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द‍िल्‍ली में ऑफ‍िस और मनोरंजन सुव‍िधा होंगी एक ही जगह, डीडीए की नई TOD नीति से बदलेगी दिल्ली की लाइफस्‍टाइल

Delhi TOD Policy : दिल्ली में एक ऐसा मॉडल लाया जा रहा है, जिसमें रहना, काम करना और एंटरटेनमेंट, सब कुछ एक ही इलाके में सिमट सकता है. दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी ने अहम बदलाव लागू करते हुए जमीन पर काम शुरू कर दिया है.

द‍िल्‍ली में ऑफ‍िस और मनोरंजन सुव‍िधा होंगी एक ही जगह, डीडीए की नई TOD नीति से बदलेगी दिल्ली की लाइफस्‍टाइल

Delhi TOD Policy : देश की राजधानी दिल्ली की तस्वीर आने वाले समय में बिल्कुल अलग दिख सकती है. रोजाना के ट्रैफिक जाम, लंबी दूरी की भागदौड़ और अलग-अलग जगहों पर फैली जरूरतों के बीच अब एक ऐसा मॉडल लाया जा रहा है, जिसमें रहना, काम करना और एंटरटेनमेंट, सब कुछ एक ही इलाके में सिमट सकता है. दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी ने अपनी ‘ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट' यानी TOD पॉलिसी में अहम बदलाव लागू करते हुए जमीन पर काम शुरू कर दिया है. इसका मकसद शहर को ज्यादा कॉम्पैक्ट और कनेक्टेड बनाना, ताकि ट्रैफिक की उलझनों से राहत मिल सके.

छोटे प्लॉट पर भी बनेगा बड़ा प्रोजेक्ट

अब तक इस तरह के प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ती थी, जिससे कई घने इलाकों में डेवलपमेंट रुक जाता था. लेकिन अब इसे पहले की न्यूनतम लिमिट 10,000 वर्ग मीटर से घटाकर 2,000 वर्ग मीटर कर दिया गया है. यानी अब काफी छोटे प्लॉट पर भी मिक्स्ड-यूज प्रोजेक्ट शुरू किए जा सकेंगे. इसका सीधा मतलब है कि जहां पहले सीमित निर्माण ही संभव था, वहां अब आधुनिक बिल्डिंग्स, रिटेल स्पेस और ऑफिस एक साथ विकसित हो सकेंगे. इससे पुराने और भीड़भाड़ वाले इलाकों को भी नए तरीके से डेवलप करने का रास्ता खुल गया है.

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फाइलों का झंझट खत्म, मंजूरी का टाइम तय

इस पॉलिसी का एक बड़ा फोकस प्रोसेस को आसान बनाने पर भी है. पहले जहां अलग-अलग विभागों के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब एक ही प्लेटफॉर्म पर सभी एजेंसियां मिलकर फैसला लेंगी. इस प्रोजेक्ट को तय समय सीमा के भीतर मंजूरी देने की व्यवस्था की गई है, जिससे डेवलपर्स के लिए प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो सके. इससे कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में होने वाली देरी भी कम होने की उम्मीद है.

ट्रैफिक और प्रदूषण पर भी असर

नई नीति का सीधा असर शहर की लाइफस्टाइल पर पड़ सकता है. अगर लोगों को घर के पास ही काम और जरूरत की सुविधाएं मिलती हैं, तो लंबी दूरी तय करने की जरूरत कम होगी. इससे सड़क पर दबाव घटेगा और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ सकता है. इससे प्रदूषण में भी कमी आ सकती है और शहर ज्यादा व्यवस्थित तरीके से बढ़ेगा.

यह पहल दिल्ली के पूरे अर्बन स्ट्रक्चर को नए तरीके से डिजाइन करने की दिशा में एक कदम है. आने वाले सालों में अगर यह मॉडल सही तरीके से लागू होता है, तो दिल्ली में रहने और काम करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है, जहां शहर ज्यादा कनेक्टेड, सुविधाजनक और रहने लायक बन सकता है.

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