- तथ्य छिपाकर 2 याचिकाएं दाखिल करना पड़ा महंगा
- अदालत ने कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार नहीं
- याचिकाकर्ता की चूक से SSP को हुई परेशानी, कोर्ट ने दिलाई भरपाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत से तथ्य छिपाने और एक ही मामले में दो अलग-अलग बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं (Habeas Corpus Petition) दाखिल करने को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए कड़ा आदेश दिया है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता ओमेंद्र यादव की दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं और उस पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया. अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि एक महीने के भीतर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) बरेली अनुराग आर्य को दी जाए. यदि भुगतान नहीं किया गया तो रकम को राजस्व बकाया की तरह वसूला जाएगा.
डिवीजन बेंच ने सुनाया फैसला
NDTV को प्राप्त जानकारी के मुताबिक इस मामले की सुनवाई जस्टिस अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने की. अदालत के सामने बरेली निवासी ओमेंद्र यादव की दो अलग-अलग बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं थीं.
याचिका में अवैध हिरासत को चुनौती देने के साथ मुआवजे की मांग भी की गई थी.
याचिका में नहीं था तारीख, समय और स्थान का जिक्र
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पूरी याचिका में यह स्पष्ट नहीं बताया गया था कि याचिकाकर्ता को किस तारीख, किस समय और किस स्थान से हिरासत में लिया गया था. याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हलफनामे में यह उल्लेख है कि 8 मई से उसका कोई पता नहीं चल रहा था और पुलिस ने उसे रोका हुआ था. हालांकि अदालत ने कहा कि हलफनामे में दी गई सामान्य जानकारी मुख्य याचिका में ठोस तथ्यों की कमी को पूरा नहीं कर सकती. कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसी याचिकाओं में हिरासत की तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक होता है.
दूसरी याचिका ने बढ़ाई मुश्किल
मामले में अहम मोड़ तब आया जब कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि राज्य सरकार पहली याचिका में 18 मई 2026 को जवाबी हलफनामा दाखिल कर चुकी थी. इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने 26 मई 2026 को दूसरी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 746/2026 दाखिल कर दी. हैरानी की बात यह रही कि दूसरी याचिका में पहले से लंबित याचिका का कोई जिक्र नहीं किया गया. अदालत ने पाया कि दूसरी याचिका ऐसे दाखिल की गई जैसे यह उसी मामले में पहली याचिका हो. कोर्ट ने माना कि यह तथ्य छिपाने और न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास था.
SSP बरेली को झेलनी पड़ी थी नाराजगी
पहली याचिका की सुनवाई के दौरान थाने की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराने के मामले में कोर्ट ने एसएसपी बरेली अनुराग आर्य से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा था. हलफनामे के एक पैरा को प्रथमदृष्टया गलत मानते हुए अदालत ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से तलब किया था. पेशी के दौरान कोर्ट ने एसएसपी पर नाराजगी भी जताई थी. बाद में जब दोनों याचिकाओं से जुड़े सभी तथ्य सामने आए तो अदालत ने कहा कि यदि शुरुआत में ही यह जानकारी दे दी जाती कि पहली याचिका पहले से लंबित है, तो एसएसपी को अदालत की अप्रसन्नता का सामना नहीं करना पड़ता.
कोर्ट ने कहा, सच छिपाना गंभीर मामला
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया. अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता ने सत्य को दबाने और असत्य को बढ़ावा देने का गंभीर प्रयास किया है. कोर्ट ने कहा कि ऐसे आचरण को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता और न्यायालय की प्रक्रिया का इस्तेमाल गलत मकसद से नहीं किया जा सकता.
50 हजार रुपये का करना होगा भुगतान
अदालत ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए प्रत्येक याचिका पर 25-25 हजार रुपये की लागत लगाई. इस प्रकार याचिकाकर्ता को कुल 50 हजार रुपये एसएसपी बरेली अनुराग आर्य को एक महीने के भीतर भुगतान करने होंगे. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं की गई, तो इसे राजस्व बकाया की तरह वसूल कर एसएसपी को प्रदान किया जाएगा. मामले में राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और एजीए नीतेश कुमार श्रीवास्तव ने पक्ष रखा. अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और ईमानदारी सर्वोपरि है तथा तथ्य छिपाकर अदालत से राहत पाने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता.
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