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एक फिल्म ने यूपी की राजनीति में गजब ढा दिया, जानिए क्यों मचा है इतना बवाल?

मनोज वाजपेयी की नई फिल्म 'घूसखोर पंडत' को लेकर उत्तर प्रदेश में जमकर बवाल हुआ. लखनऊ में FIR भी हुई. फिर केंद्र सरकार ने इस पर रोक लगा दी.

एक फिल्म ने यूपी की राजनीति में गजब ढा दिया, जानिए क्यों मचा है इतना बवाल?
'घूसखोर पंडत' फिल्म के टाइटल को लेकर जमकर बवाल हो रहा है.
PTI
  • उत्तर प्रदेश में घूसखोर पंडत फिल्म के नाम को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर विरोध व्यक्त किया था
  • मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर लखनऊ में फिल्म के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर केंद्र ने रोक लगाई थी
  • ब्राह्मण संगठनों के विरोध के कारण फिल्म का प्रमोशनल कंटेंट निर्माता ने पहले ही रोकने का फैसला लिया था
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लखनऊ:

उत्तर प्रदेश की राजनीति भी गजब है. कब किस बात को मुद्दा बना दिया जाए, ये भी कोई नहीं जानता. कब कौन किसके पक्ष और किसके विपक्ष में चला जाए, इसका भी नहीं पता और जो हमेशा आपस में लड़ते रहते हैं, वो कब किसी मुद्दे पर सब एक हो जाएं, ये भी कहा नहीं जा सकता. इस बार कुछ ऐसा हुआ है कि जिस मुद्दे पर सब एक भी हैं और अलग भी. ये मामला 'घूसखोर पंडत' नाम की फिल्म से जुड़ा हुआ है. अभी फिल्म नहीं आई, सिर्फ टीजर आया था लेकिन बवाल इतना मचा कि उसको भी रोकना पड़ गया. 

किसके कहने पर लगी रोक? 

फिल्म तो फिल्म है लेकिन सियासत के क्या कहने. इस फिल्म के नाम को लेकर विवाद ऐसा हुआ कि क्या सत्ता और क्या विपक्ष, सब एक सुर में विरोध करने लगे. लेकिन मजेदार ये है कि केंद्र सरकार ने फिल्म के कंटेंट पर रोक लगाने का आदेश जारी किया तो आखिर किसके कहने पर? राजनैतिक दलों का विरोध एक तरफ रख दिया जाए तो सवाल ये कि क्या सीएम योगी के निर्देश पर हुई एफआईआर के बाद फिल्म पर फौरी रोक लगाई गई या डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के अनुरोध पर या प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के आग्रह पर? 

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रोक पर श्रेय किसका? 

दरअसल ब्राह्मण संगठनों के विरोध और विपक्षी दलों की आपत्ति के बीच बीजेपी के नेताओं ने भी खुलकर 'घूसखोर पंडत' मामले के विरोध दर्ज कराया. जिस रात सीएम योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर लखनऊ में फिल्म को लेकर एफआईआर दर्ज हुई, उसके अगले ही दिन केंद्र ने फिल्म को जरूरी निर्देश जारी कर दिए. ये अलग बात है कि उससे पहले ही निर्माता ने फिल्म के प्रमोशन कंटेंट को रोकने की घोषणा कर दी थी लेकिन ये सब होने के बाद डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने खुद को श्रेय दिया तो वहीं पंकज चौधरी अपनी भूमिका के लिए केंद्र को शुक्रिया कह रहे हैं. 

ब्राह्मण संगठन अभी भी सड़कों पर 

'घूसखोर पंडत' नाम की फिल्म से आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के केंद्र सरकार के निर्देश दिए लेकिन तब भी ब्राह्मण संगठनों ने अपना विरोध कम नहीं किया. शहर दर शहर इस फिल्म पर रोक की मांग को लेकर लोग सड़कों पर हैं. इस विवाद की पहल ब्राह्मणवादी संगठनों ने की तो वहीं उनके समर्थन में सबसे पहले विपक्ष ने ब्राह्मण संगठनों का समर्थन कर दिया. इसके बाद बीजेपी ने खुलकर फिल्म के टाइटल का विरोध दर्ज करा दिया. अब जब आपत्तिजनक कंटेंट हटाने को कह दिया गया तो खुलकर श्रेय लेने की होड़ दिखाई दे रही है. सवाल ये कि श्रेय लेने की इतनी होड़ लगने की वजह क्या है? ये भी समझाते हैं लेकिन उससे पहले विवाद की क्रोनोलॉजी समझ लीजिए. 

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विवाद कैसे बढ़ा और क्या हुआ? 

  • ब्राह्मण संगठनों ने फिल्म के टाइटल के विरोध में कई शहरों में प्रदर्शन किए 
  • कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सीधा बीजेपी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि पहले बीजेपी धर्म के बीच लड़ाई कराती थी, अब जातियों में कराने लगी.
  • बीएसपी प्रमुख मायावती ने भी विरोध दर्ज कराते हुए फिल्म पर रोक की मांग कर दी.
  • इसके बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी बीजेपी को घसीट दिया. 
  • विवाद बढ़ता देख सीएम योगी के निर्देश पर लखनऊ में एफआईआर दर्ज की गई 
  • यूपी सरकार के तमाम मंत्रियों ने भी अपनी तरफ से विरोध जताते हुए फिल्म पर कार्रवाई की मांग उठा दी.
  • यूपी के मंत्री डॉ संजय निषाद ने सेंसर बोर्ड का दायरा बढ़ाते हुए ओटीटी और सोशल मीडिया में सेंसर बोर्ड के दाखिल की मांग उठाई.
  • विरोधों को देखते हुए फिल्म निर्माता नीरज पांडे और मनोज वाजपेयी ने बयान जारी कर सफाई दी और प्रमोशनल कंटेंट रोकने की घोषणा कर दी.
  • तमाम विरोधों के बाद केंद्र की तरफ से फिल्म निर्माताओं को आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के निर्देश जारी कर दिए गए.
  • डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक भी मैदान में कूदे. उन्होंने बयान जारी कर दावा कर दिया कि केंद्र ने जो फैसला किया है, वो उनकी डिमांड पर लिया गया है.
  • यूपी बीजेपी के अध्यक्ष पंकज चौधरी ने दावा किया कि उनके हस्तक्षेप से केंद्र ने ये फैसला किया.
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यूपी में इतना बवाल क्यों हुआ? 

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ महीनों से ब्राह्मणों की राजनीति चरम पर है. बीते विधानसभा सत्र के दौरान बीजेपी से जुड़े ब्राह्मण विधायकों की बैठक से इस मुद्दे की शुरुआत मानी जा रही है. इस बैठक को लेकर विपक्ष ने बीजेपी को घेर दिया. दावा हुआ कि ब्राह्मणों का शोषण और अपमान यूपी में हो रहा है, इससे ब्राह्मण विधायक दुखी होकर बैठक कर रहे हैं. बीजेपी ने मौके की नजाकत देखते हुए पहले चुप्पी साधी लेकिन नए नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की बैठक में शामिल विधायकों को नोटिस जारी करने परमले ने और तूल पकड़ लिया.

ब्राह्मण विवाद बढ़ा कैसे? 

माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को प्रशासन के रोकने पर भी हंगामा हुआ. मामला ब्राह्मण के अपमान से जोड़ दिया गया. नतीजा ये हुए कि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने ब्राह्मण के अपमान के नाम पर इस्तीफा दे दिया. इस मुद्दे को भी विपक्ष ने बीजेपी पर निशाना साधने का हथियार बना लिया. विपक्ष ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मामले को शंकराचार्य का अपमान पूरे हिंदू धर्म का अपमान और ब्राह्मणों का अपमान बनकर बीजेपी पर निशाना साध दिया. नतीजा ये हुए कि पूरा विपक्ष अविमुक्तेश्वरानंद मामले में उनके पक्ष में खड़ा दिखाई दिया. इसके बाद रही सही कसर यूजीसी की गाइडलाइन ने पूरी कर दी जब यूं तो विरोध सवर्ण कर रहे थे लेकिन सबसे मुखर होकर ब्राह्मण सामने आ गए. 

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बीएसपी फैक्टर क्या है? 

बीएसपी ने साल 2019 के लोकसभा चुनावों में सपा से गठबंधन किया था. चुनाव के बाद मायावती ने सपा से नाता तोड़ लिया और तब से अब तक वो अकेले दम पर चुनाव लड़ रही हैं. हालांकि हर चुनाव में उनका प्रदर्शन खराब ही रहा. ऐसे में हाल ही में एक पीसी में मायावती ने बयान दिया कि अगर कोई दल उन्हें ब्राह्मण समेत सवर्ण वोट ट्रांसफर कराने की गारंटी दे, तभी वो गठबंधन पर विचार करेंगी. ऐसे में ये साफ है कि मायावती अगले साल के विधानसभा चुनाव के लिए दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण गठजोड़ बनाने की कोशिश में लगी हैं. मायावती बार बार ब्राह्मणों के मुद्दों पर मुखर होकर ये संकेत दे रही हैं कि इस बार उनके फार्मूले में दलितों के साथ ब्राह्मण फैक्टर भी शामिल है. यही फार्मूला साल 2007 में भी बना था, जब मायावती पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुई थीं. 

फिल्मों के विरोध से बदलने पड़े थे नाम 

  • इरफान की फिल्म 'बिल्लू बार्बर' का ट्रेलर लॉन्च होने के बाद कुछ इसी तरह का माहौल बनाया गया था. तब भी निर्माताओं ने फिल्म से बार्बर शब्द हटाकर फिल्म का नाम बिल्लू कर दिया था 
  • रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की फिल्म 'रामलीला' को लेकर भी जमकर हंगामा कटा था. तब फिल्म बनाने वालों ने इसका नाम गोलियों की रासलीला - रामलीला कर दिया था. 
  • संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावती' को लेकर क्षत्रिय संगठनों ने बवाल किया था. महारानी पद्मावती का अपमान बताने को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद फिल्म का नाम पद्मावत रखा गया. 
  • अक्षय कुमार की फिल्म 'सम्राट पृथ्वीराज' को लेकर भी करणी सेना ने आपत्ति की. इसे महाराजा पृथ्वीराज से जोड़कर इसपर रोक लगाने की मांग उठी. तब इस फिल्म का नाम पृथ्वीराज करना पड़ा था. 
  • 'लक्ष्मी बम' अक्षय कुमार की फिल्म थी. हिंदू संगठनों ने इसे मां लक्ष्मी का अपमान बताया. नौबत ये आई कि फिल्म का नाम लक्ष्मी करके रिलीज करना पड़ा. 
  • सलमान खान की फिल्म लवरात्रि का टाइटल अश्लील बताने को लेकर विवाद बढ़ा था. तब फिल्म का नाम लवयात्री रखना पड़ा था. हिंदू संगठनों ने नवरात्रि से इसके नाम को जोड़ते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी.
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अब आगे क्या? 

फिलहाल 'घूसखोर पंडत' का नाम भले कुछ और हो जाए लेकिन एक बात साफ है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों के दोनों हाथों में लड्डू जरूर होगा. जिस तरह सत्ता और विपक्ष, दोनों खुलकर ब्राह्मणों को रिझाने में लगे हैं, उससे माना जा रहा है कि ब्राह्मणों को टिकटों में ज्यादा तरजीह मिल सकती है. साथ ही ब्राह्मणों से जुड़े मुद्दों पर संभव है ज्यादा जोर से आवाजें उठें और उन आवाजों का असर भी बड़ा हो. फिलहाल क्या होगा, ये देखना बहुत दिलचस्प होगा. देखना होगा आखिर ब्राह्मण किसकी तरफ जाते हैं?

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