मनीषा भनवाला की रणनीति - अमेरिकी एबिगेल नेट के आक्रामक खेल के जाल में फंसने के बजाय, उन्हें लंबे समय तक उलझाए रखना - विश्व चैंपियनशिप में उनके ऐतिहासिक स्वर्ण पदक के लिए निर्णायक साबित हुई. मुख्य कोच वीरेंद्र दहिया ने बताया कि भारतीय टीम ने एक विस्तृत विश्लेषण के जरिए प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी का पता लगा लिया था. शुक्रवार को महिलाओं के 59 किलोग्राम भार वर्ग के फाइनल में, मनीषा 1-6 से पिछड़ने के बाद शानदार वापसी करते हुए नेट को 8-6 से हराकर भारत की पहली महिला विश्व चैंपियन बनीं. इसके साथ ही, कुश्ती में विश्व खिताब के लिए देश का 15 साल का इंतजार खत्म हो गया.
वीरेंद्र दहिया ने मनीषा के चैंपियन बनने के बाद कहा,"हमने उनके कुश्ती खेलने के तरीके का अध्ययन किया था. हमें पता था कि वह पांचवें मिनट तक थक जाती हैं, इसलिए हमने तय किया कि मुकाबला पूरे छह मिनट तक चलना चाहिए. अगर ऐसा होता, तो मनीषा को हमेशा फायदा मिलता." उन्होंने आगे कहा,"यह उसी तरह की कुश्ती है जैसी हमारे सबसे सफल पहलवानों ने दिखाई है - यानी सहनशक्ति (एंड्योरेंस) के दम पर जीत हासिल करना. बजरंग पुनिया, रवि दहिया और अमन सहरावत ने ऐसा किया है, और अब मनीषा ने भी यही कर दिखाया है. कमाल है."
भारतीय टीम ने यह भी पहचान लिया था कि नेट दूर से हमला करना पसंद करती हैं, इसलिए मनीषा को निर्देश दिया गया कि वह उन्हें ऐसा करने के लिए जगह न दें. दहिया ने कहा,"नेट दूर से हमला करना पसंद करती हैं, इसलिए हमने रणनीति बनाई कि मनीषा को उनके जितना संभव हो सके करीब रहना चाहिए और लगातार संपर्क बनाए रखना चाहिए."
इस रणनीति की कड़ी परीक्षा पहले राउंड में हुई, जब नेट ने मुकाबले पर दबदबा बनाया और 6-1 की बढ़त के साथ ब्रेक में गईं. लेकिन 30 सेकंड का ब्रेक एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब दहिया ने अपनी पहलवान को एक सरल लेकिन दमदार संदेश दिया. दहिया ने याद करते हुए बताया,"मैंने उससे कहा कि कुश्ती एक सेकंड में बदल सकती है और तुम्हारे पास इसे पलटने के लिए 180 सेकंड हैं. उसने जवाब दिया, 'सर, चिंता मत कीजिए. मैं आपको निराश नहीं करूंगी. मैं स्वर्ण पदक जीते बिना वापस नहीं आऊंगी'."
मनीषा ने अपना वादा निभाया. उन्होंने दूसरे राउंड में लगातार सात अंक हासिल करके न केवल पिछड़ने की स्थिति को पलटा, बल्कि इतिहास भी रच दिया. उन्होंने पहले एक 'टेकडाउन' किया, फिर 'गट रेंच' का इस्तेमाल करके स्कोर 6-6 से बराबर कर दिया. इसके बाद उन्होंने दो अंक और हासिल किए और 8-6 की बढ़त बना ली.
मुकाबले में 27 सेकंड बचे थे, तब उन्होंने थक चुकी नेट को रोके रखा और जीत पक्की कर ली. इसके साथ ही वह भारत की पहली महिला कुश्ती विश्व चैंपियन बन गईं. दहिया और उनकी टीम के लिए, यह ऐतिहासिक स्वर्ण पदक सिर्फ एक शानदार वापसी का नतीजा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का भी परिणाम था, जिसमें मनीषा की सबसे बड़ी ताकत-उनकी सहनशक्ति का पूरा इस्तेमाल किया गया.
रोहतक के सर छोटू राम अखाड़े में मनीषा के कोच मनदीप सिंह बहुत खुश थे. उन्होंने इस स्वर्ण पदक को सालों की कड़ी मेहनत का सबसे बड़ा इनाम बताया. मनदीप ने कहा,"वह हमेशा आक्रामक होकर कुश्ती लड़ती हैं. उनके पास सालों का अनुभव है, जिसने उन्हें 1-6 से पिछड़ने के बाद भी जीतने का आत्मविश्वास दिया. मैं कह सकता हूं कि पिछले दो-तीन सालों में मनीषा ने बहुत कड़ी मेहनत की है."
उन्होंने आगे कहा,"यह सबसे बड़ा मेडल है और हर किसी का सपना विश्व चैंपियन बनने का होता है. सर छोटू राम अखाड़े ने भारत को यह उपलब्धि दिलाई है. अब हमारा अगला सपना यह है कि हमारे सेंटर से कोई ओलंपिक मेडलिस्ट भी निकले. भगवान की कृपा रही और कड़ी मेहनत रंग लाई."
(इनपुट- पीटीआई)
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