राजस्थान में गौशालाओं में पेयजल संकट से जुड़ी हाईकोर्ट में चल रही अवमानना याचिका के बाद राज्य के गोपालन विभाग और जलदाय विभाग के बीच का एक बड़ा प्रशासनिक गतिरोध सामने आया है. प्रदेश की हजारों गौशालाओं में गोवंश के लिए पीने के पानी की किल्लत को दूर करने के लिए साल 2023-24 में घोषित की गई एक बड़ी बजट योजना पिछले 3 साल से फाइलों में दबी रही. अब गोपालन विभाग ने हाईकोर्ट में अतिरिक्त हलफनामा दाखिल कर अपनी मजबूरी और इस योजना का नया रोडमैप कोर्ट के सामने रखा है. गोपालन विभाग के प्रमुख शासन सचिव विकास सीताराम भाले द्वारा कोर्ट में दिए गए हलफनामे के मुताबिक, विभाग के पास इस तकनीकी काम को संभालने के लिए न तो कोई तकनीकी विंग है और न ही विशेषज्ञ इंजीनियर. इसके चलते अब यह काम जलदाय विभाग को सौंपने की तैयारी पूरी कर ली गई है.
कुल 3,861 रजिस्टर्ड गौशाएं संचालित
गोपालन विभाग द्वारा करवाए गए पोर्टल एनालिसिस और भौतिक सत्यापन में सामने आया है कि प्रदेश में कुल 3,861 पंजीकृत गौशालाएं संचालित हैं.
1,641 गौशालाओं के पास खुद के चालू और क्रियाशील ट्यूबवेल हैं. 2,220 गौशालाएं ऐसी हैं, जहां गोवंश के लिए पेयजल सुरक्षा के तहत नए ट्यूबवेल और थ्री-फेज बिजली कनेक्शन की सख्त जरूरत है.
हलफनामे में एक चौंकाने वाला खुलासा यह भी हुआ है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 के बजट में पंजीकृत गौशालाओं में थ्री-फेज कनेक्शन के साथ ट्यूबवेल लगाने के लिए 75.00 करोड़ रुपए का प्रावधान 'गौ संरक्षण एवं संवर्धन निधि' से प्रस्तावित किया गया था. लेकिन गोपालन विभाग को इस मद से कभी कोई बजट आवंटित या स्वीकृत ही नहीं किया गया. दूसरी तरफ, पीएचईडी की गाइडलाइंस और जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं सिर्फ इंसानी आबादी के लिए बजट खर्च करने की इजाजत देती हैं, पशुओं के लिए नहीं.
जलदाय विभाग खोदेगा ट्यूबवेल
इस तकनीकी और नीतिगत अड़चन को दूर करने के लिए वित्त विभाग के निर्देश पर एक नया रास्ता निकाला गया है. जलदाय विभाग अब गोपालन विभाग के "डिपॉजिट हेड" के तहत इन ट्यूबवेलों का निर्माण करने के लिए राजी हो गया है. इसके तहत प्रति साइट औसतन 25 लाख रुपए की लागत से जलदाय विभाग तकनीकी रूप से व्यावहारिक जगहों पर ट्यूबवेल खोदेगा और पाइपलाइन बिछाएगा. इसके लिए गोपालन विभाग ने पीएचईडी के मुख्य अभियंता (ग्रामीण) से जिलावार तकनीकी लागत का तकमीना मांगा है.

गोपालन विभाग ने कोर्ट को बताया कि जिला स्तर पर उनके पास कोई स्वतंत्र तकनीकी ढांचा नहीं है. विभाग पूरी तरह से पशुपालन विभाग के 'पशु चिकित्सा अधिकारियों' के भरोसे चलता है. विभाग के मुताबिक, “पशु चिकित्सक कानूनी और तकनीकी रूप से इतने बड़े पैमाने पर होने वाले इंजीनियरिंग कार्यों (जैसे ड्रिलिंग, पाइप बिछाना, हाई-वोल्टेज थ्री-फेज इलेक्ट्रिफिकेशन) की मॉनिटरिंग या वेरिफिकेशन करने में पूरी तरह असमर्थ हैं. यदि गोपालन विभाग खुद यह काम कराता, तो भारी लापरवाही और सरकारी धन के दुरुपयोग का खतरा था.
कोर्ट के आदेशों के बाद विभाग ने एक त्वरित सर्वे करवाया, जिसमें 740 गौशालाएं 'अति संवेदनशील' पाई गईं, जो पूरी तरह से अस्थाई पानी के स्रोतों पर निर्भर हैं. इनके पास अपनी जमीन तक नहीं है. सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि वह गोवंश के प्रति संवेदनशील है. गौ संरक्षण एवं संवर्धन निधि से चारे और पानी के लिए दी जाने वाली सहायता राशि को साल 2016-17 के ₹92.21 करोड़ से बढ़ाकर साल 2023-24 में ₹1,087.66 करोड़ किया गया है. हाल ही में पानी की किल्लत की सूचना मिलने पर 6 जिलों की 12 गौशालाओं के लिए आपातकालीन रूप से ₹20 लाख का अतिरिक्त बजट भी जारी किया गया है.
गौशाला में पानी के संकट पर हाईकोर्ट सख्त
बता दें कि हाईकोर्ट ने अवमानना की याचिका पर सुनवाई करते हुए गौशालाओं में पेयजल संकट पर गहरी चिंता जताई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि साल 2023-24 के बजट में ट्यूबवेल स्थापना की घोषणा के बावजूद हजारों गौशालाएं आज भी बुनियादी पेयजल सुविधा से वंचित हैं. हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए सरकार को निर्देश दिया कि 21 जुलाई तक एक विस्तृत टाइम-बाउंड शेड्यूल प्रस्तुत किया जाए, जिसके अनुसार 1 अक्टूबर तक हर हाल में कार्य शुरू किया जा सके. इसके साथ ही अदालत ने सुझाव दिया कि जिन क्षेत्रों में भूजल उपलब्ध नहीं है, वहां वैकल्पिक जलापूर्ति व्यवस्था पर विचार किया जाए. कोर्ट ने आदेश दिया कि मानसून तक सभी गौशालाओं में अस्थायी पेयजल व्यवस्था निर्बाध रूप से जारी रखी जाए.
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