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जाम में फंसा भारत: ट्रैफिक जाम के कारण हर साल 2 लाख करोड़ का नुकसान झेल रहा देश, दिल्ली वालों के 76 घंटे सड़क पर

Economic Survey के मुताबिक, दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में ट्रैफिक जाम के कारण हर साल 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो रहा है. दिल्ली में लोग औसतन 76 घंटे और बेंगलुरु में इससे भी ज्यादा समय ट्रैफिक में गंवा रहे हैं.

जाम में फंसा भारत: ट्रैफिक जाम के कारण हर साल 2 लाख करोड़ का नुकसान झेल रहा देश, दिल्ली वालों के 76 घंटे सड़क पर
Economic Survey 2025-26: ट्रैफिक जाम से सालाना 2 लाख करोड़ की चपत

Economic Survey 2025-26: भारत के बड़े शहर देश की तरक्की का इंजन माने जाते हैं, लेकिन यही शहर आज ट्रैफिक जाम की वजह से अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बनते जा रहे हैं. इकोनॉमिक सर्वे के ताजा आंकड़ों में सामने आया है कि ट्रैफिक जाम अब सिर्फ लोगों की परेशानी नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक संकट भी बन चुका है. सिर्फ चार महानगर- दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में ट्रैफिक की वजह से हर साल 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो रहा है.

76 घंटे जाम में फंसी रहती है दिल्ली 

इकोनॉमिक सर्वे और टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के मुताबिक, दिल्ली के लोग ट्रैफिक जाम में हर साल औसतन 76 घंटे गंवा देते हैं. यह समय अगर काम, पढ़ाई या परिवार के साथ बिताया जाए तो इसका सीधा फायदा व्यक्ति और अर्थव्यवस्था दोनों को हो सकता है. वहीं, चौंकाने वाली बात यह है कि दिल्ली से भी ज्यादा बुरा हाल बेंगलुरु का है. बेंगलुरु में लोग हर साल करीब 117 घंटे ट्रैफिक में फंसे रहते हैं. यानी देश की आईटी कैपिटल में काम करने वाला एक प्रोफेशनल साल के लगभग पांच दिन सिर्फ जाम में बर्बाद कर देता है.

सालाना 2 लाख करोड़ की चपत

ट्रैफिक जाम का असर सिर्फ देर से ऑफिस पहुंचने तक सीमित नहीं है. इससे ईंधन की बर्बादी होती है, प्रदूषण बढ़ता है और लोगों की सेहत पर भी असर पड़ता है. इकोनॉमिक सर्वे में बताए गए अलग-अलग अध्ययनों के मुताबिक, एक अनस्किल्ड वर्कर को जाम की वजह से हर साल हजारों रुपये का नुकसान होता है, वहीं स्किल्ड और हाईली स्किल्ड वर्कर्स का नुकसान इससे भी ज्यादा है. बेंगलुरु में ही एक अध्ययन के अनुसार, ट्रैफिक जाम के कारण लाखों घंटे का प्रोडक्शन खत्म हो जाता है, जिसकी कीमत अरबों रुपये में बैठती है.

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क्या है कारण?

इस समस्या की जड़ में एक बड़ी वजह है- निजी गाड़ियों पर बढ़ती निर्भरता. शहरों की सड़कें लोगों की आवाजाही के बजाय गाड़ियों की पार्किंग बनती जा रही हैं. एक कार में अक्सर एक या दो लोग ही होते हैं, लेकिन वह सड़क की उतनी ही जगह घेरती है जितनी एक बस या कई दोपहिया वाहन. नतीजा यह कि सड़क की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता और जाम बढ़ता जाता है.

फिर क्या करें?

इकोनॉमिक सर्वे साफ कहता है कि समाधान सड़कों को चौड़ा करने में नहीं, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने में है. मेट्रो, बस, ई-बस, पैदल चलने और साइकिल जैसे ऑप्शन अगर सुरक्षित, सस्ते और भरोसेमंद हों, तो लोग खुद-ब-खुद निजी गाड़ियों से दूरी बनाएंगे. बेंगलुरु, दिल्ली जैसे शहरों में मेट्रो का विस्तार हुआ है, लेकिन बसों और आखिरी मील कनेक्टिविटी की अब भी भारी कमी है.

ऐसे में अगर ट्रैफिक जाम को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले सालों में यह नुकसान और बढ़ेगा. सर्व की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि शहर सिर्फ रहने की जगह नहीं, देश की आर्थिक रीढ़ हैं. अगर यही रीढ़ ट्रैफिक जाम में जकड़ी रही, तो भारत की ग्रोथ की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है.

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