प्याज पर रिसर्च कराने की याचिका को अस्पष्टता और खराब ड्राफ्टिंग के कारण खारिज किया
  • याचिकाकर्ता ने जैन समुदाय के तामसिक भोजन संबंधी भावनाओं की रक्षा का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने सवाल किया
  • सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में ऐसी याचिकाओं पर भारी जुर्माना लगाने की चेतावनी दी ताकि अनावश्यक बोझ न पड़े
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लहसुन-प्याज पर रिसर्च वाली याचिका खारिज करते हुए एक वकील को डांट लगा दी. पीठ की अगुवाई कर रहे CJI सूर्यकांत ने याचिकाओं की प्रकृति और ड्राफ्टिंग पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि आधी रात को ये सब याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो क्या? इनमें से एक याचिका में अदालत से एक कमेटी बनाकर यह शोध कराने का निर्देश देने की मांग की गई थी कि प्याज और लहसुन में क्या ‘तामसिक'(नॉन-वेज खाना) या नकारात्मक तत्व होते हैं?

लहसुन-प्याज पर याचिका

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि जैन समुदाय प्याज-लहसुन और जड़ वाली सब्जियों को तामसिक भोजन मानकर परहेज करता है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि यह मुद्दा आम है और हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट में एक तलाक का मामला भी भोजन में प्याज होने को लेकर सामने आया था. इस पर कोर्ट ने पूछा कि आप जैन समुदाय की भावनाओं को क्यों ठेस पहुंचाना चाहते हैं?

अदालत ने इस याचिका के साथ-साथ उसी वकील की दायर तीन अन्य PIL भी सुनने से इनकार कर दिया.
वो तीन याचिकाएं ये थीं- 
➜शराब और तंबाकू उत्पादों में कथित हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने के निर्देश की मांग
➜संपत्तियों का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित करने की मांग
 ➜शास्त्रीय भाषाओं की घोषणा को लेकर दिशानिर्देश बनाने की मांग शामिल

हम भारी जुर्माना भी लगा सकते थे

पीठ ने सभी याचिकाओं को अस्पष्ट और तुच्छ  बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाएं खराब तरीके से ड्राफ्ट की गई हैं और इनमें मांगी गई राहत अस्पष्ट है, जिससे अदालत का समय खराब होता है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह याचिका नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड का उदाहरण है. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तो यहां तक कह दिया कि अगर याचिकाकर्ता वकील नहीं होते तो हम भारी जुर्माना भी लगा सकते थे. ऐसी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पर अनावश्यक बोझ डालती हैं. कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की याचिकाएं दायर करने पर असाधारण जुर्माना लगाया जा सकता है. 

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