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ब्रॉन्ज मेडल से 'रेनाउन्ड शॉट' तक, नाना पाटेकर को शूटिंग से था गहरा प्यार, राइफल से साधे थे कई निशाने

नाना पाटेकर ने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया था, ब्रॉन्ज मेडल जीता और युवा निशानेबाजों के समर्थन में भी हमेशा आगे रहे.

ब्रॉन्ज मेडल से 'रेनाउन्ड शॉट' तक, नाना पाटेकर को शूटिंग से था गहरा प्यार, राइफल से साधे थे कई निशाने
नाना पाटेकर को शूटिंग से था गहरा लगाव

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे. 75 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. उनके जाने की खबर ने फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ लाखों प्रशंसकों को भी गहरा दुख पहुंचाया है. अबतक की जानकारी के मुताबिक कार्डियक अरेस्ट के कारण उनकी मौत हुई. गोवा के डोना पाउला स्थित घर में तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

नाना पाटेकर को ज्यादातर लोग एक बेहतरीन अभिनेता के तौर पर जानते हैं, लेकिन खेलों, खासकर निशानेबाजी से उनका लगाव भी किसी से छिपा नहीं था. फिल्मों के व्यस्त करियर के बीच उन्होंने राइफल शूटिंग को हमेशा गंभीरता से लिया और कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी लिया. महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हुए वह पुणे, महू और कडारपुर में आयोजित नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में उतरे. 50 मीटर राइफल प्रोन और 300 मीटर बिग बोर फ्री राइफल स्पर्धाओं में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी.

शूटिंग रेंज में उनका सबसे यादगार प्रदर्शन साल 2007 में आया, जब महू में आयोजित नेशनल 300 मीटर बिग बोर शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता. इसी प्रतियोगिता के दौरान उन्हें 'रेनाउन्ड शॉट' का सम्मान भी मिला. यह उपलब्धि बताती है कि शूटिंग उनके लिए महज एक शौक नहीं, बल्कि जुनून थी. नाना सिर्फ खुद शूटिंग नहीं करते थे, बल्कि इस खेल से जुड़े युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ते देखना भी चाहते थे. कई मौकों पर उन्होंने उभरते हुए भारतीय निशानेबाजों की मदद करने और उन्हें आर्थिक सहयोग देने की इच्छा जाहिर की थी.

फिल्मों में भी उनका यह जुड़ाव दिखाई देता था. 'अब तक छप्पन' और उसके सीक्वल जैसी फिल्मों में पुलिस अधिकारी के किरदार को वास्तविक बनाने के लिए उन्होंने शूटिंग रेंज में लंबे समय तक अभ्यास किया था. शायद यही वजह थी कि पर्दे पर उनके किरदार इतने जीवंत नजर आते थे.

1 जनवरी 1951 को जन्मे नाना पाटेकर ने 1978 में 'गमन' से फिल्मी सफर शुरू किया था. 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्नि साक्षी', 'प्रहार', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण', 'वेलकम' और 'नटसम्राट' जैसी फिल्मों में उनके काम को खूब सराहा गया. अपने लंबे करियर में उन्होंने तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीते.

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