रनवे भी नहीं, कामचलाऊ प्लेन... जब वायुसेना ने कश्मीर बचाने के लिए हथियारों से नहीं, जिगर से लड़ा था युद्ध

8 अक्टूबर 1932 को भारतीय वायुसेना का गठन हुआ था. आज 94 साल हो गए हैं. ऐसे में जानते हैं वायुसेना के उस ऑपरेशन के बारे में जिसने कश्मीर को बचाया.

रनवे भी नहीं, कामचलाऊ प्लेन... जब वायुसेना ने कश्मीर बचाने के लिए हथियारों से नहीं, जिगर से लड़ा था युद्ध
वायुसेना ने 27 अक्टूबर 1947 की सुबह ऑपरेशन शुरू किया था.

भारतीय वायुसेना आज 94 साल की हो गई है. आधिकारिक रूप से इसकी स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को हुई थी. तब इसे 'रॉयल इंडियन एयर फोर्स' कहा जाता था. आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद इसके नाम से 'रॉयल' हटा दिया गया और फिर इसका नाम 'इंडियन एयर फोर्स' हो गया.

आज जब भारतीय वायुसेना अपने 94 साल पूरे कर रही है, तो उस ऑपरेशन की कहानी जानना भी जरूरी है कि जिसकी वजह से कश्मीर बचा. 

Advertisement - Scroll to continue

यह कोई सैन्य ऑपरेशन नहीं था. बल्कि यह एयरलिफ्ट ऑपरेशन था. इस ऑपरेशन में कई मुश्किलें थीं. सबसे बड़ी मुश्किल तो वह हवाई पट्टी ही थी, जहां वायुसेना को अपने विमान उतारना था. क्योंकि उस वक्त कश्मीर में एक ऐसी हवाई पट्टी ही थी, जिसका इस्तेमाल बहुत कम होता था और वह भी सिर्फ हल्के विमानों के लिए. 

'भयानक छोटा सा हवाई अड्डा'

उस समय कितनी सारी मुश्किलें थीं. 

पहली- श्रीनगर में कोई अच्छा एयरपोर्ट नहीं था. 

दूसरी- एयरपोर्ट पर वह बुनियादी ढांचा नहीं था जो एयर ऑपरेशंस के लिए जरूरी होता है. 

तीसरी- श्रीनगर में किसी भी तरह का कोई नेविगेशन या लैंडिंग मदद का सामान नहीं था. 

चौथी- यहां कोई रेस्क्यू की सुविधा भी नहीं थी. 

पांचवीं- विमानों में ईंधन भरने की कोई सुविधा नहीं थी. 

छठी- हवाई पट्टी पक्की नहीं थी, जिसका मतलब था कि हर लैंडिंग और टेकऑफ पर धूल का गुबार उठेगा, जिससे अगले विमान के लिए विजिबिलिटी कम हो जाएगी.

Advertisement - Scroll to continue

उस वक्त श्रीनगर एयरपोर्ट के लिए कर्नल सैम मानेकशॉ ने कहा था- 'भयानक छोटा सा हवाई अड्डा.'

यहां विमान को उतारना पूरी तरह से पायलट की स्किल पर निर्भर था. लैंडिंग के दौरान उसे गाइड करने वाला कोई था नहीं. और न ही उस समय ऐसी सुविधा बनाई जा सकती थी.

जिस हवाई पट्टी पर विमानों को उतरना था, उसकी लंबाई भी बहुत कम थी. एक तरह से यह बस कामचलाऊ ही थी. 

ऊंची-ऊंची पहाड़ी, बादलों और कोहरे से ढके इलाके में विमान उड़ाना पहले ही मुश्किल था. उस समय भारतीय वायुसेना के पास डकोटा विमान थे, जो बहुत ऊंचाई पर नहीं उड़ सकते थे. ऐसे में इनके इंजन फेल होने का डर भी बना रहता था.

विंग कमांडर केएल भाटिया, फ्लाइंग ऑफिसर डीए पुशोंग और पुरुषोत्तम लाल धवन.

विंग कमांडर केएल भाटिया, फ्लाइंग ऑफिसर डीए पुशोंग और पुरुषोत्तम लाल धवन.

लेकिन मुश्किलें बहाना नहीं हो सकतीं

यह वह वक्त था, जब भारत नया-नया आजाद हुआ था और पाकिस्तान नया-नया बना था. आजादी के कुछ महीनों बाद ही पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़ना पड़ा. उसने कश्मीर पर कब्जे के मकसद से युद्ध छेड़ दिया था.

कुल मिलाकर, वायुसेना के सामने कई सारी मुश्किलें थीं. लेकिन मुश्किलें 'बहाना' नहीं हो सकतीं. 27 अक्टूबर 1947 को वायुसेना के तीन डकोटा DC-3 विमानों ने पालम से श्रीनगर के लिए उड़ान भरी. 

विंग कमांडर केएल भाटिया इसका नेतृत्व कर रहे थे. उनके पीछे फ्लाइंग ऑफिसर डेसमंड एरिक पुशोंग और फ्लाइंग ऑफिसर पुरुषोत्तम लाल धवन थे. इन विमानों में सिख बटालियन के सैनिक भी थे.

तीनों विमान जब श्रीनगर जा रहे थे तब उनकी जमीन से दूरी तीन हजार फीट से भी कम थी. पहला विमान जब श्रीनगर हवाई अड्डे पर पहुंचा और ऊपर से ही यह देखा कि हवाई अड्डा भी जम्मू-कश्मीर के हाथ में है या पाकिस्तान से आए कबाइलियों ने उस पर कब्जा कर लिया है. जब देखा कि सब सुरक्षित है तो तीनों विमानों ने एक के बाद एक लैंडिंग की.

उतरने के बाद भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल भगवान सिंह ने उनका स्वागत किया. उन्होंने सिख बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय को हालात की सारी जानकारी दी. 

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: IAF

27 अक्टूबर को क्या हुआ था?

27 अक्टूबर को वायुसेना के तीन विमान उड़े थे. साथ में भारतीय सेना के जवान थे. तमाम मुश्किलों और परेशानियों को दरकिनार वायुसेना के विमानों ने उड़ान भरी और जवानों और सामान को सुरक्षित श्रीनगर पहुंचाया.

उनमें से एक विमान में वॉरंट ऑफिसर जॉर्ज वर्गीस ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था, 'सेना के जवानों को 27 अक्टूबर को सुबह जल्दबाजी में विमान में चढ़ाया गया था. हमें आर्मी स्टाफ के एक ऑफिसर ने बताया था कि हमें पहले श्रीनगर एयरपोर्ट का चक्कर लगाना है और देखना है कि कहीं दुश्मन तो वहां नहीं आ गया है. अगर गोली चलती है तो हमें वापस मुड़ना था और दिल्ली लौटना था. किस्मत से हवाई अड्डा अभी भी हमारे हाथों में था.'

उन्होंने आगे बताया कि 'हालांकि हमारे कुछ विमानों पर गोलियां लगी भीं. लैंडिंग के बाद सैनिकों को जल्दी उतारा गया और विमान दूसरी शटल के लिए रवाना हो गया.'

27 अक्टूबर को सुबह से लेकर शाम तक, वायुसेना के विमानों ने दिल्ली से श्रीनगर के लिए 28 उड़ानें भरी थीं.

डकोटा विमान.

डकोटा विमान.
Photo Credit: IAF

दिन के उजाले से रात के अंधेरे तक... सिर्फ उड़ान

पाकिस्तानी कबाइले तेजी से कश्मीर में घुसते चले आ रहे थे. सर्दियां बढ़ रही थीं. हालात बिगड़ रहे थे. लेकिन जवानों के हौंसले डिगाने में किसकी हिम्मत थी?

भारतीय सेना चाहती थी कि कश्मीर के कई पुलों को हवाई बमबारी से उड़ा दिया जाए, ताकि कबाइलियों को घुसने का रास्ता न मिले. लेकिन बदकिस्मती से उस वक्त वायुसेना के पास न तो ऐसे विमान थे और न ही बम.

ऐसे में ब्रिगेडियर अटल ने विंग कमांडर केएल भाटिया से कहा कि श्रीनगर के करीब पहुंचने पर नीचे उड़ान भरनी है ताकि लोग देख सकें और पहचान सकें कि यह भारतीय वायुसेना का विमान है.

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: IAF

एयर मार्शल भारत कुमार अपनी किताब 'द इनक्रेडिबल वॉर' में लिखते हैं, 'उस समय पायलटों के पास आराम करने या समय बर्बाद करने का कोई समय नहीं था, क्योंकि विमान लगातार आ रहे थे और श्रीनगर में उतरने के बाद उन्हें दिल्ली वापस जाना था.'

वह लिखते हैं, 'मौजूदा हालात से निपटने के लिए सैनिकों और असले को हवाई रास्ते से पहुंचाने का मतलब था कि लगातार कई उड़ानें भरना. उड़ानें इतनी जल्दी-जल्दी आ रही थीं कि उड़ने वाली धूल भी जमीन पर बैठ नहीं पाती थी. अगर कोई दुर्घटना होती और रनवे ब्लॉक हो जाता तो आगे की उड़ानें पता नहीं कब तक के लिए रुक जातीं. इससे शायद पूरा ऑपरेशन ही खतरे में पड़ जाता.'

एयर मार्शल भरत कुमार ने लिखा है, 'हवाई अड्डे पर आने-जाने वाले ट्रैफिक को कंट्रोल करने के लिए एक अफसर को तैनात किया गया. उसके पास एक अल्टीमीटर और एक रेडियो सेट था. चूंकि कोई नेविगेशन नहीं था, इसलिए हर विमान की सटीक लोकेशन का पता लगाने का कोई तरीका नहीं था. जो विमान पहले कॉल करता था, उसे पहले उतरने की इजाजत दी जाती थी.'

तमाम खतरों और मुश्किलों के बावजूद वायुसेना के पायलटों और क्रू ने खुशी-खुशी काम किया.

एयर मार्शल भरत कुमार लिखते हैं, 'दिन की शुरुआत होते ही विमान दिल्ली से श्रीनगर के लिए उड़ान भर देते थे और तभी रुकते थे जब तक अंधेरा इसे नामुमकिन न बना दे. इसी हौसले, लगन और स्किल ने कश्मीर को बचाने में अहम भूमिका निभाई.'

Latest and Breaking News on NDTV

तो भारत का नक्शा कुछ और होता?

अगर वायुसेना के विमान 27 अक्टूबर 1947 की सुबह-सुबह हमारे सैनिकों को श्रीनगर में जमीन पर नहीं उतार पाती तो भारत का इतिहास और नक्शा शायद काफी अलग होता.

उसके बाद कई दिनों में भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तानी सेना को पीछे धकेलना शुरू कर दिया और जम्मू-कश्मीर को बचाया. 

यह आजाद भारत की पहली जंग थी. बंटवारे के कारण वायुसेना भी थोड़ी कमजोर थी. यह वह वक्त था जब बंटवारे के कारण बड़े पैमाने पर दंगे और लोगों का पलायन भी हो रहा था. वायुसेना इस काम में भी लगी हुई थी. ऐसे मुश्किल वक्त में और मुश्किल हालात में पाकिस्तान पर हमला किया था, लेकिन इसके बावजूद वायुसेना के विमानों ने लगातार उड़ानें भरते हुए सैनिकों और हथियारों को श्रीनगर तक पहुंचाया.

एयर मार्शल भरत कुमार अपनी किताब में लिखते हैं- 'किसी के भी मन में कभी भी जरा सा भी शक नहीं रहा कि हमारी सेना ने मुश्किल हालात और अनोखे इलाके में सबसे शानदार मिलिट्री ऑपरेशंस में से एक को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि अगर वायुसेना 27 अक्टूबर 1947 की सुबह दिल्ली से एयरलिफ्ट कर सैनिकों को श्रीनगर में जमीन पर नहीं उतार पाती तो भारत का इतिहास और नक्शा शायद बहुत अलग होता.'