Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर में 1984 के सिख विरोधी दंगों (1984 Sikh Riots Kanpur) से जुड़े सात मामलों में दर्ज मुकदमों को रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है. इन याचिकाओं में नौ आरोपियों की ओर से ट्रायल की पूरी कार्यवाही निरस्त करने की गुहार लगाई गई थी. कोर्ट ने अपने 15 पन्नों के फैसले में कहा कि सभी याचिकाकर्ताओं के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, इसलिए कार्यवाही रद्द करने का कोई आधार नहीं है.

Allahabad High Court Verdict: कानपुर दंगा मामला
‘नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध' करार दी हिंसा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा को नरसंहार और मानवता के विरुद्ध अपराध करार दिया. कोर्ट ने कहा कि इन घटनाओं का स्वरूप एक विशेष समुदाय के खिलाफ किए गए संगठित नरसंहार जैसा था, जिसमें बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या की गई, उन्हें ज़िंदा जलाया गया और उनके घर‑संपत्तियों को लूटकर नष्ट कर दिया गया. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इतने बड़े पैमाने पर हुए अपराधों पर लंबे समय तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और अनेक मामलों में आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से अंतिम रिपोर्टें जल्दबाज़ी में पेश की गईं.
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इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की घटनाओं से जुड़ा मामला
हाईकोर्ट ने कहा कि ये घटनाएं उस व्यापक श्रृंखला का हिस्सा हैं जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में सिख समुदाय के खिलाफ घटित हुई थीं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल समय बीत जाने के आधार पर ऐसे गंभीर मामलों की कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ‘सज्जन कुमार' मामले का हवाला देते हुए कहा कि देरी अपने आप में मुकदमा खारिज करने का आधार नहीं बन सकती.
पुनः जांच का संवैधानिक अधिकार
फैसले में कहा गया कि यह कानून की स्थापित स्थिति है कि संवैधानिक न्यायालयों के पास किसी भी मामले में पुनः जांच या नए सिरे से जांच का निर्देश देने का अधिकार है. कोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने मानवता के विरुद्ध अपराध मानते हुए 1984 के मामलों की जांच के आदेश दिए थे, जिनकी पहचान सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) ने की थी. SIT द्वारा दोबारा की गई जांच और एकत्र साक्ष्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि अभियुक्तों की संलिप्तता और पहचान से संबंधित पर्याप्त सामग्री मौजूद है.
अभियुक्तों की दलीलें ट्रायल में परखी जाएंगी
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता राजेंद्र कुमार जायसवाल द्वारा घटनास्थल पर अनुपस्थित रहने की दलील को ट्रायल के दौरान प्रस्तुत कर सिद्ध किया जाना आवश्यक है. केवल इस आधार पर कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता. साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुराने रिकॉर्ड की अनुपलब्धता या समय बीत जाने को मानवता के खिलाफ अपराधों में मुकदमा रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता.
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, कानपुर नगर के नौबस्ता थाना क्षेत्र में 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों के संबंध में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अलग‑अलग आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई थीं. सभी मामलों में ट्रायल कोर्ट में मुकदमे लंबित हैं. याचिकाकर्ताओं ने समन आदेश सहित पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनका मुख्य तर्क था कि मूल रिकॉर्ड जैसे एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज उपलब्ध न होने के कारण निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं है.
नानावती आयोग और SIT की भूमिका
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए न्यायमूर्ति नानावती आयोग का गठन किया था, जिसने अपने निष्कर्षों में इन घटनाओं को ‘मानवता के खिलाफ अपराध' बताया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों की दोबारा जांच के लिए एसआईटी गठित की. SIT की जांच में यह सामने आया कि कई मामलों में मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, लेकिन जहां एफआईआर की प्रतियां मिलीं, वहां विस्तृत जांच कर आरोप‑पत्र दाखिल किए गए. मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट ने इन आरोप‑पत्रों पर संज्ञान लिया.
हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पीड़ितों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से थे और इसलिए ट्रायल जारी रहना चाहिए. हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि जब ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो CRPC की धारा 482 / BNSS की धारा 528 के तहत कार्यवाही रद्द करने की असाधारण शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए. यह आदेश जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की सिंगल बेंच ने प्रदीप अग्रवाल, जसवंत, राघवेंद्र त्रिपाठी, हरिकांत तिवारी और प्रकाश नारायण पांडेय द्वारा दायर अलग‑अलग याचिकाओं पर दिया.
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