उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे के पास एनआरआई टाउनशिप (NRI Township) क्षेत्र में बुधवार को एक अजगर को चार घंटे की मशक्कत के बाद बचाया गया. वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) की रैपिड रिस्पांस यूनिट को खबर मिली कि एक भारतीय रॉक अजगर शिकार की तलाश में खुले भूखंडों और निर्माण स्थलों पर देखा गया है. बुधवार को छिपने की जगह ढूंढते हुए भारतीय रॉक अजगर ने एक सीवर पाइप के अंदर शरण लिया था. इसकी खबर जैसे ही मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों को मिली, उन्होंने फ़ौरन वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) आपातकालीन हेल्पलाइन से संपर्क किया.
वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) रैपिड रिस्पांस यूनिट तुरंत घटनास्थल पर पहुंची और एक सुनियोजित बचाव अभियान शुरू किया. संकरी पाइपलाइन के कारण रास्ता अवरुद्ध था, इसलिए टीम ने सांप को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित रूप से पाइप को हटाने के लिए एक एक्सकेवेटर का इस्तेमाल किया. चार घंटे के बचाव अभियान के बाद, अजगर को सफलतापूर्वक बाहर निकाला गया और चिकित्सा जांच के लिए वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) बचाव केंद्र ले जाया गया. आगे की जांच के बाद भारतीय रॉक अजगर को जंगल में छोड़ने के लिए उपयुक्त पाया गया.

वाइल्डलाइफ एसओएस (www.wildlifesos.org) एक गैर-लाभकारी संरक्षण संगठन है जो 1995 से देश में संकटग्रस्त वन्यजीवों के बचाव और पुनर्वास के लिए काम कर रही है. वाइल्डलाइफ एसओएस के विशेषज्ञों के मुताबिक, "दिल्ली-एनसीआर में तेजी से विकसित हो रही नई बस्तियों के कारण, वन्यजीवों के लिए सिकुड़ते और खंडित होते आवासों में भटकने के कारण ऐसी घटनाएं आम होती जा रही हैं. निर्माण स्थल अक्सर सरीसृपों के लिए अनजाने में शरणस्थल बन जाते हैं, लेकिन वहां भोजन सीमित होता है, जिससे पालतू जानवरों और मनुष्यों के साथ खतरनाक मुठभेड़ होती है".
वाइल्डलाइफ एसओएस ((Wildlife SOS)) के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, "भारत के तेजी से बढ़ते शहर अब उन आवासों पर अतिक्रमण कर रहे हैं जो कभी जंगली जानवरों के निवास स्थान हुआ करते थे. निर्माण स्थल पर फंसा अजगर तेजी से बदलते परिदृश्य में जीवित रहने का प्रयास कर रहा है, क्योंकि बुनियादी ढांचा पारिस्थितिक नियोजन की तुलना में कहीं अधिक तेजी से विकसित हुआ है. हमारी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि वे बिना किसी संघर्ष के सुरक्षित रूप से जंगल में लौट सकें.”
वाइल्डलाइफ एसओएस की सचिव गीता शेषमणि के मुताबिक, "सांप अक्सर आक्रामकता के कारण नहीं, बल्कि इसलिए मानव क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं क्योंकि उनके आवास सिकुड़ रहे हैं और उन्हें अपरिचित वातावरण के अनुकूल होना पड़ रहा है. 10 साल पहले, ऐसी कई स्थितियों का परिणाम सांप के लिए बहुत अलग होता. जनता के व्यवहार और जागरूकता में यह सकारात्मक बदलाव हमें आशा देता है कि सह-अस्तित्व न केवल संभव है, बल्कि यह पहले से ही हो रहा है.”
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