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IAS दिव्या मित्तल: जिस गांव में कुंवारे रह जाते थे लड़के! महिला DM ने ऐसे बदली वहां की तकदीर?

IAS दिव्या मित्तल मिर्जापुर के प्रयासों से लहुरिया दह गांव में आजादी के 75 साल बाद आखिरकार नलों से पानी बह निकला. पूर्व डीएम और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के दृढ संकल्प से 125 परिवारों का दशक पुराना जल संकट समाप्त हुआ. जानिए कैसे प्रशासनिक इच्छाशक्ति ने सरकारी फाइलों के 'असंभव' को 'संभव' में बदल दिया.

IAS दिव्या मित्तल: जिस गांव में कुंवारे रह जाते थे लड़के! महिला DM ने ऐसे बदली वहां की तकदीर?
द‍िव्‍या म‍ित्‍तल उत्तर प्रदेश कैडर में 2013 बैच की आईएएस व म‍िर्जापुर की पूर्व डीएम हैं.
Instagram Divya Mittal IAS
  • मिर्जापुर जिले के लहुरिया दह गांव में 75 वर्षों तक पानी की गंभीर कमी के कारण जनजीवन अत्यंत कठिन था
  • आईएएस दिव्या मित्तल ने जिला कलेक्टर रहते हुए गांव में पानी पहुंचाया
  • इंजीनियरों ने लिफ्ट सिस्टम को पुनः डिज़ाइन कर पहाड़ी इलाके में पाइपलाइन बिछाने का कार्य किया

IAS द‍िव्‍या म‍ित्‍तल उत्‍तर प्रदेश के म‍िर्जापुर ज‍िले के उस गांव को कभी नहीं भूल पाएंगीं, जिस गांव में पानी की बूंद-बूंद के लिए जंग होती थी, जहां लोग अपनी बेटियों की शादी करने से कतराते थे. लड़के कुंवारे रह जाते थे. वहां जब पहली बार नल से पानी बह निकला, तो न सिर्फ एक बुजुर्ग मां की आंखों में आंसू थे, बल्कि मिर्जापुर की तत्कालीन डीएम दिव्या मित्तल भी अपने जज्बात पर काबू न रख सकीं.

उत्तर प्रदेश कैडर में भारतीय प्रशासन‍िक सेवा की 2013 बैच की आईएएस अधिकारी द‍िव्‍या म‍ित्‍तल वर्तमान में वर्तमान में उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर कार्यरत हैं. इससे पहले संत कबीरनगर, मिर्जापुर के बाद देवरिया में ज‍िला कलेक्‍टर रह चुकी हैं. हाल ही उन्‍होंने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर मिर्जापुर के दूरस्थ गांव लहुरिया दह की एक दिल छू लेने वाली और आंखें खोल देने वाली कहानी साझा की है.   

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IAS द‍िव्‍या म‍ित्‍तल की ने LinkedIn प्रोफाइल ल‍िखा क‍ि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर, मिर्जापुर जिले में एक पहाड़ी की चोटी पर बसे गांव लहुरिया दह में करीब 1,500 लोग रहते हैं, जिनमें अधिकांश दलित परिवार हैं. यह गांव आजादी के 75 वर्षों तक एक-एक बूंद पानी के लिए तरसता रहा. स्थिति इतनी भयावह थी कि टैंकरों से पानी का वितरण होता था और पहचान के आधार पर पानी का राशन तय किया जाता था. 

गांव की ग्राम सभा टैंकरों के बिल चुकाते-चुकाते भारी कर्ज में डूब चुकी थी. महिलाएं प्रतिदिन पानी की हर एक बाल्टी के लिए पथरीले और दुर्गम रास्तों पर कई किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर थीं. गांव में पानी का यह संकट इस कदर गहरा था कि आसपास के लोग लहुरिया दह में अपनी बेटियों की शादी करने से भी डरते थे. 

जब दिव्या मित्तल मिर्जापुर की जिलाधिकारी बनकर पहली बार इस गांव का दौरा करने पहुंचीं, तो वहां के हालात देखकर वे अंदर तक हिल गईं. वे कहती हैं कि उस दिन ग्रामीणों के सामने वे अपनी पानी की बोतल से घूंट भरने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकीं. सरकारी फाइलों में हर रिपोर्ट का एक ही निष्कर्ष था कि कठिन भौगोलिक स्थिति के कारण यहां पानी पंप करना असंभव है. योजनाएं आती थीं और सर्वे के दौर में ही दम तोड़ देती थीं.

मीटिंग्स से बाहर निकलकर ग्राउंड जीरो पर लड़ा गया युद्ध

आईएएस दिव्या मित्तल का मानना है कि सरकारी फाइलों में 'असंभव' का मतलब आमतौर पर तीन ही बातें होती हैं. किसी ने हाल के दिनों में नए सिरे से आंकड़े जुटाकर गणित नहीं लगाया, किसी ने उस समस्या की शुरुआत से अंत तक जिम्मेदारी नहीं ली, या फिर किसी ने धरातल पर खड़े होकर तब तक न हटने का फैसला नहीं किया जब तक कि कोई ठोस योजना न बन जाए.

दिव्या मित्तल और उनकी टीम ने इन तीनों धारणाओं को तोड़ा. जल निगम के इंजीनियरों ने ढलान और चढ़ाई के विपरीत जाकर लिफ्ट सिस्टम को फिर से री-डिजाइन किया. इस पूरे प्रोजेक्ट को चार स्पष्ट चरणों स्रोत, पम्पिंग, भंडारण और वितरण में बांटा गया. एसी कमरों की औपचारिक बैठकों के बजाय हर हफ्ते सीधे 'ऑन-साइट' जाकर जमीनी समीक्षा की गई. 'हर घर जल' योजना के तहत पाइपलाइन को उस दुर्गम पहाड़ी पर सफलतापूर्वक बिछाया गया, जिसे इससे पहले की सभी कोशिशों ने नामुमकिन मान लिया था. 

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Photo Credit: Instagram Divya Mittal IAS

9 महीने की कड़ी मेहनत और 75 साल का इंतजार खत्म

प्रशासनिक टीम की इस अथक मेहनत का परिणाम 9 महीने बाद सामने आया. आईएएस दिव्या मित्तल जब दोबारा लहुरिया दह पहुंचीं, तो उन्होंने अपनी आंखों के सामने गांव के 125 घरों के नलों से पहली बार स्वच्छ पानी बहते देखा. इस तरह 75 सालों के लंबे इंतजार का अंत हुआ. उस ऐतिहासिक पल को याद करते हुए दिव्या मित्तल बताती हैं कि एक बुजुर्ग महिला ने उनका हाथ पकड़कर रोना शुरू कर दिया और वे खुद भी अपने आंसू नहीं रोक पाईं. वे मानती हैं कि अपनी 11 साल की प्रशासनिक सेवा में उन्होंने कभी उस पल जैसा संतोष और भावुक क्षण महसूस नहीं किया था.

नौकरशाही और समाज के लिए 3 बड़े सबक

इस सफलता की कहानी के जरिए आईएएस दिव्या मित्तल ने देश की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने तीन बेहद महत्वपूर्ण सीख रखी हैं. 
पहला सबक यह है कि सबसे गरीब गांव अक्सर इसलिए गरीब रह जाते हैं क्योंकि वहां सुविधाएं पहुंचाना मुश्किल होता है, लेकिन सरकार का पहला कर्तव्य वहीं होना चाहिए जहां पहुंचना कठिन हो क्योंकि बाजार कभी वहां नहीं पहुंचेगा. 
दूसरा सबक यह है कि 'असंभव' कोई इंजीनियरिंग का फैसला नहीं होता, बल्कि यह अक्सर जिम्मेदारी न लेने की नीयत का परिणाम होता है. 
तीसरा सबक यह है कि सिर्फ योजनाएं बना देने से घर तक पानी नहीं पहुंचता, बल्कि वे लोग पानी पहुंचाते हैं जो किसी गांव की समस्या को अपनी व्यक्तिगत समस्या मानकर काम करते हैं.   

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