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गुलवीर सिंह: नौकरी के लिए शुरू की दौड़, अब नजरें गोल्ड पर, 10,000 मीटर में पहले ही जीत चुके हैं सिल्वर

एक दशक पहले गुलवीर सिर्फ दौड़ते थे, कभी खेत में किसान पिता की मदद के लिए, कभी परिवार के कामों के लिए, तो कभी सेना में भर्ती होने के लिए. एक दशक बाद भी उनका दौड़ना जारी है, लेकिन अब अंतर है, अब यही दौड़ गुलवीर की पहचान है.

गुलवीर सिंह: नौकरी के लिए शुरू की दौड़, अब नजरें गोल्ड पर, 10,000 मीटर में पहले ही जीत चुके हैं सिल्वर
गुलवीर सिंह ने नौकरी के लिए दौड़ शुरू की थी अब उनकी नजरें एशियन गेम्स 2026 में दूसरे गोल्ड पर हैं

गुलवीर कभी खेल की मेड़ों पर दौड़ते तो कभी गांव की सड़कों पर, कभी अपने किसान पिता की मदद के लिए उन्हें दौड़ लगानी पड़ती तो कभी परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए. सेना की भर्ती के लिए गुलवीर ने दौड़ने की शुरुआत की. इस दौड़ का मकसद परिवार की मदद करना और नौकरी पाने का था. सेना में नौकरी मिली, लेकिन विडंबना देखिए दौड़ना बंद नहीं हुआ है बल्कि इसी दौड़ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई. 1 जून 1998 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव में जन्में गुलवीर अब भारत के सबसे सफल लंबी दौड़ के धावक है और उनका यहां तक का सफर किसी सपने के सच होने जैसा लगता है. 

सेना में भर्ती का सपना और दौड़ शुरू

नेशनल रिकॉर्ड तोड़ने से लेकर 60 मिनट से कम समय में हाफ-मैराथन पूरी करने वाले पहले भारतीय एथलीट गुलवीर के शुरुआती प्लान में एथेलिटक्स नहीं था. उनके गांव में अधिकतर लोग सेना में हैं और गुलवीर ने शुरुआत में यही सोच रखी. 

ओलंपिक.कॉम के अनुसार, गुलवीर ने 'इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट' में कहा,"मुझे कॉमनवेल्थ गेम्स या एशियन गेम्स के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी. मेरे गांव में बहुत कम लोग ही इन प्रतियोगिताओं के बारे में जानते थे." अपने आस-पास के कई युवाओं की तरह, उनकी भी चाहत वर्दी पहनने और अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित भविष्य बनाने की थी. शुरुआत में, दौड़ना बस उस लक्ष्य को पाने का एक ज़रिया था.

गुलवीर का बचपन का सपना 2018 में तब पूरा हुआ, जब वे स्पोर्ट्स कोटे से भारतीय सेना में शामिल हुए. भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में तैनात होने के बाद, वे आगे चलकर जूनियर कमीशंड ऑफिसर के पद तक पहुंचे. टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में गुलवीर कहते हैं,"सेना में शामिल होने के बाद मुझे खेलों के बारे में बताया गया और कहा गया कि अगर मैं मेडल जीतता हूं तो मुझे प्रमोशन मिलेगा. मैंने दौड़ना शुरू किया और मुझे पुणे के आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट भेज दिया गया, जहां मैंने कॉम्पिटिशन के लिए ट्रेनिंग शुरू की."

फ़ौजी ज़िंदगी बहुत मुश्किलों भरी थी. एथलेटिक्स के साथ-साथ, गुलवीर ने अपनी सर्विस के दौरान पेट्रोलिंग और सुरक्षा की ज़िम्मेदारियां भी निभाईं. उन्हें अरुणाचल प्रदेश में तैनात किया गया था, जहां के मुश्किल इलाके और ऊंचाई ने उनकी फ़िज़िकल कंडीशनिंग को और बेहतर बनाने में मदद की.

गुलवीर सिंह की घरेलू स्तर पर बड़ी कामयाबी

गुलवीर सिंह ने सेना में भर्ती होने के बाद ही कॉम्पिटिटिव रनिंग शुरू की थी, लेकिन उन्हें तुरंत सफलता नहीं मिली. एक रनर के तौर पर शुरुआती सालों में उन्होंने मिलिट्री की जिम्मेदारियों को निभाते हुए एलीट लॉन्ग-डिस्टेंस रनिंग की बारीकियां सीखीं. उन्हें अपना पहला सीनियर मेडल जीतने में चार साल लग गए.

गुलवीर सिंह को आखिरकार 2022 में कालीकट में हुए फेडरेशन कप में बड़ी कामयाबी मिली, जहां उन्होंने 10,000 मीटर दौड़ में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर पहली बार पोडियम पर जगह बनाई. इस नतीजे ने नेशनल रैंकिंग में उनकी तरक्की की शुरुआत की और उनके लिए इंटरनेशनल सर्किट में लगातार हिस्सा लेने के रास्ते खोल दिए.

2023 में मिली कामयाबी 

एशियन गेम्स 2023 में, गुलवीर ने 10,000 मीटर रेस में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। इससे पहले उसी साल बैंकॉक में हुई एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी उन्होंने 5,000 मीटर रेस में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था. इन दो पोडियम फ़िनिश ने एशियन लॉन्ग-डिस्टेंस रनिंग में उनकी एंट्री का संकेत दिया और ग्लोबल लेवल पर उनके उभरने की नींव रखी. 2024 में, गुलवीर ने अमेरिकी कोच स्कॉट सिमंस की देखरेख में कोलोराडो स्प्रिंग्स, यूएएएस में ज़्यादा ऊंचाई वाले ट्रेनिंग सेंटर में अपनी ट्रेनिंग शुरू की. यह कदम बहुत असरदार साबित हुआ. अगले दो सीज़न में, गुलवीर एशिया के बेहतरीन लॉन्ग-डिस्टेंस रनर्स में से एक बनकर उभरे और उन्होंने बार-बार 3000 मीटर, 5000 मीटर और 10000 मीटर दौड़ में भारतीय रिकॉर्ड तोड़े.

सिल्वर जीता अब एक और पदक की उम्मीद

जापान में जारी एशियन गेम्स में बीते शुक्रवार को भारतीय लॉन्ग-डिस्टेंस रनर गुलवीर सिंह ने पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में 28:29.38 मिनट का समय निकालकर एशियाई खेलों में अपना ब्रॉन्ज़ मेडल सिल्वर मेडल में बदल लिया और अपने शानदार 2026 सीज़न में एक और बड़ा इंटरनेशनल मेडल जोड़ा. बहरीन के बिरहानु बालेव के बाद दूसरे स्थान पर रहे, बालेव ने 28:27.51 मिनट में गोल्ड मेडल जीता.

इससे पहले फरवरी 2026 में, उन्होंने पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में वर्ल्ड एथलेटिक्स रैंकिंग के टॉप 10 में जगह बनाई. कुछ महीनों बाद ग्लासगो 2026 में, गुलवीर सिंह एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में दो व्यक्तिगत मेडल जीतने वाले पहले भारतीय ट्रैक एंड फील्ड एथलीट बने. उन्होंने पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में सिल्वर और 5,000 मीटर दौड़ में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. यह पहली बार था जब किसी भारतीय ने कॉमनवेल्थ गेम्स में इन दो इवेंट्स में मेडल जीता हो. गुलवीर ने आइची-नागोया में हुए 10,000 मीटर दौड़ के मेडल का रंग बदलकर उसे सिल्वर में अपग्रेड कर लिया है. अब उनकी नजरें सोमवार को 1500 मीटर में पदक जीतने की होगी.

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