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कौन हैं कुमकुम मोहोद: पिता बनाते हैं मिठाई के डिब्बे, 17 की उम्र में रचा इतिहास, पहली बार भारत बना रिकर्व चैंपियन

भारतीय महिला रिकर्व तीरंदाजी टीम ने शुक्रवार को शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में विश्व चैंपियन दक्षिण कोरिया को 5-3 से हराकर एशियाई खेलों में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता.

कौन हैं कुमकुम मोहोद: पिता बनाते हैं मिठाई के डिब्बे,  17 की उम्र में रचा इतिहास, पहली बार भारत बना रिकर्व चैंपियन
भारत ने पहली बार रिकर्व आर्चरी में जीता गोल्ड

भारतीय महिला रिकर्व तीरंदाजी टीम ने इतिहास रच दिया है. सीनियर तीरंदाज अंकिता भकत और युवा टैलेंटेड खिलाड़ी कीर्ति और कुमकुम मोहम्मद की टीम ने शुक्रवार को एशियन गेम्स 2026 में मजबूत दक्षिण कोरियाई टीम को हराकर गोल्ड मेडल जीता.इस जीत की अहमियत को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि दक्षिण कोरिया 10 बार की ओलंपिक चैंपियन है. 1978 के बाद से कोरियाई टीम  कभी भी कोई फाइनल नहीं हारी है. और भारत की इस जीत की सूत्रधार रहीं कुमकुम मोहोद, जिन्होंने आखिरी पलों में खुद को शांत रखा और एक सटीक निशाना लगाते हुए भारत की झोली में गोल्ड डाल दिया. 

कौन हैं कुमकुम मोहोद

महाराष्ट्र की 17 साल की कुमकुम मोहोद ने फाइनल में दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों के खिलाफ बिना किसी घबराहट के जबरदस्त प्रदर्शन किया. वह ऐसी ही आर्चर हैं. उनका पूरा ध्यान अपने धनुष और निशाने पर होता है - कोई भी चीज़ उनका ध्यान नहीं भटका सकती.  कुमकुम ने बीते कुछ सालों में सबसे बेहतर भारतीय रिकर्व तीरंदाजों की लिस्ट में खुद को शामिल किया है. राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग से उनकी स्किल बेहतर हुई. उन्होंने घरेलू रैंकिंग टूर्नामेंट और सिलेक्शन ट्रायल्स में लगातार अच्छा प्रदर्शन करते हुए भारतीय नेशनल रिकर्व महिला टीम में जगह बनाई है.

हालांकि, उनका यह सफर आर्थिक चुनौतियों से भरा हुआ रहा है. कुमकुम ने सालों तक सेकंडहैंड इक्विपमेंट के साथ ट्रेनिंग की और मुकाबले में हिस्सा लिया. जबकि उनके पिता अनिल मनोहर मोहोद अमरावती में कार्डबोर्ड के मिठाई के डिब्बे बनाकर उनके सपने को पूरा करने में मदद करते रहे.

कुमकुम ने 2025 में इंटरनेशनल लेवल पर डेब्यू किया और तब से आर्चरी वर्ल्ड कप के स्टेज और कॉन्टिनेंटल इवेंट्स समेत कई बड़े इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. कुमकुम के नाम 2 इंटरनेशनल मेडल जीते हैं और दोनों गोल्ड हैं.

वह उस भारतीय महिला टीम का हिस्सा थीं जिसने शंघाई में हुए आर्चरी वर्ल्ड कप स्टेज 2 में गोल्ड मेडल जीता था. इस जीत में उन्होंने 10 बार की ओलंपिक चैंपियन दक्षिण कोरिया और मेज़बान चीन जैसी टीमों को हराया था.  सके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने सोनीपत में हुए ट्रायल्स में अपनी ही टीम की सीनियर खिलाड़ी दीपिका कुमारी को हराकर जापान में होने वाले 2026 एशियाई खेलों (एशियाड) के लिए अपनी जगह पक्की की. कुछ लोगों के लिए ऐसी बड़ी कामयाबी मिलने में सालों लग जाते हैं, लेकिन कुमकुम को ये एक के बाद एक मिलीं, जबकि उन्होंने सिर्फ़ तीन साल पहले ही रिकर्व बो (धनुष) से ​​ट्रेनिंग शुरू की थी.

'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, इस जीत के बाद कुमकुम के पिता अनील कहते हैं,"मिठाई के डिब्बे बनाने से ही घर चलता है और कुमकुम की आर्चरी भी. वह शंघाई में एक सेकंडहैंड बो से ​​शूटिंग कर रही थी, जिसे वह पिछले पांच सालों से इस्तेमाल कर रही है. और जब उसने टीम गोल्ड जीता, तो मैंने जश्न मनाने के लिए मिठाइयां मंगवाने के लिए 'रघुवीर मिठाइयां' को फोन किया - जिनके लिए मैं कभी डिब्बे बनाता था. कुमकुम का जुनून आर्चरी रहा है और उसे वर्ल्ड स्टेज पर चमकते हुए देखने से बेहतर और क्या हो सकता है."

इएसपीएन की रिपोर्ट के अनुसार, कुमकुम के लिए ये सब बस प्रोसेस का हिस्सा लगता है. 17 साल की कुमकुम सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि अपनी डायरी में पढ़ना और लिखना पसंद करती है. कुमकुम के कोच डांगे को याद है कि कैसे कुमकुम, जो उन्हीं की कॉलोनी में रहती थीं, 2018 में उनकी एकेडमी में आईं, जब वह चौथी या पांचवीं क्लास में थी.  वह कहते हैं,"छह महीने के अंदर ही, उन्होंने विजयवाड़ा में बच्चों के लिए आयोजित एक नेशनल एक्सपोज़र टूर्नामेंट में मेडल जीता और उनका कॉन्फिडेंस बढ़ने लगा."

उस मेडल ने ही कुमकुम की दिलचस्पी तीरंदाज़ी में जगाई. पहले सफलता मिली और फिर उन्हें इस खेल से लगाव हुआ. कुमकुम ने कहा,"मैंने 2018 में शुरुआत की थी, जब मेरी मम्मी ने मुझे इस खेल से जुड़ने के लिए कहा और मैं चली गई. इसमें दिलचस्पी तब पैदा हुई जब मैंने इसे जॉइन किया और अपना पहला नेशनल मेडल जीता."

उस मेडल से लेकर सब-जूनियर लेवल पर मिली कामयाबी तक, कुमकुम ने आगे बढ़ते हुए पिछले साल एशिया कप स्टेज-1 में अपना इंटरनेशनल डेब्यू किया- एक ऐसा डेब्यू जिसमें उन्हें मेडल तो नहीं मिला, लेकिन इसकी वजह से उनके SSC बोर्ड एग्ज़ाम लगभग छूट ही गए थे. 

वह मराठी के पेपर के लिए समय पर नहीं पहुंच पाई थी और उसके परिवार को लगा कि उसे बोर्ड की परीक्षा दोबारा देनी होगी. लेकिन नतीजा आने पर सब हैरान रह गए. एक पूरा विषय छूटने के बावजूद उसने 72% अंक हासिल किए थे. इस छोटे से चमत्कार के पीछे खेल का भी हाथ था. उन्हें नेशनल मेडल के लिए 20 अंक मिले और 15 अंक स्कूल से प्रैक्टिकल के ज़रिए मिले, जिससे उसे पास होने लायक कुल अंक मिल गए और उनका साल बच गया. ऐसा लगा जैसे किस्मत ने कुमकुम को खेल के लिए ही चुना था.

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